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जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से कृषि पर मंडराता खतरा

वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के कृषि उत्पादनों पर प्रतिकूल प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया है कि इसके कारण न केवल जल स्रोत सूख जायेंगे अपितु शीतोष्ण व समशीतोष्ण क्षेत्रों में अधिकांश उपजाऊ भूमि में बढ़ते तापमान के कारण दरारें पड़ जायेगी। यही नहीं, चावल व मक्का की उपज की मात्रा वर्तमान की तुलना में 40 प्रतिशत रहने से ‘खाद्य सुरक्षा’ खटाई में पड़ जायेगी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट रूप से संकेत दिया गया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से सर्वाधिक प्रभावित दक्षिणी ब्राजील, उत्तरी भारत, दक्षिणी चीन, दक्षिणी आस्ट्रेलिया एवं अफ्रीका होंगे। गौरतलब है, इस क्षेत्र की अधिकांश जनसंख्या की आजीविका का मुख्य आधार कृषि ही है। अतः जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण कृषि उत्पादानों पर संकट आने से अधिकांश जनसंख्या के लिए रोजी-रोटी की व्यवस्था करना मुश्किल हो जायेगा, इसके साथ ही बढ़ते तापमान के कारण कृषि उपज में कमी होने से खाद्यान्नों की व्यवस्था करना चुनौती पूर्ण हो जायेगा।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण कृषि पर मंडराते खतरों के प्रति सचेत करते हुए इंटरनेशनल सेंटर फॉर रिसर्च इन एग्रोफारेस्ट्री के निदेशक डॉ. कुलूस टोपर ने भी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि आने वाले दिन जलवायु परिवर्तन के भीषणतम उदाहरण होंगे जो कृषि उत्पादकता पर चोट, जल दबाव, बाढ़, चक्रवात व सूखे जैसी गंभीर दशाओं को जन्म देंगें। हकीकत यह है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण कृषि व्यवस्था पर प्रतिकूल असर पड़ने से सम्पूर्ण विश्व में ‘खाद्यान्न संकट’ की विकरालता बढ़ जायेगी जो कि चिन्ता का विषय है।

बढ़ती जनसंख्या, बढ़ते उद्योगों एवं विध्वंस होते वनों एवं जंगलों के कारण विश्व ‘बढ़ते तापमान’ एवं जलवायु परिवर्तन जैसी ज्वलन्त समस्याओं से जूझता हुआ विनाश के कगार पर खड़ा है। वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण सम्पूर्ण पृथ्वी में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं। ऐसा अनुमान व्यक्त किया गया है कि गत् एक शताब्दी के दौरान पृथ्वी के औसत तापमान में लगभग 0.74 डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि हुई है। जबकि गत पचास वर्षों के दौरान वैश्विक तापमान में वृद्धि दोगुनी हो गई है। इससे भी अधिक चिन्ताजनक तथ्य यह है कि इक्कीसवीं सदी में तापमान में वृद्धि तीन से पांच डिग्री सेल्सियस होगी जो कि समस्त विश्व के लिए खतरनाक स्थिति होगी। मानव विकास रिपोर्ट में भी आईपीसीसी के अध्ययन के आधार पर यह चेतावनी समस्त विश्व को दी गई है कि यदि वर्तमान प्रवृत्ति के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग जारी रही तो जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के घातक परिणाम सामने आयेंगे।

इस रिपोर्ट में विशेष रूप से विकासशील और निर्धन देशों को सतर्क किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के सर्वाधिक घातक रूप में इनको सहन करने पड़ेंगें क्योंकि इनके पास ऐसी मुसीबतों का मुकाबला करने के लिए न तो पर्याप्त साधन उपलब्ध हैं और न ही कोई प्रभावी उपाय विद्यमान हैं। जलवायु परिवर्तन के प्रभाव ने वातावरण को विखण्डित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। कृषि कार्यों, घरेलू कार्यों तथा वाहनों में डीजल, पैट्रोल व अन्य ऊर्जा स्रोतों का उपयोग तथा जनसंख्या वृद्धि के कारण लकड़ी, गैस व कैरोसिन का उपयोग उत्तरोत्तर बढ़ता जा रहा है। इन सब की वजह से वातावरण में कार्बन-डाई आक्साइड की मात्रा तेजी से बढ़ती जा रही है। वातावरण में कार्बन की मात्रा अधिक संचित होने के दुष्परिणाम सामने आ रहे हैं। समस्त विश्व में तूफान, चक्रवात, सुनामी व वनों में आग लगने की घटनाएं तेजी से बढ़ती जा रही हैं जो मानव सभ्यता के लिए खतरे का संकेत है।

