भूगोल और आप |

आपदा बचाव का पारितंत्र आधारित दृष्टिकोण

एशिया आज त्वरित शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है और वर्ष 2018 में इसकी 54 प्रतिशत आबादी शहरी क्षेत्रों  में रह रही थी जिनका सकल घरेलू उत्पाद में 80 प्रतिशत से अधिक का योगदान है। शहरी केंद्रों को जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं के नुकसान के वृहत्त संचालकों में से एक माना जाता है जैसा कि जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं (आईपीबीईएस) पर अंतर-सरकारी साइंस पॉलिसी प्लेटफॉर्म (आईपीबीईएस) की रिपोर्ट से प्रत्यक्ष होता है जो कि पेरिस में जारी की गई थी। यदि वैश्विक स्तर पर देखें तो भारत में 10 मिलियन से अधिक आबादी वाले पांच मेगासिटी में विश्व की कुल शहरी आबादी का 14 प्रतिशत रहती है। वर्ष 2030 तक ऐसी मेगासिटी की संख्या सात तक पहुंचने की उम्मीद है। तेजी से बढ़ती मेगासिटी के अलावा, वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 10 मिलियन (एक करोड़) से अधिक आबादी वाले 53 शहर हैं जबकि वर्ष 2001 में ऐसे शहर 35 थे। यह तेजी से होने वाले शहरी विस्तार को दर्शाता है जो सिर्फ एक दशक में हुआ है। देश के शीर्ष 100 शहरों का लगभग 2.5 गुना स्थानिक विस्तार-जो जमीन पर 5000 वर्ग किमी का विस्तार है, आश्चर्यजनक है। भारत की दशकीय जनसंख्या वृद्धि 2001 से 2011 तक 17.6 प्रतिशत रही है, वहीं इसी अवधि में शहरी आबादी में 31.8 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई- जिसके क्रमशः 2020 और 2050 तक 33.9 और 47.8 प्रतिशत होने का अनुमान है। ये शहरी केंद्र गहन व असाधारण पारिस्थितिकीय, कार्बन और जल ‘पदचिह्न’ (फुटप्रिंट) के रूप में ज्ञात हैैं, जिसका प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों पर अप्रत्याशित प्रभाव भी पड़ता है। भू-जलवायु और सामाजिक-आर्थिक स्थितियों से जुड़ी वलनरेबिलिटी भारत को एशिया के सबसे अधिक आपदा प्रवण देशों में से एक बनाती है। गैर-व्यवस्थित और अस्पष्टीकृत विस्तार, दीर्घकालिक व्यापक नियोजन की अनुपस्थिति और खराब शहरी शासन ऐसे प्रमुख कारक (संचालक) हैं जिन्होंने पिछले कुछ दशकों में आपदा जोखिम को गहन किया है। शहरी क्षेत्र नए आपदा हॉटस्पॉट हैं और जलवायु परिवर्तन ने नुकसान/जोखिम को तीव्रतर ही किया है। चरम घटनाओं में वृद्धि केवल घटनाओं की संख्या में वृद्धि ही नहीं है, बल्कि इसकी तीव्रता में बढ़ोतरी भी है, जिसने सभी भारतीय शहरों को आपदा तैयारी और उपशमन हेतु उपाय करने की आवश्यकता को जरूरी कर दिया है। अनिश्चितताओं के खिलाफ जुझारूपन (रिज़िलीएन्स) अब एक विकल्प नहीं है, बल्कि अनिवार्य शर्त है, और विशेष रूप से टियर-2 और टियर-3 शहरों के लिए यह शहरी नियोजन का हिस्सा होना चाहिए, जहां आपदा की तैयारी को शामिल करने की गुंजाइश अभी भी मौजूद है। भारत के वलनेरेबिलिटी एटलस में 38 शहर शामिल हैं जो भूकंपीय संवेदनशीलता क्षेत्रों में स्थित हैं, जो उन्हें प्राकृतिक आपदाओं के लिए अत्यधिक असुरक्षित बनाते हैं। देश के उच्च घनत्व वाले शहरी क्षेत्र अधिक जोखिमों के प्रति असुरक्षित है।

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