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हीट वेव से ग्रेट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef) को भारी नुकसान

नेचर पत्रिका में 18 अप्रैल, 2018 को प्रकाशित एक अध्ययन रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2016 में आस्ट्रेलिया की हीट वेव से ग्रेट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef) को भारी नुकसान पहुंचा है। इस रिपोर्ट के अनुसार अप्रत्याशित स्तर पर प्रवाल विरंजन या कोरल ब्लीचिंग (coral bleaching) के कारण, जो कि हीट वेव का परिणाम था, सामूहिक रुप से कोरल मृत पाये गये। इससे ग्रेट बैरियर रीफ (Great Barrier Reef ) में पायी जाने वाली 3,863 वैयक्तिक भित्तियों या रीफ में से एक तिहाई प्रजातीय संरचना नाटकीय रुप से बदल गयीं।

-विस्तृत हवाई सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि मार्च और अप्रैल 2016 के बीच प्रवाल विरंजन या कोरल ब्लीचिंग चरम पैमाने पर हुयी। प्रवाल विरंजन की परिघटना तब घटित होती है जब अत्यधिक गर्मी या तो प्रवाल को मार देती है या जोएजेनथेली (zooxanthellae) नामक शैवाल को बाहर कर देती है। रीफ का निर्माण करने वाले कोरल से इन शैवालों का सहजीवी संबंध है। शैवाल, प्रकाशसंश्लेषण क्रिया के द्वारा इन प्रवालों को ऊर्जा व पोषक तत्व प्रदान करते हैं जिनके बिना प्रवाल जीवित नहीं रह सकते हैं। बहुत सारे प्रवाल उष्ण दबाव के कारण तुरंत मर गये जबकि अन्य प्रवाल, शैवालों के विलग होने से धीरे-धीरे मरते गये।

वर्ष 2016 से पहले वैश्विक प्रवाल विरंजन की घटनाएं 1998 एवं 2002 में घटित हो चुकी हैं। वैसे इस तरह की परिघटनाओं से प्रवाल उबर जाता है परंतु दुखद तथ्य यह है कि हीट वेव जनित प्रवाल विरंजन की इस परिघटना में वैसे प्रवाल अधिक शिकार हुये जो सर्वाधिक तेजी से वृद्धि करने वाले हैं। उनका स्थान मंद गति से वृद्धि करने वाले प्रवाल भित्तियों ने ले लिया है। समुद्री पारितंत्र के लिए यह शुभ संकेत नहीं है।

क्या होती हैं प्रवाल भित्तियां?

प्रवाल या मूंगा उष्ण कटिबंधीय महासागरों में पाया जाने वाला जीव है जो मुख्यतः 300 उत्तरी अक्षांशों से 300 दक्षिणी अक्षाशों के मध्य पाया जाता है क्योंकि इनके जीवित रहने के लिए 200 से 220 C तापमान की आवश्यकता होती है। इनके लिए अवसाद रहित जल रहना चाहिए लेकिन पूर्ण स्वच्छ जल भी हानिकारक होता है। इनका विकास अन्तः सागरीय चबूतरों पर होता है। यह अधिकतम 150 से 250 फीट या 66.77 मीटर की गहराई तक ही पाये जाते हैं क्योंकि इसके बाद इनके लिए उपयुक्त भौगोलिक दशाएँ प्राप्त नहीं होती हैं। इसके अतिरिक्त इनकी निम्नलिखित विशेषताएं हैं:

-ये कर्क एवं मकर रेखा के मध्यवर्ती समुद्री क्षेत्रों के पास पाये जाते हैं। जहाँ सागरीय जल की लवणता  27‰-30‰ होती है।

-जब मूँगा के खोल एक-दूसरे के पास आते है, तो ये एक चट्टान का रूप धारण कर लेते हैं, जिसे मूँगा की चट्टान अथवा भित्ति कहते हैं।

-सामान्यतया ये हल्के ज्वार के समय अधिक दिखाई देते हैं, परन्तु गहरे ज्वार आने पर ये जल से ढक जाते हैं। वर्तमान में जनसंख्या का वितरण उन्हीं स्थानों पर है, जहाँ इनकी समुद्र तल से अधिक ऊँचाई है। ये समुद्र में चार प्रमुख आकृतियों का निर्धारण करते हैं, जो इस प्रकार हैं:

  1.  तटीय प्रवाल भित्ति: इस प्रकार की भित्ति महाद्वीपीय मग्नतट के पास होती है और इस प्रकार का मूँगा जीव तट के पास वाले छिछले स्थानों पर जमा होता जाता है एवं एक चट्टानीय संरचना तैयार हो जाती है। इस स्थान पर समुद्र गहरा नहीं होता एवं कभी-कभी यह सबसे ऊँचा भी दिखाई देता है। इससे पूर्व वाले भागों में लेगून का निर्माण होता है, जिसे बोट चैनल कहते हैं। ये द. फ्लोरिडा, मलेशिया, समाऊ फ्लोरिडा, मलेशिया द्वीप, अण्डमान एवं मन्नार की खाड़ी में रामेश्वरम् नामक स्थान के समीप मिलते हैं।
  2. बैरियर रीफ या अवरोधक प्रवाल भित्तिः महाद्वीपीय मग्न तट से कुछ दूरी पर अगर कोई पहाड़ी श्रृंखला फैली है तो उसके निकटवर्ती क्षेत्र में मूँगा क्रमिक रूप से जमा हो जाता है और एक विस्तृत क्षेत्र को जन्म देता है। सामान्यतया प्रशान्त महासागरीय क्षेत्रों में इस प्रकार की अवरोधक भित्ति बहुत मिलती है। आस्ट्रेलिया के पूर्व में लगभग 150 कि.मी. तक चौड़ाई में तथा 2000 कि.मी. तक लम्बी एक बहुत बड़ी मूँगा की संरचना है, जो ग्रेट बेरियर रीफ के नाम से जानी जाती है, जिस पर लगभग 20 हजार परिवारों का एक स्थल है। यह लगभग कई स्थानों से टूट चुकी है। परिणामस्वरूप वहाँ पर छोटी-छोटी झीलें दिखाई देती हैं। यह उत्तर में 25 मिलियन वर्ष पुरानी है जहाँ काफी सघन है जबकि दक्षिण में पतली एवं युवा है। इसमें श्रृंखलाबद्ध रूप में लगभग 3,863  भित्तियाँ हैं। यहाँ प्लेट विवर्तनिकी का प्रभाव स्पष्टतः देखा जा सकता है।
  3. वलयाकार प्रवाल भित्तिः यह एक अर्द्ध वृत्त रूप में अथवा घोड़े के पैर के खुर की आकृति की होती है, जिसके मध्य में अधिकांशत लैगून भरा रहता है एवं निर्माण दृष्टि से यह भी महाद्वीपीय मग्न तट से दूर स्थित है। लाल सागर, आस्ट्रेलिया सागर, चीन सागर एवं इण्डोनेशिया के पास वाले समुद्री क्षेत्रों में इस प्रकार की प्रवाल भित्ति पायी जाती हैं, जिसके मध्य में लैगून रहता है, लेकिन समयानुसार यह भी ठोस हो जाता है। एलिस द्वीप का फुनाफुटी एटाल वलयाकार प्रवाल भित्ति का उदाहरण है।
  4. मूँगा द्वीपः इस प्रकार के द्वीप तटवर्ती क्षेत्र से बहुत दूरी पर होते हैं क्योंकि ये गोल आकृति के एक द्वीप के रूप में निर्मित होते हैं, जिनका आधार समुद्री पर्वतीय क्षेत्र है। ज्वारीय स्थिति में यह मूँगा द्वीप स्पष्ट दिखाई देते हैं, परन्तु कई मूँगा द्वीप अधिक ज्वार के समय जल से ढक जाते हैं। इनके मध्य में कभी-कभी बहुत छोटी मात्रा में लैगून दिखाई देता है, परन्तु अधिकांशतया यह ठोस रूप में दिखाई देती है। निर्माण के समय यह एक रिक्त स्थान थे, परन्तु समय के साथ ये वर्तमान में घने वनस्पति के क्षेत्र है, क्योंकि पक्षियों ने यहाँ बीज लाकर डाले या आसपास के जहाजी आवागमन ने कई प्रकार के बीज डालकर इन क्षेत्रों को घने वनस्पति का क्षेत्र बना दिया है। वर्तमान में यह जनसंख्या के महत्त्वपूर्ण क्षेत्र हैं, जैसे कि अरब सागर में लगभग सभी द्वीप मूँगाकृत चट्टान माने जाते हैं। लक्षद्वीप और कई अन्य द्वीप इसके श्रेष्ठ उदाहरण हैं। अन्ध महासागर में भी कई संरचनाएँ इसी प्रकार की हैं।

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