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वायु-दाब है मानसून की उत्पत्ति का कारण

मौसम के अनुसार क्रम परिवर्तित करने वाली पवनें मानसून कहलाती हैं। मानसून दो परस्पर मौसम वाली जलवायु है तथा पवनों का उत्क्रमण मानसूनी जलवायु का मूल सिद्धान्त है। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए सिम्पसन ने कहा है किए ‘‘मानसूनh पवनें वास्तव में व्यापारिक एवं पछुआ हवाओं के उत्तर व दक्षिण की ओर स्थानान्तरण से उत्पन्न वायु की धाराएँ हैं।’’ मानसून  की उत्पत्ति के सम्बन्ध में अनेक संकल्पनाएँ हैंए जिनमें निम्न महत्वपूर्ण हैं.

1. तापीय संकल्पना

इस संकल्पना के अनुसार मानसून की उत्पत्ति जल एवं स्थल के विषम वितरण के कारण होती है तथा मानसूनी पवनें स्थलीय व सागरीय पवनों का ही वृहद् रूप हैं । ग्रीष्मकाल में अधिक सूर्यातप के कारण स्थलीय भाग पर न्यून वायु-दाब के केन्द्र बन जाते हैंए तभी सागरों की ओर से स्थल की ओर पवनें चलती हैंए जिन्हें ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैंए जबकि शीतकाल में यही पवनें स्थलीय भागों के ठण्डे होने के कारण पुनः सागरों की ओर प्रवाहित होने लगती हैंए जिसे शीतकालीन या लौटता हुआ मानसून कहते हैं।

21 मार्च को सूर्य उत्तरी गोलार्द्ध में (कर्क रेखा पर) सीधा चमकता हैए जिस कारण अधिकतम सूर्यातप प्राप्त होता है तथा एशिया में बैकाल झील तथा उत्तरी.पश्चिमी पाकिस्तान (पेशवा के पास) में न्यून वायु-दाब का केन्द्र बन जाता है। इसके विपरीत दक्षिणी हिन्द महासागर (मकर रेखा पर) एवं उण्पण् आस्ट्रेलिया के समीप उच्च वायु-दाब के केन्द्र विकसित हो जाते हैं। अतः महासागरों में स्थित उच्च वायु-दाब केन्द्रों से स्थलीय निम्न वायु-दाब केन्द्रों की ओर पवनें अग्रसर होती हैंए जो आर्द्र होने के कारण वर्षा करती हैं। इसे ग्रीष्मकालीन मानसून कहते हैं। इसके विपरीत 23 सितम्बर के उपरान्त जब सूर्य दक्षिणी गोलार्द्ध की ओर जाता है तथा 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर सीधा चमकने लगता हैए तभी एशिया में बैकाल झील तथा उ. प. पाकिस्तान के समीप उच्च वायु-दाब केन्द्र बन जाते हैं। समीपवर्ती सागरीय भागों में निम्न वायु-दाब केन्द्र बनते हैं। अतः पवनें स्थल से पुनः सागर की ओर चलती हैं। लेकिन शुष्क होने के कारण वर्षा नहीं करती हैं, इसे शीतकालीन मानसून कहते हैं।

2. गतिक संकल्पना

मानसून की उत्पत्ति के सम्बन्ध में गतिक संकल्पना का प्रतिपादन फ्लॉन महोदय ने किया। उनके अनुसार मानसून पवनों की उत्पत्ति वायुदाब एवं पवन पेटियों के स्थानान्तरण के कारण होती है। विषुवत् रेखा के समीप व्यापारिक पवनों के मिलने से अभिसरण उत्पन्न होता हैए जिसे अन्तर उष्ण कटिबन्धीय अभिसरण क्षेत्र कहते हैं। मध्य विषुवत्रेखीय न्यून दाब की पेटी (डोलड्रम) स्थित हैए जिसमंत विषुवतीय पछुआ पवनें चलती हैं। सूर्य के उत्तरायण होने (कर्क रेखा पर) पर 300 उत्तरी अक्षांश तक विस्तृत हो जाती है। दक्षिणी-पूर्वी एशिया में विषुवतीय पछुआ पवनें चलती हैं। यही दक्षिणी-पश्चिमी ग्रीष्मकालीन मानसून होता है जिसके साथ अनेक बार चक्रवात आदि तूफान आते हैं। जबकि इसके विपरीत शीतकाल में पवनों की पेटियाँ दक्षिण में खिसक जाती हैं। सूर्य के दक्षिणायन होने (मकर रेखा पर) पर दक्षिणी-पूर्वी एशिया से छप्ज्ब् हटकर वहाँ उत्तरी-पूर्वी व्यापारिक पवनें प्रभावशील हो जाती हैंए जिसे फ्लॉन महोदय ने शीतकालीन मानसून कहा है।

3. जेटस्ट्रीम संकल्पना

1950 के उपरान्त भारतीय मानसून की उत्पत्ति से सम्बन्धित किये गये शोध कार्यो से स्पष्ट हुआ है कि भारतीय मानसून की उत्पत्ति तथा कार्यविधि निम्न तथ्यों से सम्बन्धित है .

