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अम्लीय वर्षा है पर्यावरण के लिए चुनौती

सामान्य तौर पर वर्षा जल का स्वाद तथा उसका रासायनिक संघटन परेशान करने वाला नहीं होता परन्तु यदि कहीं पर वर्षा जल का स्वाद तथा संघटन अम्लीय हो तो यह पर्यावरण के लिए चिन्ता का कारण बन जाता है। भारतीय मौसम विभाग के कुछ वैज्ञानिकों ने विश्व मौसम संस्थान के सहयोग से भारत के दस नगरों के वर्षा.जल के नमूनों का विश्लेषण कर यह बताया है कि पूनाए नागपुरए विशाखापट्टनमए श्रीनगर, इलाहाबाद, जोधपुर, कोडईकनाल, मिनिकोय (लक्षद्वीप) मोहनबारी तथा पोर्टब्लेयर के वर्षा जल में सल्फर डाई आक्साइड तथा नाइट्रोजन आक्साइड उच्च मात्रा में विद्यमान हैं, जिसके कारण इन शहरों की पहली बरसात को अम्लीय वर्षा के रूप में परिभाषित किया गया है। आखिर यह अम्लीय वर्षा है क्याघ् अम्लीय वर्षा शब्द का प्रयोग सामान्यतः सल्फेट तथा नाइट्रेट के नमए शुष्क अथवा कोहरे के रूप में निक्षेपण की व्याख्या करने के लिए किया जाता है। जब जीवाश्म ईंधन के जलाये जाने से उत्पन्न होने वाली सल्फर डाई आक्साइड तथा नाइट्रोजन आक्साइड वायुमंडल में विद्यमान जल के संपर्क में आते हैं तो वे सल्फर तथा नाइट्रोजन आधारित अम्लों में परिवर्तित हो जाते हैं तथा पृथ्वी पर वर्षा कोहरा या हिम के रूप में गिरते हैं। इस अम्लीय वर्षा का प्रभाव पर्यावरण के लिए खतरनाक हो सकता है।

अम्लीय वर्षा के प्रभाव उन इलाकों पर अधिक पड़ता है जहां औद्योगिक प्रदूषणए भारी यातायात के कारण वाहनों से निकलने वाले धुओं से वायु प्रदूषण अधिक होता है या फिर बेतरतीब ढंग से शहरीकरण हुआ हो। जिन उद्योगों में कोयला अधिक जलाया जाता हैए जैसे कि थर्मल पावर प्लांट इत्यादिए वहां अम्लीय वर्षा का प्रभाव व खतरा अधिक बढ़ जाता है। वायुमंडल में विद्यमान सल्फेट तथा नाइट्रेट के सूक्ष्म कण हवा द्वारा दूर-दूर तक ले जाये जा सकते हैं। ऐसी हवा में गहरी-सांस लेने वाले व्यक्ति के फेफड़ों तक ये सूक्ष्म कण पहुंचकर कई प्रकार की बीमारियों को जन्म देते हैं। सल्फेट तथा नाइट्रेट के सूक्ष्म.कण वायु द्वारा घर के भीतर तक पहुंचा दिए जाते हैं। यही नहींए अम्लीय वर्षा के होने से वन तथा भूमि के साथ-साथ नदियों और तालाबों को भी भारी नुकसान उठाना पड़ता है। वनों में विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां अम्लीय वर्षा से प्रभावित होती हैं तथा नदियोंए तालाबों का पानी अम्लीय हो जाने के कारण विशेष रूप से मछलियों पर बहुत बुरा असर पड़ता है। कई जगहों पर यह देखा गया है कि अम्लीय वर्षा के प्रभाव से मछलियां भारी मात्रा में मर भी जाती हैं। अम्लीय वर्षा के प्रभाव से भवनए ऐतिहासिक स्मारक तथा कारें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं। अम्लीय वर्षा के जल को यदि पी लिया जाये या फिर ऐसी सब्जियों का प्रयोग किया जाये जो अम्लीय वर्षा से प्रभावित भूमि या जल में उगाई गयी हों तो व्यक्ति को अल्जाईमर नामक बीमारी भी हो सकती है। अम्लीय वर्षा के प्रभाव के कारण जल आपूर्ति की पाइप लाइनें भी क्षतिग्रस्त हो जाती हैं।

