भूगोल और आप | भूगोल और आप फ्री आर्टिकल 1 |

अनुबन्ध खेती के लाभ व विशेषतायें

राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 40 प्रतिशत किसान खेती छोड़ना चाहते हैं। लेकिन वैकल्पिक रोजगार के अभाव में वे इससे चिपके हुए हैं। जबकि कृषि आधारित उत्पाद बनाने वाली फर्में लगातार अपनी गुणवत्ता में सुधार की ओर अग्रसर हैं।  हमारी कृषि व्यवस्था में उत्तम बीज एवं उर्वरक, बुवाई एवं कटाई की आधुनिक मशीनें, पर्याप्त ऋण सुविधाएं, उन्नत तकनीकी, लाभदायक बाजारों में विपणन का ज्ञान, किसानों में आत्मविश्वास की कमी आज भी देखने को मिलती है। जो उत्पादक फर्मोए खाद प्रसंस्करण के काम में लगी हुई हैं, वे फर्में कच्चे माल की उपलब्धता के लिए अनुबन्ध खेती के प्रति अपना रूख दिखा रही हैं। अनुबन्ध खेती के अन्तर्गत ऐसी फर्मों को कच्चा माल आसानी से मिल जाता है तथा किसानों को विपणन की भी समस्या नहीं उठानी पड़ती है।

अनुबन्ध खेती क्या है : अनुबन्ध खेती किसानों एवं कृषि विपणन कम्पनियों के बीच पूर्व निर्धारित दरों पर कृषि तथा बागवानी उपजों के लेन देन का समझौता है। यह कम्पनियोंए किसानों एवं सरकार के बीच का समझौता भी हो सकता है। अनुबन्ध खेती के तहत किसानों को एक निश्चित मूल्य पर निश्चित समयावधिए निश्चित मात्रा तथा निश्चित गुणवत्ता वाले विशिष्ट उत्पाद के उत्पादन और आपूर्ति के लिए नियुक्त किया जाता है। कम्पनी किसानों को बीज, उर्वरक, कृषि प्रोद्योगिकी, ऋण तथा कृषि उपकरण भी प्रदान करती है। भारत में पेप्सी फूड्स, मार्क्स स्पेंसर, केल्लॉग, गॉडफ्रे, कैडबरी इण्डिया, आई.टी.सी., कारगिल, रैलीस आदि राष्ट्रीय एवं बहुराष्ट्रीय कम्पनियां अनुबन्ध खेती में संलग्न हैं। इसके साथ कई अन्य कम्पनियां भी इस क्षेत्र में हैं। जैसे बल्लारपुर इन्डस्ट्रीज, ग्रीन एग्रो पैक, ग्लोबल ग्रीन, यूनाईटेड ब्रेवरीज आदि कई भारतीय कम्पनियों ने विदेशी कम्पनियों के साथ मिलकर संयुक्त उद्यम के रूप में अनुबंध खेती के रूप में प्रवेश किया है।

भारत में अनुबंध खेती की शुरूआत 1980 के दशक में की गई थी। पंजाब में बीज की नवीन किस्मोंए गहरी जुताईए नवीन तकनीकी तथा शॉवेल तकनीक जैसे बुआई के नये तरीकों का समावेश किया गया। इसी प्रकार आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में सूरजमुखी, तमिलनाडq, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश में फलों एवं सब्जियों का उत्पादन किया जा रहा है। इनमें अनुबंध खेती के अन्तर्गत किसानों की औसत उपज राज्य के औसत उत्पादन से 25 से 50 प्रतिशत तक अधिक है। जबकि अन्य किसानों के मुकाबले अनुबन्धित किसानों की प्रति हेक्टेयर आय 40 प्रतिशत से अधिक है। यह अनुबन्धित कम्पनियां बीजों की नई किस्मों, गहरी जुताई, नवीन तकनीक, बुआई के नये तरीकों का भी समावेश कर रही हैं। कृषिगत बीजों के उत्पादन एवं आपूर्ति के व्यवसाय में 150 से भी अधिक कम्पनियां अपना व्यवसाय अनुबन्धित कम्पनियों पर आधारित करए चला रही हैं। गेहूं उत्पादन के लिए हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड ने मध्य प्रदेश सरकार के साथ एक संयुक्त पहल की। जिसमें 250 एकड़ भूमि में शुरू हुई परियोजना 15000 एकड़ भूमि में फैल गयी है। रैलीस किसान केन्द्रों ने फलए सब्जियों और बासमती चावल से सम्बन्धित अनुबंध खेती की पायलट परियोजना होशंगाबाद (मध्य प्रदेश), बंगलुरू (कर्नाटक), नासिक (महाराष्ट्र) तथा पानीपत (हरियाणा) में स्थापित की है। आई.टी.सी. के ई-चौपाल (सूचना तकनीकी पर आधारित एक हस्तक्षेप) ने किसानों एवं उपभोक्ताओं के बीच मध्यस्थों का उन्मूलन करके कृषि विपणन का एक सीधा चैनल विकसित किया है।

