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अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए क्या ‘क्लाइमेट एक्शन’ की बलि दी जाएगी?

पूरी दुनिया आज अभूतपूर्व दयनीय स्थिति का सामना कर रहा है। कोरोनवायरस संक्रमण पर काबू पाने के लिए लोगों को घर में ही रहने के आदेश से अधिकांश आर्थिक गतिविधियां थम सी गईं हैं। इसका परिणाम यह हुआ है कि करोड़ों लोगों पर बेरोजगारी का खतरा मंडराने लगा है, इनकी आय कम हो गई है या शून्य हो गई है तो दूसरी ओर सरकार को मिलने वाले राजस्व भी कम हो गये हैं। जाहिर है, पैंडेमिक का खतरा कम होने पर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए वैश्विक स्तर पर  पुरजोर प्रयास किये जाएंगे ताकि जो नुकसान हुआ है उसे पाटा जा सके। अन्यथा स्थिति भयावह हो सकती है। ऐसे में आशंका जतायी जा रही है कि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए जलवायु कार्रवाइयों (क्लाइमेट एक्शन) को पृष्ठभूमि में डाली जा सकती है, हरित अर्थव्यवस्था को दी जा रही प्राथमिकता समाप्त हो सकती है व जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए आर्थिक मदद को रोका जा सकता है। ऐसे में पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता से जुड़े लक्ष्यों को प्राप्त करना भी मुश्किल हो सकता है अथवा विश्व के देश इस लक्ष्य को फिलहाल गंभीरता से नहीं ले। अप्रैल 2020 के अंतिम सप्ताह में इस संबंध में एक अध्ययन रिपोर्ट भी प्रकाशित हुयी है जिसमें कहा गया है कि ‘अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए महंगी जलवायु नीतियों का परित्याग कर देना चाहिए।’

क्या कहती है अध्ययन रिपोर्ट?

यूनाइेटड किंगडम के वित्त मंत्रालय के पूर्व विशेष सलाहकार रूपर्ट डारवाल की एक रिपोर्ट ‘ग्लोबल वार्मिंग पॉलिसी फाउंडेशन’ द्वारा प्रकाशित हुयी है। रिपोर्ट के शीर्षक व उपशीर्षक ‘द क्लाइमेट नूज-बिजनेस, नेट जीरो एंड द आईपीसीसी एंटीकैपिटेलिज्म’ (The Climate Noose: Business, Net Zero and the IPCC’s Anticapitalism) ही बहुत कुछ बयान कर देते हैं। इसमें पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता के उत्सर्जन कटौती लक्ष्य को अर्थव्यवस्था के लिए, विशेष रूप से पाश्चात्य अर्थव्यवस्था के लिए घातक बताया गया है।

उल्लेखनीय है कि वर्ष 2015 के पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता की धारा-2 में प्राथमिक लक्ष्य बताया गया है। इसमें कहा गया है कि वैश्विक औसत तापमान को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी तक सीमित रखना चाहिए और प्रयास किये जाने कि चाहिए कि यह 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रहे। दरअसल कई छोटे द्वीपीय देशों ने आशंका जाहिर की थी कि 2 डिग्री सेल्सियस वृद्धि से उनके अस्तित्व पर खतरा पैदा हो सकता है और उनके घर लहरों में समा सकते हैं, इसलिए वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने के प्रयास किये जाने की बात समझौते में की गई। इसके तीन वर्ष बाद आईपीसीसी ने 1.5 डिग्री स्पेशल रिपोर्ट प्रकाशित किया जिसमें वर्ष 2050 तक शून्य उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने का आह्वान किया गया तथा यह भी कहा गया कि वर्ष 2030 तक उत्सर्जन में 40 प्रतिशत की कमी की जानी चाहिए।

अब यहां सवाल उठता है कि पेरिस समझौता के उपर्युक्त लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कितनी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ सकती है? आलोच्य रिपोर्ट (रूपर्ट डारवाल) में यूएनएफसीसीसी के पूर्व अध्यक्ष यवो डी बोएर का हवाला दिया गया है। बोएर का कहना है कि ‘पूरी अर्थव्यवस्था को बंद कर देने से ही ग्लोबल वार्मिंग को 2 डिग्री सेल्सियस वृद्धि तक सीमित रखी जा सकती है।’ पूरी अर्थव्यवस्था को बंद करने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, उसकी झलक कोविड-19 पेंडेमिक अवधि में दिखनी आरंभ हो गई है। रूपर्ट डारवाल अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कहते हैं कि, ‘‘एकतरफा शून्य उत्सर्जन कंपनियों, उनके शेयरधारकों, कर्मचारियों, ग्राहकों तथा स्थानीय समुदायों को गरीब बना देगी। आत्मदरिद्रता का कोई आर्थिक, सामाजिक या नैतिक औचित्य नहीं हो सकता क्योंकि इससे हरित किराया साधकों व पश्चिमी देशों के प्रतिस्पर्धियों के अलावा किसी को लाभ नहीं होने वाला’’।  वे यह भी कहते हैं कि वर्ष 2050 तक शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की प्राप्ति से जो ‘जलवायु लाभ’ (क्लाइमेट बेनिफिट्स) प्राप्त होंगे, उसकी लागत 61 गुणा अधिक होगी और मानव कल्याण को भारी आर्थिक कीमत चुकानी पड़ेगी।

