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प्लूटो को ग्रह का दर्जा दिलाने पर नई शोध

वर्ष 2006 में अंतरराष्ट्रीय खगोल संघ की 26वीं महासभा में ‘ग्रह’की नई परिभाषा से संबंधित एक प्रस्ताव पारित किया गया और इस नई परिभाषा के आधार पर प्लूटो को ग्रह की श्रेणी से बाहर कर दिया गया और उसे बौना ग्रह का दर्जा दिया गया। इस परिभाषा के अनुसार वह खगोलीय पिंड जो सूर्य का चक्कर लगाता हो, जो गोलाकार हो, किसी अन्य पिंड का चक्कर नहीं लगाता हो और और जिसने अपनी कक्षा को साफ कर दिया हो यानी वह निकाय चक्कर लगाने वाले अपने कक्ष में छोटे-छोटे पिंडों को रास्ते से हटा दिया हो, ग्रह कहलाएगा। प्लूटो गोलाकार है, सूर्य का चक्कर भी लगाता है परंतु परिक्रमा पथ के अन्य पिंडों की तुलना में प्लेटो का द्रव्यमान 00.7 प्रतिशत है। इसकी तुलना में पृथ्वी का द्रव्यमान इसके कक्षीय पिंडों की तुलना में 1.7 मिलियन गुणा अधिक है। इसका मतलब यही है कि प्लूटो इतना बड़ा नहीं है कि यह अपने पड़ोसी पिंडों को साफ कर सके। चूंकि नेप्चयून का गुरुत्वाकर्षण इसके पड़ोसी ग्रह प्लूटो को प्रभावित करता था और प्लूटो अपनी कक्षा को काइपर बेल्ट स्थित जमे गैस एवं वस्तुओं के साथ साझा करता था। इसी आधार पर इसे बौना ग्रह करार दिया गया।

हालांकि फ्लोरिडा स्पेस इंस्टीट्यूट के खगोल वैज्ञानिक फिलिप टी. मेटजर के नए अध्ययन के अनुसार ग्रहों को वर्गीकृत करने का अंतरराष्ट्रीय खगोल संघ की परिभाषा प्लूटो पर उपलब्ध शोध साहित्य द्वारा समर्थित नहीं है इसलिए वह अवैध है। ‘इकारस’ नामक वैज्ञानिक पत्रिका में ‘द रिक्लासिफिकेशन ऑफ एस्ट्रोयाड्स फ्रॉम प्लैनेट्स टॅू नॉन-प्लेनेट्स‘  नाम से छपे शोध आलेख के मुताबिक विगत 200 वर्षों के वैज्ञानिक साहित्यों के अध्ययन में केवल एक में, जो कि 1802 का है  कक्षा को साफ करने को ग्रहों के वर्गीकरण का आधार बताया गया है। उस साहित्य में जिन तर्कों को आधार बनाया गया है उसे आज अस्वीकार कर दिया गया है। इसके अलावा शनि ग्रह का चंद्रमा टाइटन एवं बृहस्पति के चंद्रमा यूरोपा को गैलिलियो के समय से ही वैज्ञानिकों ने ग्रह नाम से पुकारा है।

उनके अध्ययन के मुताबिक, साहित्यिक समीक्षा यह दर्शाती है कि ग्रहों एवं अन्य आकाशीय पिंडों (क्षुद्रग्रह इत्यादि) के बीच वास्तविक विभाजन 1950 के दशक में हुआ जब गेरार्ड कुइपर ने दोनों तरह के आकाशीय पिंडों के निर्माण में भेद को निर्धारित किया। हालांकि अब इसे आधार नहीं बनाया जाता कि कोई आकाशीय पिंड ग्रह है नहीं है। इनके अनुसार हाल में 100 से भी अधिक उदाहरण हैं जिसमें खगोलीय वैज्ञानिकों ने ग्रह शब्द का उपयोग किया जो कि अंतरराष्ट्रीय खगोल संघ की परिभाषा का उल्लंघन है फिर भी वे ऐसा कर रहे हैं क्योंकि प्रचालकीय दृष्टिकोण से उपयोगी है। शोधकर्त्ताओं के मुताबिक ‘अपनी कक्षा को साफ करना’ की कोई साफ परिभाषा नहीं है। यदि इस वाक्य को शब्दसः लिया जाये तो वास्तव में कोई ग्रह है ही नहीं क्योंकि कोई भी ग्रह अपनी रास्ता को साफ नहीं करता। गतिकी या डायनामिक्स स्थिर नहीं है, वे निरंतर परिवर्तित हो रही हैं। इसलिए यह शर्त किसी पिंड की मौलिक व्याख्या  नहीं हो सकती।

नए शोध से जुड़े एक अन्य वैज्ञानिक के अनुसार आईएयू की परिभाषा त्रुटिपूर्ण है क्योंकि ‘कक्षा को साफ करना’ ग्रह एवं अन्य पिंडों के बीच विभाजन की कोई मानक अभिक्रिया नहीं रही है। चूंकि यह एक गलत ऐतिहासिक दावा है, ऐसे में इसे प्लूटो पर नहीं अपनाया जाना चाहिए था।  फिलिप टी. मेटजर के अनुसार एक ग्रह की परिभाषा उसकी अंतर्भूत पर होनी चाहिए न कि उसकी बाह्य गतिविधियों पर (जैसे कि उसके कक्षा की विशिष्टता) जो कि बदल भी सकता है। इन वैज्ञानिकों के अनुसार कोई आकाशीय पिंड ग्रह है या नहीं, इसका वर्गीकरण इस आधार पर होना चाहिए कि यह इतना बड़ा है या नहीं कि इसकी ग्रैविटी इसे तरल स्थैतिक (हीड्रास्टाटिक) संतुलन को प्राप्त करने में मदद करे अर्थात वह गोलाकार बन जाए।

प्लूटो के बारे में

  1. प्लूटो की खोज 1930 में क्लाइड डब्ल्यू टॉमबाग ने की थी। इसका आकार पृथ्वी के चंद्रमा से भी छोटा है। इसका आकाश नीला है, इसके पर्वत रॉकी से ऊंचे है परंतु इसका बर्फ लाल है। प्लूटो के बारे में और अधिक रोचक जानकारियां जुलाई 2015 में न्यू होराइजंस नामक मिशन के फ्लाइबाय से संभव हो सकी।
  2. वर्ष 2006 से पहले तक प्लूटो हमारी सौर प्रणाली का नौवां ग्रह था। किंतु काइपर बेल्ट में ही प्लूटो के जैसे ही अन्य आकाशीय पिंडों की खोज के पश्चात प्लूटो को ग्रह से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।
  3. प्लूटो के पांच ज्ञात चंद्रमा है। ये हैंः चैरोन, हाइड्रा, निक्स, कर्बेरोस एवं स्टाइक्सी। इनमें चैरोन सबसे बड़ा है।
  4. अभी इसे बौना ग्रह कहा जाता है।

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