पूरे विश्व में अम्लीय वर्षा की समस्या गहराती जा रही है। जर्मनीए स्वीडनए स्वीट्जरलैंडए नीदरलैंड तथा ब्रिटेन जैसे राष्ट्रों को अम्लीय वर्षा की समस्या से लगातार जूझना पड़ रहा है। अमेरिकाए रूसए कनाडाए नार्वे जैसे राष्ट्रों के साथ-साथ अब भारत, चीन, मैक्सिको तथा दक्षिण पूर्वी एशिया के कई राष्ट्रों को भी इस समस्या से जूझना पड़ रहा है। इन राष्ट्रों में बढ़ते औद्योगीकरण, शहरीकरण तथा वाहनों की अधिक संख्या के कारण वायु प्रदूषण की मात्रा भी मानकों से कहीं अधिक होती जा रही है। ऊर्जा की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए थर्मल पावर संयंत्रों में भारी मात्रा में कोयला जलाया जाता है। जिन इलाकों में ऐसे संयंत्रों की संख्या अधिक है वहां वायु में सल्फर डाई आक्साइड और नाइट्रोजन आक्साइड की मात्रा भी अधिक पायी गई हैए जो कि अम्लीय वर्षा के मुख्य कारक हैं। अम्लीय वर्षा के प्रभाव के कारण न केवल मौसम चक्र पर कुप्रभाव पड़ता है बल्कि मिट्टी तथा जल के रासायनिक गुणों पर भी कुप्रभाव पड़ता है। सल्फर डाइ आक्साइड तथा नाइट्रोजन आक्साइड जब जलए आक्सीजन तथा अन्य आक्सीडेन्टों से क्रिया करते हैं तो सल्फ्यूरिक अम्ल तथा नाइट्रिक अम्ल का हल्का विलयन तैयार हो जाता है। सूर्य के प्रकाश के कारण यह अभिक्रिया और भी तेज हो जाती है। जब यह आकाश से धरती की ओर बरसती है तो इनकी बूंदों के साथ वायु में विद्यमान अन्य हानिकारक रसायनों के कण भी घुल जाते हैं। वायु में विद्यमान कार्बन डाई आक्साइड जैसी गैस से जब अम्लीय वर्षा की बूंदें अभिक्रिया करती हैं तो वर्षा का pH मान 5.6 से भी कम हो जाता है जिसके कारण अम्लीयता और भी बढ़ जाती है।

गौरतलब है कि जितने प्रदूषक वायुमण्डल में विद्यमान हैं उनमें से सभी अम्लीय वर्षा के साथ घुलकर पृथ्वी की सतह तक नहीं पहुंचते। आधे से अधिक अम्लीयता वायुमंडल से पृथ्वी की सतह तक वर्षा के रूप में ना होकर शुष्क निक्षेपों जैसे गैस या शुष्क कणों के रूप में पहुंचती है। हवा इन अम्लीय कणों तथा गैसों को भवनोंए कारोंए घरों तथा वृक्षों पर जमा कर देती है। कभी.कभी ये अम्लीय कण तथा गैसें जिस वस्तु पर जमा होती हैं उसे बुरी तरह क्षतिग्रस्त कर देती हैं। शुष्क रूप में निक्षेपित गैसें तथा अम्लीय कण कभी-कभी बरसात के दिनों में उन स्थानों से धो दिए जाते हैं जहां ये जमे हुए रहते हैं। ऐसी स्थिति में बहने वाला जल और भी अधिक अम्लीय हो जाता है। अम्लीय वर्षा तथा शुष्क निक्षेपित अम्लीय कणों के सम्मिश्रण को अम्लीय निक्षेप का नाम दिया गया है।