  • हिमालय तथा तिब्बत का पठार एक यान्त्रिक अवरोध के रूप में या उच्च तलीय ऊष्मा के स्त्रोत के रूप में कार्य करते हैं।
  • उत्तरी तथा दक्षिणी ध्रुवों पर क्षोभमण्डल में वायु परिधु्रवीय भँवर उत्पन्न होते हैं अर्थात् क्षोभमण्डल में वायुराशि का चक्रीय संचरण निर्मित होता है।
  • उच्च तलीय (क्षोभमण्डल) जेट स्ट्रीम का जटिल संचार तथा उसकी स्थिति।

इस सम्बन्ध में कोटेश्वरम्, यीन, मोनेक्स, फ्लोन, रामारत्ना तथा अनन्तकृष्णन आदि प्रमुख शोधकर्ता हैंए जिन्होंने निरन्तर शोध कार्य के उपरान्त अपने विचार प्रस्तुत किये हैं।

उत्तरी गोलार्द्ध में शीतकाल की दीर्घ जाड़े की रातों के कारण ऊपर स्थित शीत वायु भारी होकर नीचे बैठ जाती हैए जिससे धरातल पर उच्च वायु-दाब बन जाता हैए जबकि ऊपरी वायु के खिसकने के कारण वायुमण्डल के ऊपरी भाग (क्षोभमण्डल) में धरातलीय उच्च दाब के ऊपर निम्न वायु-दाब बन जाता हैए क्योंकि ऊपरी वायु नीचे बैठ जाती है। इस उच्चस्तरीय निम्न वायु-दाब के चारों ओर पवनें चक्रवातीय क्रम में भँवर के रूप में प्रवाहित होती हैं। एशिया के ऊपर इसकी दशा सामान्य रूप से पश्चिम से पूर्व होती है। इस उच्च तलीय पवन संचार के विषुवत् रेखा की ओर वाले भाग को जेट स्ट्रीम कहते हैं। इसकी सामान्य दिशा पश्चिम से पूर्व की ओर होती है। यह एक मोड़ बनाते हुए 200 से 350 अक्षांशों के मध्य प्रवाहित होती है। हिमालय पर्वत तथा तिब्बत के पठार के यान्त्रिक अवरोध के कारण यह शाखाओं में विभाजित हो जाती है। इसकी उत्तरी शाखा तिब्बत के पठार के उत्तरी भाग में चापाकार रूप में पश्चिम से पूर्व की ओर प्रवाहित होती है तथा मुख्य शाखा (दक्षिणी) तिब्बत के पठार तथा हिमालय के दक्षिण में प्रवाहित होती हैए जो अफगानिस्तान व पाकिस्तान के ऊपर प्रवाहित होते हुए चक्रवातीय क्रम का अनुसरण करती है। इनसे शीतकाल में क्षोभमण्डलीय प्रतिचक्रवातीय दशाएँ विकसित होती हैंए जिससे हवाएँ नीचे बैठ जाती हैं तथा प्रारम्भ में जेट स्ट्रीम का उत्तरायण होकर तिब्बत के पठार के उत्तर में प्रवाहित होने लगती है। अतः मानसून की उत्पत्ति इन्हीं सामयिक आँधियों से होती है। कोटेश्वरम् के अनुसार पुरवा जेट पवनों की प्रकृति ग्रीष्मकालीन मानसून पर निर्भर करती है। ये जेट पवनें तिब्बत के पठार से तापीय गति लेकर निम्न अधोमण्डल में वर्षा करती हैं। भारत में ग्रीष्मकालीन मानसूनी वर्षा विशेष प्रकार के चक्रवाती भँवरों से घनिष्ठ होती है।

मानसून पर अल.निनो के प्रभाव की जानकारी सर्वप्रथम गिल्बर्ट वाकर ने 1924 में दीए उन्होंने बताया कि सागरीय सतह के तापमान से वायु.दाब एवं पवनें प्रभावित होती हैं। यह विचारधारा कर्क एवं मकर रेखा के मध्य स्थित हिन्द महासागर एवं प्रशांत महासागर के जलीय सतह के तापमान पर आधारित है। वाकर महोदय ने बताया कि इन महासागरों पर वायु.दाब का उतार.चढ़ाव वाला प्रतिरूप पाया जाता है। जिसके अंतर्गत जब प्रशांत महासागर पर वायु-दाब ऊँचा होता है तो हिन्द महासागर पर वायु-दाब निम्न होता है तथा भारतीय मानसून के लिए यह स्थिति अनुकूल होती है। इसे वाकर ने दक्षिणी दोलन कहा है। इसका समय 2 से 5 साल तक होता है। दक्षिणी दोलन को वाकर चक्र भी कहते हैं जिसमें इसका उर्ध्वगामी प्रवाह इण्डोनेशिया के ऊपर स्थित रहता है। जहाँ से दो चक्रों का निर्माण होता हैए पहले चक्र में इण्डोनेशिया से ऊपर उठकर वायु ठण्डी होकर मध्य पूर्व पाकिस्तान व उत्तरी पश्चिमी भारत में उतरती है तथा दूसरे चक्र में वायु इण्डोनेशिया से दक्षिणी अमेरिकी के पश्चिमी तट पर संचरित होती है इनमें प्रथम चक्र का कमजोर होना भारतीय मानसून के लिए अनुकूल है तथा दूसरा चक्र कमजोर होना प्रतिकूल है। दूसरे चक्र का कमजोर होना अल निनो पर निर्भर करता है। जिस वर्षा पर अल निनो प्रभावी होगीए पेरू तट सहित प्रशांत महासागर के बड़े भाग पर न्यून वायु-दाब बन जायेगा। ये न्यून दाब भारतीय मानसून के लिए प्रतिकूल प्रभाव छोड़ता है। दक्षिणी दोलन के ऋणात्मक पहलू से अल निनो का मिलना एन्सो कहलाता है क्योंकि प्रशांत महासागर में (तहीती द्वीप एवं पोर्ट डार्विन) न्यून दाब बनने से मानसूनी पवनें भारतीय उपमहाद्वीप से विचलित हो जाती हैं फलस्वरूप मानसून कमजोर पड़ जाता है।

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