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अभिशप्त कोविड-19 का ‘स्वच्छ वायु’ वरदान

एक ओर जहां आज कोरोनावायरस (सार्स- सीओवी-2) जनित कोविड-19 महामारी की वजह से मानव जगत की बड़ी आबादी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है, वहीं भारत में ‘सोशल डिस्टैंसिंग’ के आह्वान के बीच दिहाड़ी मजदूरों का ‘रिवर्स माइग्रेशन’ महामारी के भय पर भारी पड़ रहा है जो अपने आपमें एक बहुत बड़ी त्रासदी है। यह रिवर्स माइग्रेशन भी ‘मानव अस्तित्व के संकट’ से ही अंतर-संपर्कित है और यह आर्थिक अस्तित्व से जुड़ा है। इन संकटों के बीच आशा की एक किरण पर्यावरणीय स्तर पर दिख रहा है। कोविड-19 की वजह से विश्व भर में 2.6 अरब से अधिक आबादी लॉकडाउन में चली गयी है जो द्वितीय विश्वयुद्ध की साक्षी बनी मानव आबादी से कहीं अधिक है। विश्व के अधिकांश देशों में लॉकडाउन की वजह से वाहनों के आवागमन पर लगभग विराम सा लग गया है और आर्थिक गतिविधियां लगभग थम सी गईं हैं। इस आर्थिक दुष्प्रभाव का सकारात्मक प्रभाव स्वच्छ वायु के रूप में दिख रहा है।

यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के कॉपरनिकस उपग्रहीय चित्र सभी यूरोपीय शहरों में वायु प्रदूषण स्तर में बड़ी गिरावट दर्शा रहा है। पेरिस, मिलान व मैड्रिड जैसे बड़े शहरों में नाइट्रोजन ऑक्साइड (एनओ2) सकेंद्रण बिल्कुल कम हो गयी है। जीपीएस निर्माता टॉमटॉम के अनुसार वर्ष 2019 में इसी समय लंदन की सड़कों पर परिवहन जाम 71 प्रतिशत से कम होकर 26 मार्च, 2020 को 15 प्रतिशत रह गया है। इन्हीं उपग्रहों से लिये गये चित्रों के आधार पर यूरोपीय पर्यावरणीय एजेंसी (ईईए) ने कहा है कि रोम एवं मिलान में वायु प्रदूषण स्तर में 50 प्रतिशत की गिरावट आयी है वहीं पेरिस में 30 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गई। महीन कण (पीएम 2.5) में भी महत्वपूर्ण कमी आयी है। महीन कण यानी पर्टिकुलेट मैटर ठोस कणों एवं छोटी द्रव बूंदों का मिश्रण है। परिवहन, निर्माण स्थल, खेत, आग लगने जैसी गतिविधियां इसके प्रमुख स्रोत हैं।

जहां तक भारतीय शहरों की बात है तो 1.3 अरब आबादी का घरों में सिमट जाने की वजह से, देश के प्रमुख प्रदूषित शहरों में पीएम स्तर में व्यापक कमी आयी है। सफर, यानी वायु गुणवत्ता और मौसम पूर्वानुमान व शोध प्रणाली (SAFAR) के अनुसार पीएम 2.5 में दिल्ली में 30 प्रतिशत तथा अहमदाबाद व पुणे में 15 प्रतिशत की कमी आयी है। मोटर वाहनों की वजह से फैलने वाला नाइट्रोजन ऑक्साइड प्रदूषण पुणे में 43 प्रतिशत, मुंबई में 38 प्रतिशत व अहमदाबाद में 50 प्रतिशत कम हो गई है। वैसे प्रदूषण स्तर में कमी के लिए कुछ हद असामयिक वर्षा का भी योगदान है, परंतु कोविड-19 का प्रभाव अधिक है। दिल्ली का आनंद विहार का उदहारण ले लिजिए, जहां वर्ष भर प्रदूषण स्तर काफी अधिक होता है। वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) के आंकड़ों के अनुसार इस जगह पर 29 मार्च, 2020 को औसत पीएम 2.5 स्तर 46 था जो ‘संतोषजनक’ है। इसके ठीक तीन महीने पहले 29 दिसंबर, 2019 की स्थिति (चित्र-1) को देखिये। 29 दिसंबर, 2019 को आनंद विहार में ही पीएम 2.5 का औसत स्तर 451 था यानी गंभीर स्थिति। सूचकांक में शून्य से 50 के स्तर को अच्छा और 51 से 100 के स्तर को संतोषजनक माना जाता है जबकि 401 से 501 के स्तर को गंभीर माना जाता है जो स्वस्थ मानव को भी प्रभावित कर सकता है।

हालांकि कुछ वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि लॉकडाउन की वजह से सभी प्रकार के प्रदूषणों में कमी नहीं आएगी। यूके सेंटर फॉर इकोलॉजी एंड हाइड्रोलॉजी के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. एइको नेमित्ज के अनुसार ‘कोविड-19 के प्रसार की वजह से परिवहन एवं औद्योगिक गतिविधियों में कमी आयी है जिसके परिणामस्वरूप वायु प्रदूषण में भी कमी आयी है। परंतु अब घरों पर अधिक लोग रहने लगे हैं, इस वजह से वहां से प्रदूषण का स्तर बढ़ सकता है।’

उपग्रहीय तस्वीरों व वायु गुणवत्ता सूचकांक के आंकड़ों से साफ हो जाता है कि साफ वायु से यदि हम महरूम हैं तो इसके लिए कोई और नहीं, बल्कि हम मानव ही जिम्मेदार हैं। वैसे कोविड-19 बीमारी के लिए भी हम जानवरों को दोष नहीं दे सकते, वरन् इसके लिए भी मानव ही दोषी है। विकास के नाम पर हम जानवरों के पर्यावास में घुसपैठ कर चुके हैं। पालतू बनाने के लिए या इनका मांस सेवन के लिए वन्यजीवों को हम अपने घर में ले आए हैं, ऐसे में इनमें अपना घर बना चुके वायरस व बैक्टीरिया से हम पीछा नहीं छुड़ा सकते। और फिर जिस वैश्वीकरण ने हमारी संपन्नता को बढ़ाया, आज उसीने इस वायरस को भी विश्व के सभी कोने में प्रसारित कर दिया। अर्थात बीमारी हो या प्रदूषण, सबकी जड़ मानव गतिविधियां ही हैं और इसका भुक्तभोगी भी मानव ही है।

अंततः कहा जा सकता है कि कोरोनावायरस नामक विषाणु ने न केवल तथाकथित विकसित कहे जाने वाले देशों की मजबूत स्वास्थ्य अधोसंरचना की कमजोरियां उजागर कर दी हैं, वरन् वायु प्रदूषण रूपी विष के पीछे के कारकों को भी प्रत्यक्ष कर दिया है। भारत में तो स्वास्थ्य ‘अधोसंरचना’, की बात ही करना बेमानी है क्योंकि यहां स्वास्थ्य अधोसरंचना न होकर ‘आधी-संरचना’ ही है, और इस महामारी से बचने का एकमात्र उपाय ‘सोशल डिस्टैंसिंग’ ही है जिसका पालन स्वयं के स्तर पर अनिवार्य रूप से अपेक्षित है।

  संदर्भ

  1. साइंस मीडिया सेंटर
  2. साइंस एलर्ट
  3. डेली मेल साइंस
  4. राष्ट्रीय गुणवत्ता सूचकांक

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