अम्लीय वर्षा के प्रभाव के रूप में वायु प्रदूषण को परिवर्तित करने वाली रासायनिक क्रियाएं कई घंटों से लेकर कई दिनों का समय ले सकती है। जब चिमनियों की ऊंचाई बहुत कम होती थी तो वायु प्रदूषकों को आसपास की जमीन पर पहुंचने में अधिक समय नहीं लगता था। ऐसे में कम ऊंचाई वाली इन चिमनियों के धुएं से आसपास की वनस्पतियां तथा प्राणी तत्काल प्रभावित हो जाते थे। परन्तु इस स्थिति से बचने के लिए चिमनियों की ऊंचाई बढ़ाई गयी। इसके लिए सरकार की ओर से कानून भी बनाए गये। लोगों ने सोचा कि कारखानों से निकलने वाले धुएं को ऊँचाई पर छोड़ने से वायु प्रदूषण से कुछ हद तक मुक्ति मिल जाएगी। परन्तु वैज्ञानिकों ने इस अवधारणा को सही नहीं पाया है। प्रदूषकों को ऊंचाई पर ले जाकर छोड़ने के कारण उन्हें वायु में बने रहने का अधिक समय मिल जाता है। जितने अधिक समय तक प्रदूषक वायु में मौजूद रहेंगेए उतने ही अधिक इसके अम्लीय वर्षा के रूप में परिवर्तित होने के अवसर बढ़ते जाएंगे। औद्योगिक इलाकों से दूर बसे क्षेत्र भी अम्लीय वर्षा के प्रभाव से प्रभावित होते हैं। शुष्क निक्षेपों की मात्रा सामान्यतः उन शहरों तथा औद्योगिक क्षेत्रों के समीप अधिक होती है जहां से प्रदूषक वायु में छोड़े जाते हैं।

मानव जनित औद्योगिक तथा वाहन प्रदूषण के कारण उत्पन्न अम्लीय वर्षा के प्रभाव के अतिरिक्त, अम्लीय वर्षा के प्राकृतिक स्रोतों के रूप में ज्वालामुखियोंए प्राकृतिक गीजरों तथा गर्म पानी के झरनों के उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इन प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न अम्ल को पुनः चक्रित करने की विधियां प्रकृति में स्वयं ही विद्यमान हैं। इन अम्लों का विघटन तथा इनका अवशोषण प्रकृति में होता रहता है। प्राकृतिक स्रोतों से उत्पन्न होने वाले अम्ल की यह अल्प मात्राए खनिजों तथा अन्य पोषक तत्वों को मिट्टी में घोलने में सहायक होती है जिससे कि वृक्ष तथा अन्य वनस्पतियां पोषक तत्व प्राप्त करती हैं।

अम्लीय वर्षा के प्रभाव के विषय में सन् 1800 में यूरोप वासियों को पता चला। यूरोप तथा उत्तरी अमेरिका में अम्लीय वर्षा के प्रभाव सबसे अधिक दिखाई दिये हैं। यहां के कुछ विशेष पारितंत्र विशेष रूप से अम्लीय वर्षा से कुप्रभावित हुए हैं। जिन स्थानों पर मिट्टी की परत बहुत पतली हैए कैल्शियम की मात्रा बहुत कम है और वे ठोस चट्टानों के मध्य स्थित हैं वहां के सभी प्राणीए वनस्पतियां तथा बैक्टीरिया तक अम्लीय वर्षा के प्रभाव हुए हैं। वैसे विश्व भर में अम्लीय वर्षा के प्रभाव सबसे अधिक मीठे जल वाले तालाबोंए सरिताओं तथा नदियों वाले पारितंत्र पर पड़े हैं और वहां के प्राणियों तथा वनस्पतियों पर इसका कुप्रभाव अधिक देखा गया है। जल आधारित पारितंत्र की तुलना में भूमि आधारित पारितंत्र अम्लीय वर्षा के प्रभाव से उतना अधिक प्रभावित नहीं हुआ है।

अम्लीय वर्षा के प्रभाव से जल और मिट्टी के चभ् मान में परिवर्तन होने के कारण जलीय जीवन के लिए जान बचाना मुश्किल हो जाता है। वहीं पर मिट्टी के रासायनिक गुणों  में परिवर्तन आ जाने के कारण वनस्पतियों के विकास पर भी कुप्रभाव पड़ता है। अम्लीय वर्षा सागर के तटीय क्षेत्रों में स्थित एस्चुअरी के जल की गुणवत्ता पर भी प्रभाव डालती है। नाइट्रिक अम्ल के कारण जल में घुलित आक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। इस प्रक्रिया को हाइपोक्सिया के नाम से जाना जाता है। अम्लीय वर्षा के प्रभाव से कृषि उत्पादों पर विपरीत प्रभाव पड़ता है तथा इसके कारण वनों में वनस्पतियों के विकास पर भी कुप्रभाव पड़ते हुए देखा गया है।

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