विभिन्न रिपोर्टों एवं आंकड़ों के विश्लेषण से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि विश्व में बढ़ते तापमान व जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन में कमी दर्ज की जा रही है, फसल चक्र अनियमित व असंतुलित होता जा रहा है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण वर्तमान में पृथ्वी का पारिस्थितिकी तंत्र तेजी से परिवर्तित हो रहा है। मानव एवं पशुओं की दिनचर्या एवं जीन चक्र असंतुलित होता जा रहा है। धरती पर से छोटे जीव निरन्तर विलुप्त होते जा रहे हैं और 26 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक वनस्पतियों और प्राणियों का अस्तित्व लगभग समाप्त प्राय हो गया है।

वैश्विक तापमान में वृद्धि तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के बढ़ते खतरों के प्रति आगाह करते हुए आईपीसीसी ने भविष्यवाणी की है कि ‘‘वर्ष 2100 तक तापमान में 1.1 डिग्री सेंटीग्रेड से 6.4 डिग्री सेंटीग्रेड तक की वृद्धि संभव है, समुद्री जलस्तर में 18 से 58 से.मी. की बढ़ोतरी हो सकती है।’’ इस रिपोर्ट में यह भयावह तस्वीर भी प्रस्तुत की गई है कि वर्ष 2080 तक 3.20 अरब लोगों को जल उपलब्ध नहीं होगा, 60 करोड़ लोगों के भूखे मरने की नौबत आ जायेगी, अल्पाइन और दक्षिणी अमेरिका के अमेजन वनों के समाप्त प्राय होने की संभावना बढ़ जायेगी।

जलवायु परिवर्तन का प्रमुख दुष्प्रभाव विभिन्न देशों में बढ़ते जल संकट के रूप में देखा जा सकता है। भारत के कुछ हिस्सों यथा कच्छ, सौराष्ट्र व राजस्थान में जल संकट की स्थिति भयावह होने के कारण सूखे की गंभीर स्थिति उत्पन्न हो सकती है, जबकि देश के दूसरे हिस्सों में बाढ़ की विभीषिका तबाही उत्पन्न कर सकती है। ऐसा अनुमान विभिन्न शोध अध्ययनों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है।

देश में पिछले चालीस वर्षों में होने वाली वर्षा की मात्रा में निरंतर गिरावट आ रही है। बीसवीं सदी के प्रारम्भ में औसत वर्षा 141 सेंटीमीटर थी जो नब्बे के दशक में कम होकर 119 सेंटीमीटर रह गई है। उत्तरी भारत में पेयजल का संकट तीव्रतर होता जा रहा है, यहाँ प्रत्येक तीन साल में अकाल व सूखा की काली छाया मंडराती है। यही नहीं, गंगोत्री ग्लेशियर प्रतिवर्ष तीस मीटर की दर से सिकुड़ रहा है। ऐसा भयावह अनुमान प्रस्तुत किया गया है कि वर्ष 2030 तक गंगा सूख सकती है। ज्ञातव्य है कि उत्तराखण्ड की कोसी नदी पहले ही सूख कर ‘‘वैश्विक तापमान’’ की व्यथा अभिव्यक्त कर रही है। देश के विभिन्न क्षेत्रों में भू-जलस्तर में तीव्र गिरावट दर्ज की जा रही है जिसके कारण खेती के लिए सिंचाई व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लग गया है। पानी के अभाव में खेती घाटे का सौदा बन गई है। कृषकों का खेती के प्रति रूझान उत्तरोत्तर कम होता जा रहा है जो कि चिन्ता का विषय है।

विभिन्न अध्ययनों के आधार पर यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि यदि तापमान में 2 डिग्री सेटीग्रेड के लगभग वृद्धि होती है तो गेहूँ की उत्पादकता में कमी आयेगी। जिन क्षेत्रों में गेहूँ की उत्पादकता अधिक है, वहाँ पर यह प्रभाव कम परिलक्षित होगा तथा जहाँ उत्पादकता कम है उन क्षेत्रों में उत्पादकता में कमी अधिक होगी। ऐसा अनुमान व्यक्त किया गया है कि तापमान के 1 डिग्री सेटीग्रेड बढ़ने पर गेहूँ के उत्पादन में 4-5 करोड़ टन की कमी होगी। यही नहीं, वर्ष 2100 तक फसलों की उत्पादकता में 10 से 40 प्रतिशत तक कमी आने से देश की खाद्य-सुरक्षा के खतरे में पड़ जाने की प्रबल संभावना है। ऐसा अनुमान है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से रबी की फसलों को अधिक नुकसान होगा। इसके अतिरिक्त वर्षा आधारित फसलां को अधिक नुकसान होगा क्योंकि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण वर्षा की मात्रा कम होगी जिसके कारण किसानों को सिंचाई हेतु जल उपलब्ध नहीं हो पायेगा।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण कच्छ और सौराष्ट्र, जो गुजरात के कुल क्षेत्रफल के 25 प्रतिशत तथा राजस्थान के 60 प्रतिशत अंश में फैले हुए हैं, में जल संकट की तस्वीर विकराल हो जायेगी जिसके कारण कृषकों की आजीविका पर प्रश्न चिह्न लग जायेगा। यही नहीं, माही, पेन्नार, साबरमती तथा ताजी नदियों में भी जलाभाव की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी जबकि दूसरी तरफ गोदावरी, महानदी तथा ब्राह्मणी में ‘‘भीषण बाढ़’’ के हालात उत्पन्न होने की आशंका बनी रहेगी। जिससे कृषकों को भारी तबाही का सामना करना पड़ेगा।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव की वजह से अर्द्धशुष्क क्षेत्रों व शुष्क क्षेत्रों में कृषि व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न लग जायेगा तथा सिंचाई हेतु जल प्राप्त नहीं होने से फसलें चौपट हो जायेंगी। इसी भांति, बड़ी नदियों के तटों पर जल बहाव, लवणता, बाढ़ व औद्योगिक प्रदूषण में वृद्धि के कारण जल की उपलब्धता में कमी आने का खतरा बढ़ जायेगा।