हमारा देश दुग्ध उत्पादन, बागवानी और मछली पालन व्यवसाय के क्षेत्र में भी अर्न्तराष्ट्रीय बाजार में अपनी अच्छी पकड़ बनाये हुए है। किन्तु निराशा इस बात की है कि प्रतियोगिता के चलते इन लाभो में निरन्तर कमी हो रही है। अतः अनुबन्ध खेती को अपनाकर हम एक तरफ तो कृषि उपज में वृद्धि करना चाहते है तथा दूसरी तरफ अपनी उपलब्ध संसाधनों का भरपूर उपयोग कर आय मे वृद्धि करना चाहते हैं। इसके लिए सरकार को आधारभूत एवं ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी। साथ ही किसानों को भी मानसिक रूप से तैयार करना होगा। क्योंकि हमारे देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक परम्परायें रूढ़िवादिता पर आधारित हैं। जो अनुबन्ध खेती के लिए किसानों को भावनात्मक ठेस पहुंचाती हैं। फार्मों को भी किसानों के साथ आपसी रिश्ते सही रखना आवश्यक है। क्योंकि यदि फर्म अनुबन्ध के आधार पर किसानों के साथ अपने वादे पूरा नहीं करती है तो अनुबन्ध भंग होने की आशंका हो सकती है। कोई भी फर्म यह आकलन अवश्य करती है कि उसे पर्याप्त लाभ मिले और जोखिमों को भी आसानी से वहन किया जा सके।

अनुबन्ध खेती के लाभ :

