भूगोल और आप |

आपदा प्रबंधन हेतु स्थानीय क्षमता वृद्धि की जरूरत

प्रभाव के दृष्टिकोण से किसी भी आपदा, प्राकृतिक या मानव जनित, का स्वरूप क्या होगा, बहुत हद तक स्थानीय समुदाय, राज्य व  राष्ट्रीय सरकारों द्वारा पूर्व में किये गए बेहतर प्रबंधन व उस अनुरूप कार्रवाई पर निर्भर करता है। दो उदाहरण इस कथन की पुष्टि कर देता है। फनी चक्रवात व पटना बाढ़। जहां फनी चक्रवात में आपदा प्रबंधन के कारण भारत सरकार व ओडिशा राज्य सरकार को वैश्विक स्तर पर प्रशंसा प्राप्त हुयी, वहीं हाल में पटना बाढ़ के कारण राज्य सरकार की किरकिरी हुयी। जहां ओडिशा मामले में बेहतर समन्वयन व आपदा पूर्व की तैयारी व आपदा पश्चात की तत्परता स्पष्ट रूप से दिखी वहीं पटना बाढ़ में प्रबंधन महज कागजी सिद्ध होती दिखी।  यहां क्रियान्वयन व समन्वयन के बीच भी अंतराल देखा गया जो कि बेहतर आपदा प्रबंधन के लिए अति जरूरी है।

जुलाई 2019 में, जो कि पटना बाढ़ से पूर्व की बात है, नई दिल्ली में ‘ग्लोबल इनक्लूसिव डिजास्टर मैनेजमेंट कांफ्रेंस ’(जीआईडीएमएस) आयोजित हुयी थी। सम्मेलन में आपदा से निपटने के लिए विभिन्न मुद्दों पर क्षेत्र से जुड़े विशेषज्ञों ने अपने विचार व अनुभव रखे थे। उस सम्मेलन की दो दिवसीय चर्चा से जो निष्कर्ष निकल कर सामने आए थे उनमें भी बहुत हद तक उपर्युक्त पक्ष को भी रेखांकित किया गया था। पटना बाढ़ को जलवायु परिवर्तन का कहर कहा गया जो सत्य भी हो सकता है परन्तु आपदा से हुए नुकसान को जलवायु परिवर्तन के मत्थे मढ़ देने से आपदा का जोखिम कम नहीं हो जाता। ‘‘जलवायु परिवर्तन जीवन का महत्वपूर्ण पक्ष बन चुका है, ऐसे में इसके द्वारा लाए गए परिवर्तनों के अनुकूल होना जरूरी है, जीआईडीएमएस का यह निष्कर्ष भी कुछ ऐसा ही है। सम्मेलन के दौरान कई विशेषज्ञों द्वारा यह पक्ष रखा गया कि आपदा की आवृत्ति व तीव्रता में बढ़ोतरी के लिए मानव जिम्मेदार है और चूंकि यह सभी व्यक्तियों पर असर डालता है, ऐसे में इसके प्रबंधन की जिम्मेदारी भी सभी की बनती है। इस प्रबंधन में स्थानीय समुदाय की बड़ी भूमिका होती है क्योंकि किसी भी आपदा के उपरांत त्वरित कार्रवाई स्थानीय लोगों द्वारा ही आरंभ की जाती है, ऐसे में विशेषज्ञों ने स्थानीय क्षमता व स्थानीय नेतृत्व को मजबूत किए जाने की आवश्यकता जतायी। स्थानीय के साथ-साथ वैश्विक  सहयोग की भूमिका भी आपदा से होने वाले नुकसान को कम कर सकता है। विभिन्न वैश्विक समुदायों के बीच सहयोग से फनी चक्रवात के प्रभाव को कम करने में मदद मिली, हालांकि इस चक्रवात से लोगों की कम जानें गईं परंतु आजीविका का जरूर नुकसान हुआ। इसी के मद्देनजर भविष्य में इस पक्ष पर भी विचार करने की आवश्यकता पर भी बल दिया गया।

सम्मेलन के दौरान आपदा प्रबंधन के कई अन्य पहलुओं व जरूरतों पर भी विचार-विमर्श किया गया। इस विचार-विमर्श से जो बातें निकलकर सामने आईं, वे निम्नलिखित हैंः

