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अदन की खाड़ी में चक्रवात सागर

अदन की खाड़ी में ‘चक्रवात सागर’का निर्माण देखा गया। 17 मई, 2018 को भारतीय मौसम विज्ञान विभाग द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार अदन की खाड़ी के ऊपर बना दबाव, पश्चिम-उत्तर-पश्चिम की ओर बढ़ने के पश्चात गहन दबाव का रूप ले लिया और फिर 17 मई, 2018 को ‘सागर चक्रवात’ का निर्माण हुआ। जिस जगह पर दबाव ने सागर चक्रवात का रूप लिया वह अदन से 400 किलोमीटर पूर्व-उत्तरपूर्व (यमन) और सोकोत्रा द्वीप से 560 किलोमीटर पश्चिम-पश्चिमोत्तर में है।

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार इस चक्रवात में पवन की गति 75-85 से 95 kpmh रहने की संभावना है जो उत्तरोत्तर कमजोर होती जाएगी। आईएमडी ने तमिलनाडु, केरल, लक्षद्वीप, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, गुजरात राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों को इस संबंध में चेतावनी जारी की है। मछुआरों को अगले 12 घंटे समुद्र में नहीं जाने की सलाह दी गई है।

आईएमडी ने इस उष्णकटिबंधीय चक्रवात को ‘सागर’ नाम दिया है। उत्तरी हिंदी महासागर में उष्णकटिबंधीय चक्रवात के पूर्वानुमान की जिम्मेदारी भारतीय मौसम विभाग के पास है। इस चक्रवात से यमन एवं सोमालिया के प्रभावित होने का अनुमान है।

उष्णकटिबंधीय चक्रवात 

आईएमडी के अनुसार उष्णकटिबंधीय चक्रवात उष्णकटिबंध में घूर्णन करने वाली निम्न दबाव प्रणाली है जिसमें केंद्रीय दबाव आसपास के मुकाबले 5 से 6 पीएचए कम हो जाता है और अधिकतम निरंतर पवन वेग 34 नॉट (62 किलोमीटर प्रति घंटा) पहुंच जाता है।

साइक्लोन शब्द ग्रीक शब्द ‘साइक्लोस’ (cyclos) से उत्पन्न है जिसका मतलब है सांप का कुंडली मारना। साइक्लोन शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग हियरी पिडिंगटन ने किया था। उष्णकटिबंधीय चक्रवात को अटलांटिक महासागर में  हरिकेन एवं प्रशांत महासागर में टायफून कहा जाता है। आस्ट्रेलिया महाद्वीप के निकट घटित होने वाले चक्रवातों को विली-विलीज कहा जाता है। दक्षिण अटलांटिक महासागर तथा दक्षिण पूर्व प्रशांत महासागर के ऊपर प्रायः चक्रवात नहीं आते। इसका मुख्य कारण समुद्री सतह का तापमान कम होना तथा महासागर एवं वायुमंडल की अन्य स्थितियों का अनुकूल न होना है।

अब यह जलवायु विज्ञान का एक सर्वविदित तथ्य है कि मानसून पूर्व मौसम (मार्च, अप्रैल, मई) और मानसून बाद मौसम (अक्तूबर, नवम्बर, दिसम्बर) के दौरान उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर वर्ष में लगभग  5-6 चक्रवात आते ही हैं (भारत मौसम विज्ञान, 2008)। यह विश्वभर में आने वाले चक्रवातों का लगभग 7 प्रतिशत है। बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर के ऊपर चक्रवात निर्माण का अनुपात 4:1 है। वैश्विक स्तर पर, उत्तर पश्चिमी प्रशांत महासागर के ऊपर यह आवृत्ति अधिकतम है और इसके बाद उत्तर अटलांटिक महासागर का नंबर आता है। नवंबर के महीने में प्राथमिक मैक्जिमा और उसके बाद मार्च के महीने में द्वितीयक मैक्जिमा के साथ, उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की आवृत्ति द्विविधात्मक व्यवहार दर्शाती है।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात सामान्यतया पूर्वोत्तर दिशा में आगे बढ़ते हैं। तथापि, पर्यावरणिक परिस्थितियों के अनुसार वे कभी-कभी पीछे की ओर भी मुड़ सकते हैं। बंगाल की खाड़ी का चक्रवात प्रायः ओडिशा – पश्चिम बंगाल तट को अक्तूबर में, आंध्र के तट को नवम्बर में तथा तमिलनाडु के तट को दिसम्बर में प्रभावित करता है। बंगाल की खाड़ी के 50 प्रतिशत से अधिक चक्रवात भारत के पूर्वी तट के विभिन्न भागों में आते हैं, 30 प्रतिशत चक्रवात बंग्लादेश, म्यांमार तथा श्रीलंका के तटों पर तथा लगभग 20 प्रतिशत स्वयं समुद्र के ही ऊपर समाप्त हो जाते हैं। अरब सागर के ऊपर बिखर जाने वाले चक्रवातों की प्रतिशतता उच्चतर (60 प्रतिशत) है क्योंकि पश्चिमी अरब सागर अपेक्षाकृत ठंडा है। चक्रवातों का अधिकतम स्थलावतरण भारत के गुजरात तट (अरब सागर में कुल चक्रवातों का 18 प्रतिशत) पर और उसके बाद ओमान तट पर होता है।

जीवनावधि

उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर चक्रवात की जीवनावधि 5-6 दिन होती है। 6 दिन के वैश्विक औसत के मुकाबले इसकी बहुत भारी चक्रवाती तूफान (वीएससीएस) तीव्रता 2-3 दिनों तक रहती है। औसत चक्रवात की जीवनावधि का वर्णन कई चरणों में किया जाता है। इन चरणों का वास्तव में पृथक अस्तित्व नहीं होता बल्कि ये एक सतह प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। अलग-अलग चरण किसी तूफान विशेष में जीवन चक्र के दौरान एक से अधिक बार भी घटित हो सकता है। किसी प्रारंभिक विक्षोभ अर्थात निम्न दबाव क्षेत्र के बनने से लेकर इसके डिप्रेशन, डीप डिप्रेशन और चक्रवाती तूफान तक में बदलना और अंततः इसका कमजोर पड़ना, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का जीवनचक्र है।

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