गौरतलब है कि जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापमान में वृद्धि के कारण न केवल फसलों के उत्पादन में कमी हो रही है अपितु उत्पादन की गुणवत्ता में भी ह्रास हो रहा है। अनाज व अन्य खाद्य फसलों में पोषक तत्वों व प्रोटीन की कमी हो जायेगी, जिसके कारण ‘सन्तुलित व पौष्टिक भोजन’ की व्यवस्था करना दिवा-स्वप्न मात्र बन कर रह जायेगा।

देश में उद्योग धन्धों, मोटर-वाहनों से उगलते धुएं के कारण वायु में कार्बनडाई ऑक्साइड, नाइट्रस ऑक्साइड आदि जहरीली गैसों की वृद्धि होने के कारण अम्लीय वर्षा का वृक्षों, पौधों व पत्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है तथा वे विनाश के कगार पर पहुँच जाते हैं।

इसी प्रकार, कृषि के लिए जल के साथ मिट्टी भी एक आवश्यक घटक है। ऐसी संभावना है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण मिट्टी की उर्वरता में कमी आने के साथ उसमें लवणता बढ़ेगी तथा जैव विविधता घटती जायेगी। मिट्टी में उपस्थित उपयोगी तत्व यथा  अम्लीय वर्षा के कारण नष्ट होने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति क्षीण हो जाती है। इन सब के कारण मिट्टी की नमी व कार्यक्षमता पर विपरीत प्रभाव पड़ेगा। रासायनिक खादों के अधिकाधिक उपयोग के कारण मिट्टी की उर्वरता पहले ही काफी कम हो चुकी है तथा जलवायु परिवर्तन की वजह से मिट्टी के बंजर होने में कोई कसर बाकी नहीं रहेगी।

जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण देश की दुग्ध उत्पादन क्षमता पर भी विपरीत प्रभाव पड़ेगा। गौरतलब है कि वर्तमान में देश का दुग्ध उत्पादन के दृष्टिकोण से विश्व में प्रथम स्थान हैं। ऐसा निराशाजनक अनुमान प्रस्तुत किया गया है कि जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के कारण दुग्ध उत्पादन में वर्ष 2020 तक 1.6 करोड़ टन तथा 2050 तक 15 करोड़ टन तक गिरावट आने की संभावना है। संकर नस्ल की पशु प्रजातियाँ गर्मी के प्रति कम सहनशील होने के कारण उनकी प्रजनन क्षमता व दुग्ध क्षमता पर अधिक प्रतिकूल असर पड़ता है।

चूंकि हमारे देश की 70 प्रतिशत जनता खेती से प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है, कृषि ही उनके जीवन-यापन का मुख्य स्रोत है। अतः जलवायु परिवर्तन के भयावह खतरों से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति का क्रियान्वयन अतिशीघ्र किया जाना आवश्यक है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिशद ने कृषि पद्धतियों में परिवर्तन करके जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने की दिशा में सार्थक कदम बढ़ाये हैं। इस संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि जलवायु मानकों में परिवर्तनों की मार को बुआई की वैकल्पिक विधियों, छोटे अंतरालों तथा उचित व उन्नत जल प्रबंधन व सिंचाई प्रणालियों, अनुकूली पौधारोपण कार्यक्रमों तथा भू-उपयोग नियोजन व्यवस्था में सुधार करके कम किया जा सकता है। जैव विविधता, मिश्रित खेती, पशुधन आदि को प्रोत्साहित करके भी जलवायु परिवर्तन के प्रभाव के दबाव को कम किया जाना संभव है।

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