-वर्ष 2015 के नेपाल के भूकंप से उत्तर भारत का कई क्षेत्र भी प्रभावित हुआ था और इसने दर्शाया  कि उत्तर भारत भूकंप के खतरों के प्रति किस कदर संवेदनशील है। भविष्य में त्वरित शहरीकरण इसे और अधिक भूकंप प्रवण क्षेत्र बनाता है।

-आपदा के पश्चात बेहतर निर्माण से बेहतर है आपदा से पहले ही ऐसी संरचनाओं का निर्माण किया जाए जो शहरों को आपदा सहने लायक बनाए जिसमें रेजिलिएंट फ्यूचर के रूप में प्राकृतिक पर्यावास का संरक्षण भी शामिल है।

-कानून बनाने के साथ उसका क्रियान्वयन भी जरूरी है। आपदा प्रबंधन में महिलाओं एवं बच्चों की भूमिका को देखते हुए उनका सशक्तिकरण भी जरूरी है।

-आपदा प्रबंधन में वोलंटियर वर्षों से योगदान देते रहे हैं। इस परिप्रेक्ष्य में इस पर विमर्श किया गया कि स्थानीय लोगों को कैसे प्रशिक्षित किया जाए ताकि वे आपदा प्रबंधन की पहली पंक्ति सिद्ध हो सके।

-इस विषय पर भी चर्चा हुयी कि पूर्व-चेतावनी प्रणाली, ड्रोन, ग्राउंड सेंसर्स, मोबाइल ऐप, जीआईएस, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस जैसी आधुनिक प्रौद्योगिकियां उपशमन, राहत व बचाव हेतु डेटा प्रदान कर आपदा प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

-आपदा प्रबंधन में वैश्विक संधि, समझौतों एवं कंवेंशनों की भी महत्ती भूमिका रही है। सेंदाई फ्रेमवर्क, पेरिस समझौता, सतत विकास लक्ष्य आपदा जोखिम न्यूनीकरण व जलवायु परिवर्तन को रोकने से संबंधित है। इन समझौतों एवं अभिसमयों को ‘कार्रवाई का स्वरूप देने की आवश्यकता है।

दो दिवसीय परिचर्चा में यह भी उभर कर सामने आया कि मानव जनित या प्राकृतिक आपदाओं के कारण बड़ी-बड़ी कंक्रीट संरचनाओं के ध्वस्त होने के मामलों में बढ़ोतरी के साथ ‘शहरी खोज एवं बचाव’ (यूएसएआर) एक महत्वपूर्ण परिघटना सिद्ध हो रही है और किसी के बचने की संभावना आपदा के घटित होने एवं बचाव के बीच के समय पर निर्भर करता है।

सम्मेलन के दौरान कई अन्य महत्वपूर्ण सुझाव भी दिए गए जो भविष्य में भारत में आपदा प्रबंधन की दिशा में  कारगर सिद्ध हो सकता है और पटना बाढ़ जैसी विपदा से बचा सकता है। प्रायः विशेषज्ञ इस बात पर सहमत थे कि स्थानीय स्तर के संगठन प्राथमिक कार्रवाई करते हैं इसलिए उन्हें व्यापक वैश्विक मानवीय सहायता देने की जरूरत है।  निजी क्षेत्रों को इस क्षेत्र में आगे आने की जरूरत है और आपदा पूर्व की तैयारियों में भी उनकी संलग्नता को बढ़ाया जाना चाहिए।

जैसा कि पूर्व में भी कहा गया कि केवल आपदा प्रबंधन से सम्बंधित मार्गदर्शन बना लेने भर से आपदा से निपटने की तैयारी नहीं हो जाती, उसका बेहतर क्रियान्वयन सबसे अधिक मायने रखता है। इस क्रम में सम्मेलन का यह अभिकथन कि ‘परिस्थिति के बारे में केवल बातें करने से कुछ भी परिवर्तित नहीं होने वाला, बदलाव लाने के लिए कार्रवाई करने की जरूरत है, अति प्रासंगिक प्रतीत होता है।

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