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बहुप्रकार लाभकारी है बांस के शूट का उपयोग

संजीवनी या पुनः जन्म देने वाला जड़ी जिसका अविष्कार व प्रचार रामायण के समय में  किया गया, वह है बांस, जो मूलतः एक घास है और वैदिक काल में इसे दवा या इमारती कार्य में लाने के अनेक प्रमाण मौजूद हैं। आमतौर पर मनुष्य ने बांस का प्रयोग अपने जीवन में, चाहे वह वैदिक काल रहा हो या आज का नवयुग, प्रचुर मात्रा में किया है।

सामान्य जानकारी : आज के समय में मनुष्य ने लकड़ी को अपनी जरूरत की पहली पसंद बनाकर जंगलों की अंधाधुंध कटाई की है, जो निरंतर जारी है। इस परिप्रेक्ष्य में अगर हम देखें तो पर्यावरण असंतुलन से अपरिचित नहीं है। इसका कारण लकड़ी के विकल्प का न होना नहीं है, बल्कि विकल्प की अनदेखी करना है। आज हमारे पास प्रचुर मात्रा में बांस उपलब्ध है जिसे आसानी से लकड़ी के विकल्प के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। जरूरत है जानकारी, इच्छा शक्ति व बांस को अपनाने की, जो मानव जीवन के लिए निश्चित ही एक मील का पत्थर साबित होगा।

बांस आधारित उद्योग : बांस को हम विभिन्न प्रकार के प्रयोग में ला सकते हैं जैसे – खाने में, इमारती सामान बनाने में, लकड़ी का विकल्प, दवाईयां, हस्त शिल्प, बड़े उद्योग, पैकिंग उद्योग इत्यादि में।

बांस का जूस : बांस के पत्तों से निर्मित यह गहरे पूरे रंग का द्रव जो निकालने व साफ करने की उच्च श्रेणी की तकनीक द्वारा तैयार किया जाता है। इस जूस में फ्लैवोनौनडस, फेनोल एसिड, इनर इस्टर्स, एन्थ्राक्वीनोन्स, पॉली सक्काराइड्स, एमीनो एसिड्स, पेप्टाइड्स, मैंगनीज, जींक और सेलेनियम जैसे एक्टीव कंपोनेन्ट होते हैं। टीन में पैक यह जूस चीन और हांगकांग में बिकता है। इसी तरह बांस के पत्ते से बियर तैयार होती है। अधिक समय तक इसके सेवन से खून में लिपिड की मात्रा घटती है, हृदय मजबूत होता है और इंसान की उम्र बढ़ती है।

बांस का शूट पहली बार निकलने वाला तना है जिसे जमीन से बाहर दिखते की काट लिया जाता है। इसे ताज़ा या प्रोसेस्ड (टीन में पैक या जमा) करके खाया जाता है। सूखे हुए, काटे हुए व ताजे बांस के शूट वैसे ही स्वाद लेकर खाये जा सकते हैं जबकि इसके बेहतरीन अचार भी बनते हैं। ताजे बांस के शूट कुरकुरे व मीठे होते हैं। इस शूट में प्याज के बराबर पौष्टिक तत्व मौजूद होते हैं और इसमें फाइबर की मात्रा भी बहुतायत में होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार बांस के शूट कैंसर रोकने में भी प्रभावी होते हैं जिस कारण से यह दक्षिण एशियाई देशों में काफी लोकप्रिय है। यह विटामिन, सेल्युलोज, एमीनो एसिड और बाकी सभी तत्वों से भरपूर है और इसके सेवन से भूख बढ़ाने, रक्त चाप व कोलेस्ट्रोल घटाने में भी सहायता मिलती है।

बांस के शूट में 90 प्रतिशत पानी होता है और इसकी बेहतरीन उपज के लिए पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है। बड़े शूट का 40-50 प्रतिशत हिस्सा ही खाने योग्य होता है जबकि छोटे शूट में यह प्रतिशत और घट जाता है। बांस के शूट ग्रामीण विकास में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं और बरसात में जब बाकी सभी फसलों की पैदावार नहीं होती तब भी यह ग्रामीणों को आमदनी देता है।

बांस के शूट के लिए उपयुक्त किस्में : अधिकतर किस्मों से खाने योग्य बांस के शूट मिलते हैं जबकि इनके आकार व कड़वाहट विभिन्न तरह के होते हैं। बांस की किस्मों को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है, एक हैं कलम्पिंग और दूसरा रनिंग। क्लम्पिंग किस्म की बांस के शूट की पैदावार मध्य-गर्मी के बाद होती है। जबकि रनिंग किस्में बसन्त ऋतु में होती हैं।

बांस के शूट के उत्पादन के लिए इकाई स्थापित करने की संभावनाएं : बांस के शूट की प्राप्ति के लिए बांस की किस्में समस्त भारत के अधिकतर राज्यों में आसानी से उपलब्ध हैं और शूट प्रोसेसिंग यूनिट सभी जगह आसानी से स्थापित हो सकते हैं।

बांस के शूट से कच्चे बांस की तुलना में अधिक आय प्राप्त की जा सकती है। बांस के शूट की बढ़ती मांग के साथ आसानी से श्रमिकों की उपलब्धता से उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में छोटी औद्योगिक इकाइयों के विकास की संभावनाएं काफी बढ़ गई हैं।

भवन निर्माण में इस्तेमाल : मकान बनाने में बांस का चयन इसकी लचीले व मनचाहे साईज पर काटने की दृष्टि से किया गया है। कम लागत पर ठेकेदार इसका लगातार प्रयोग करते सकते हैं क्योंकि स्टील के मुकाबले सिर्फ 6 प्रतिशत लागत आती है और इसे लगाना व हटाना भी आसान है। विकसित देशों में भी इसे प्रमुखता दी जाती है और ऊँची इमारतों के लिए निरंतर इसका इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। बांस जिन देशों में उगता है वहां इसका इस्तेमाल ऊँची इमारतें बनाने में जारी है। इमारतों की बढ़ती लंबाई के बावजूद बांस अपनी जगह बनाये हुए है।

इमारत बनाने के लिए स्टील का ढांचा एक प्रतिबद्ध मानक पर उपलब्ध है, जिसकी तुलना में यह कम समय में लगाया व हटाया जा सकता है। स्टील के ढांचे को 50 से भी अधिक बार इस्तेमाल किया जा सकता है जबकि बांस के ढांचे को 5 से 10 बार ही इस्तेमाल किया जा सकता है। इस लिहाज से बांस के ढांचे को तकनीकी रूप से विकसित करने की आवश्यकता है। भारत में बांस के ढांचे का इस्तेमाल तो बहुत होता है पर इससे कच्चे बांस की कीमत पर कोई असर नहीं पड़ रहा है। 13.47 मिलियन टन बांस की खपत में से 3.4 मिलियन टन का ही मकान बनाने में इस्तेमाल होता है।

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