रूपर्ट डारवाल की रिपोर्ट में कुछ और भी तर्क दिये गये हैं, जैसे किः

-कोविड-19 के प्रकोप से तो अर्थव्यवस्था पटरी पर वापस आ सकती है परंतु गैर-कार्बनीकरण की प्रक्रिया दशकों तक चलने वाली है जिससे अर्थव्यवस्था को उभरने का मौका नहीं मिलेगा।

-वर्ष 1979 से शेष दुनिया (पश्चिमी देशों को छोड़कर) को कार्बन उत्सर्जन में 63 प्रतिशत वृद्धि में 33 वर्ष लगे यानी 1.6 प्रतिशत वार्षिक वृद्धि, वहीं 2002 के पश्चात शेष दुनिया (पश्चिमी देशों को छोड़कर) को कार्बन उत्सर्जन में 77 प्रतिशत वृद्धि में महज 12 वर्ष लगे यानी 4.9 प्रतिशत की वार्षिक उत्सर्जन वृद्धि। अध्ययन के लेखक उपर्युक्त तर्क के द्वारा यह कहने का प्रयास कर रहे हैं कि केवल विकसित देशों की उत्सर्जन कटौती प्रयासों से वैश्विक उत्सर्जन कमी में कोई सार्थक सफलता हासिल होने वाला नहीं है।

वैसे इसमें कोई दो राय नहीं कि कोविड-19 की वजह से जो आर्थिक नुकसान हुआ है उसकी भारपायी के लिए तेजी से प्रयास किये जाएंगे जिसे सरकारी नीतिगत समर्थन भी प्राप्त होगा। इस क्रम में हो सकता है कि जलवायु कार्रवाइयों से थोड़ा भटकाव भी हो जिससे पेरिस लक्ष्य को धक्का पहुंचे। परंतु जिस तरह से पश्चिमी देशों को पाक-साफ व बलिदानी साबित करने का प्रयास रिपोर्ट में किया गया है, वह न्यायोचित व तार्किक प्रतीत नहीं होता। हमें नहीं भूलना चाहिए कि संयुक्त राज्य अमेरिका प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन के मामले में विश्व के अग्रणी देशों में शामिल है। दूसरा यह कि जलवायु परिवर्तन की वजह से चक्रवात, बाढ़ व सूखा जैसी चरम जलवायु घटनाओं का आर्थिक नुकसान पश्चिमी देशों को भी भुगतना पड़ेगा। अमेरिका के महासागरीय व वायुमंडलीय प्रशासन (एनओएए) ने ‘बिलियन डॉलर वेदर एंड क्लाइमेट रिव्यू’ शीर्षक से जारी अपनी रिपोर्ट में अनुमान लगाया है कि वर्ष 1980 से अब तक 265 मौसमी एवं जलवायु आपदाओं की वजह से अमेरिका को कुल 1.775 ट्रिलियन डॉलर की लगात चुकानी पड़ी है। इसलिए यह कहना कि जलवायु कार्रवाई पश्चिमी देशों पर आर्थिक बोझ है, उचित प्रतीत नहीं होता।

कोविड-19 ने वस्तुतः अवसर प्रदान किया है कि हम अपने आर्थिक भविष्य के पुनर्निर्माण का सतत मार्ग अपनाये। पृथ्वी दिवस 2020 के अवसर पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का संदेश दूरदर्शी प्रतीत होता है। वे कहते हैं कि ‘हमें रिकवरी को वास्तविक अवसर में बदलना चाहिए ताकि भविष्य के लिए सही चीज कर सकें। सार्वजनिक निधि का इस्तेमाल भविष्य के लिए किया जाना चाहिए न कि भूत के लिए।’ मानवीय गतिविधियां कितना खतरनाक हो सकती है, कोरोनावायरस इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। इसलिए किसी वैश्विक चुनौती का समाधान के लिए वैश्विक सहयोग की अपेक्षा है, विकसित एवं विकासशील, दोनों प्रकार के देशों को मिलकर जलवायु कार्रवाइयों को अंजमा देना पड़ेगा जिससे पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौता के लक्ष्यों को प्राप्त किया जा सके।

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