भूगोल और आप # भूगोल और आप फ्री आर्टिकल

कोपेन द्वारा वर्गीकृत भारत के मुख्य जलवायु प्रदेश

Amw - यह उष्ण कटिबंधीय (मानसूनी) आर्द्र मुख्य जलवायु प्रदेश है जिसमें सबसे ठण्डे माह का तापमान 18 डीग्री सेंटीग्रेड से ऊपर रहता है तथा इसमें लघु शुष्क ऋतु भी होती है। ऐसी जलवायु भारत में कांकण एवं मालाबार तटवर्ती क्षेत्रों में पायी जाती है जिनमें गोवा दक्षिणी पश्चिमी महाराष्ट्र, पश्चिमी कर्नाटक, केरल तथा कन्याकुमारी तक फैला तमिलनाडु तट सम्मिलित है। इनके अतिरिक्त त्रिपुरा व दक्षिणी...

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जलवायु परिवर्तन के प्रभाव से कृषि पर मंडराता खतरा

वैज्ञानिकों ने जलवायु परिवर्तन के कृषि उत्पादनों पर प्रतिकूल प्रभावों पर प्रकाश डालते हुए स्पष्ट किया है कि इसके कारण न केवल जल स्रोत सूख जायेंगे अपितु शीतोष्ण व समशीतोष्ण क्षेत्रों में अधिकांश उपजाऊ भूमि में बढ़ते तापमान के कारण दरारें पड़ जायेगी। यही नहीं, चावल व मक्का की उपज की मात्रा वर्तमान की तुलना में 40 प्रतिशत रहने से ‘खाद्य सुरक्षा’ खटाई में पड़ जायेगी। इस रिपोर्ट में स्पष्ट...

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मानचित्रण की कला एवं इसकी उपयोगिता

भौगोलिक विशेषताओं से युक्त किसी स्थान की आकारिकी, अक्षांश व देशान्तरीय विस्तार के अनुसार स्थिति, इससे सम्बद्ध भौगोलिक आकृतियों यथा - पर्वतों, नदियों आदि का मापन व निर्धारण मानचित्रण कहलाता है। वर्तमान काल में देशों-प्रदेशों तथा उनके अंदर स्थित विभिन्न भौगोलिक संरचनाओं वन प्रदेशों, तटीय भूमि, जल संसाधन क्षेत्रों, खनिज संसाधन क्षेत्रों, कृषि भूमि, जलवायु, धरातल के उच्चावच को मानचित्रण...

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जैव विविधता में महत्वपूर्ण हैं मूंगे की चट्टानें

मूंगे की चट्टानें उष्ण कटिबन्ध में पायी जाने वाली सबसे जटिल और रंग-बिरंगी पारिस्थितिकीय प्रणाली है। जहाँ तक जीव-जन्तुओं की उपस्थिति का सवाल है इनमें जैसी जैव विविधता पायी जाती है वैसी वर्षा वनों के अलावा और कहीं देखने को नहीं मिलती। मूंगे की चट्टानें में पाये जाने वाले जीवधारी ऐसी विशाल और जटिल भौतिक संरचनाओं का निर्माण करते हैं जिनमें दुनिया के बेहद आकर्षक पेड़-पौधे और जीव निवास...

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प्रवालभित्ति विरेचन की घटनाएं बढ़ना चिंताजनक

समुद्री सतह के तापमान बढ़ने, सौर्य विकिरण, गाद जमा होने, जेनोबाइटिक्स, उपवायव (सबएरियल) प्रकटीकरण, अकार्बनिक पोषक तत्वों, मीठे जल के सम्पर्क के कारण जल की सान्द्रता कम होने, एपिजूटिक्स सहित प्रवाल पर्यावरण में मानव जनित और प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण प्रवालभित्ति का विरेचन होता है। विगत 30 वर्षों के दौरान प्रवाल विरेचन की घटना  में होने व्यापकता और बारम्बारता दोनों की दृष्टि से वृद्धि...

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भारतीय महासागर के ऊपर चक्रवात निर्माण की दशा

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात निम्न दबाव के ऐसे गहन सिस्टम होते हैं जहाँ सतह संचरण सिस्टम में पवन गति 33 नॉटिकल मील प्रति घंटे से अधिक हो जाती है। उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर निम्न दबाव के सिस्टमों को सतह स्तर पर उनसे जुड़ी अधिकतम सतत सतह पवन के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। दबाव एवं इससे अधिक गहनता वाले सिस्टमों को चक्रवाती - विक्षोभ माना जाता है। ‘चक्रवात‘ 34 नॉट अथवा इससे अधिकतम सतह पवन वाले...

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पेरू एवं बूदेविए द्वारा वृद्धि ध्रुव मॉडल

द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त 60 एवं 70 के दशक में विश्व की विकसितए विकासशील एवं अविकसित अर्थव्यवस्थाओं में असमानताओं को प्रस्तुत करने के लिए अर्थशास्त्रियों एवं भूगोलवेत्ताओं ने अनेक प्रादेशिक विकास मॉडल प्रस्तुत किये। ये प्रस्तुत मॉडल निर्यात आधारितए आगम-निर्गम तथा वृद्धि धु्रव उपागम पर आधारित हैं। जिसमें से पेरू एवं बूदेविए के द्वारा प्रस्तुत ‘‘वृद्धि धु्रव मॉडल’’ वर्तमान...

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विविध प्रकार से लाभदायक है कपास की खेती

कपास विश्व की सबसे प्रमुख, प्राचीन तथा व्यावसायिक रेशेदार फसल है। भारत में कपास का उपयोग 1800 बी. सी. से किया जा रहा है। कपास की खेती सूती वस्त्र उद्योग का आधार है। वनस्पति, पशु-चर्म तथा कृत्रिम रेशे से तैयार कुल वस्त्रों का आधा से अधिक भाग कपास के रेशे से तैयार किया जाता है। कपास ‘‘मालवेसी’’ कुल के अंतर्गत आता है, जो प्राकृतिक रूप में एक बहुवर्षीय झाड़ी है। जबकि व्यावसायिक फसल के रूप में...

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पशु-धन क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के संभावित प्रभाव

ग्लोबल जलवायु परिवर्तन के कारण वैश्विक तापमान में 2 से 6 डिग्री सैल्सियस की वृद्धि से (समयकाल 2040-2069 तथा 2070-2099) संकर पशुओं तथा भैंसों में देशी पशु-धन की तुलना में अपनी उच्च संवेदनशीलता के कारण यौवनारंभ का समय एक या दो सप्ताह तक आगे बढ़ जाएगा। वैश्विक गर्मी के कारण वर्ष 2020 तक दूध उत्पादन में 1.8 मिलियन टन की कमी होने का अनुमान है जिसके वर्ष 2050 तक 15 मिलियन टन हो जाने की आशंका है। ग्लोबल जलवायु परिवर्तन...

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तटवर्ती भूमि पर समुद्री जल वृद्धि से पड़ने वाले प्रभाव

खुले समुद्र में या भूमि के ऊपर उत्पन्न होने वाली प्रक्रियाओं से तटरेखा प्रभावित होती है। तटरेखा पर जलवायु संबंधी प्रभावों के दृष्टिगतए निम्नलिखित स्थितियां बड़ी ही चिंताजनक हैं : महासागरों के तापमान बढ़ने तथा हिमनदों के पिघलने के कारण दीर्घावधि तक समुद्र के जलस्तर में वृद्धि होना। इससे जल प्लावन तो होगा ही जिससे तटवर्ती भूमि और संपत्ति को नुकसान पहुंचेगा तथा लोगों का विस्थापन...