  • किसानों द्वारा अनुबन्ध खेती के अन्तर्गत फार्मों से फसल का मूल्य शुरुआत में ही तय कर लिया जाता है। अतः मूल्य सम्बन्धित जोखिमों से मुक्ति मिल जाती है।
  • परम्परागत कृषि के अन्तर्गत अदृश्य बेरोजगारी छिपी रहती है। अर्थात कुछ समय काम मिलता है और कुछ समय खाली बिताना पड़ता है। जबकि अनुबन्ध खेती के अर्न्तगत व्यावसायिक फसलों की उपज की जाती है। जिसमें किसानों के पूरे परिवार को अपनी थोड़ी जमीन पर ही ऊंची दर पर पूरे समय कार्य करने का मौका मिल जाता है और व्यवसायिक फार्मों के सम्पर्क के आकर अधिक लाभ की संभावनाएं तलाशते रहते हैं।
  • अनुबन्ध खेती के अन्तर्गत छोटे किसान जिनको उपज बेचने की समस्या आती है उन्हें फर्मो द्वारा अर्न्तराष्ट्रीय बाजार की प्राप्ति हो जाती है तथा अपनी उपज का उचित मूल्य मिल जाता है।
  • अनुबन्ध खेती में किसानों को विश्व व्यापार संगठन एवं फार्मों के अनुसार अपनी खेती का व्यवस्थित रिकॉर्ड रखना पड़ता है। जिसमें खादए बीजए प्रावधि आदि का रिकॉर्ड होता है। यदि फिर भी उसे पूर्ण सफलता नहीं मिलती है तो उसका विश्लेषण फर्म करती है अथवा स्वयं ही अपनी कार्यक्षमता बढ़ा सकता है।
  • छोटे किसानों को फसल चक्र के अनुसार समय.समय पर ऋण एवं अग्रिमों की आवश्यकता होती रहती है। अतः इस समस्या के निवारण के लिए अनुबन्ध खेती के अन्तर्गत फर्म किसानों को या तो सीधे तौर पर ऋण उपलब्ध करवा देती है अथवा ऋण प्रदान करने वाली ऐजेन्सी से ऋण दिलाने में सहायता करती है।
  • अनुबन्ध खेती में लगी फर्मो को अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा झेलनी पड़ती है। अतः उत्पाद की गुणवत्ता को बनाये रखने के लिए फर्म किसानों को नई तकनीकी का प्रशिक्षण भी प्रदान करती है। साथ ही उत्तम किस्म के बीजए उर्वरकए कीट नाशक दवाईयां एवं उपकरण भी उपलब्ध करवाती है।
  • अनुबन्ध खेती में किसानों के साथ फार्में भी अपने कच्चे माल की आपूर्ति सुनिश्चित कर अपनी हानि को कम कर सकती हैं। साथ ही उच्च गुणवत्ता के उत्पाद भी निर्धारित कीमत पर प्राप्त कर सकती है।
  • किसानों एवं कृषि से जुड़ी व्यावसायिक गतिविधियों जैसे डेयरीए मछली पालनए मुर्गी पालनए सुअर पालन आदि को भी बढ़ावा देकर इनका लाभ उठाया जा सकता है।

अनुबन्ध खेती की कठिनाईंयां

  • अनुबन्ध खेती में काफी लागतें आती है जो अनावश्यक रूप से लाभ में कमी करती हैं। साथ ही अतिवृष्टि और अनावृष्टि तथा कीटों के प्रभाव से भी यदि फसल प्रभावित होती है तो इसका प्रभाव भी लागतों के रूप में बढ़कर फर्म अथवा किसानों पर ही पड़ता है। अतः इसमें अनिश्चितता बनी रहती है।
  • यदि कोई किसान अपनी भूमि का स्वामित्व स्थानान्तरित कर देता है तो अनुबन्ध खेती के अनुबन्ध को लागू कराने में फर्म को अनेक कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
  • हमारे देश में अधिकतर किसानों के पास जमीनों के छोटे.छोटे टुकड़े हैं। जिसमें फार्मों को अनुबन्ध करने में अनेक समस्याएं आती हैं तथा किसानों को आधारभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में समस्या आती है।
  • फसल की कीमत फसल के उगाने से पहले ही तय कर दी जाती है। अतः इसमें जोखिम की सम्भावना अधिक होती है और अनुबन्ध भंग पर कानूनी कार्यवाही के गम्भीर परिणाम भुगतने पड़ते हैं।

 

निष्कर्ष

समग्रतः अनुबन्ध खेती बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा कृषि का व्यवसायीकरण है। इस व्यवसाय पर बाजार का निर्णायक प्रभाव रहता है। इसी लिए बिना पर्याप्त सरकारी हस्तक्षेप के अनुबंध खेती एक नये प्रकार का सामन्तवाद पैदा कर सकती है। इसलिए अनुबन्ध खेती को मजबूत करने हेतु आवश्यक है कि एक कानूनी ढांचा स्थापित किया जाये व अनुबन्धों के क्रियान्वयन हेतु स्वायत्त निकाय बनें। अनुबन्धों के मूल्य गुणवत्ता सम्बन्धी शर्तों तथा अन्य दायित्वों के मामले में पारदर्शिता बरती जाये।

One Comment

  1. Amit Singh November 6, 2017 1:30 pm Reply

    Leave your message…Sir, on the contract, the names and addresses of companies who have been cultivating Basmati and Wheat on the contract are not disputed.

Post a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.