भूगोल और आप |

अल-निनो की उत्पत्ति व प्रभाव की स्थितियां

अल-निनो एक सागरीय गर्म धारा है जो सामान्यतया सुव्यवस्थित तथा मार्ग का अनुसरण करते हुए
प्रवाहित होती है। यह भूमध्यरेखीय पवन प्रवाह से सम्बन्धित है तथा यह अपने उत्पत्ति कारकों के साथ-
साथ बदलती रहती है। यह पीरू एवं इक्वेडोर के तट पर प्रवाहित होती है। समय के अनुसार वायुदाब
तथा पवन संचार में परिवर्तन से यह प्रत्यक्ष रूप में प्रवाहित होती है। यह सापेक्षिक रूप से विश्व
जलवायु प्रतिरूप को प्रभावित करती है।
चक्र : यह धारा क्रिसमस के निकटवर्ती समय में उत्पन्न होती है। इसका नामकरण स्पेनिश भाषा के
शब्द El-Nino पर किया गया है जिसका तात्पर्य ‘शिशु ईसा’ (The boy child, Jesus) है यह प्रशान्त
महासागर से पीरू इक्वेडोर के तट के सहारे दक्षिण की ओर प्रवाहित होती है। अनुभव से ज्ञात हुआ है कि
इसका प्रतिरूप बदलता रहता है जो अर्द्ध-चक्रीय (Semi Cyclical) रूप में परिलक्षित होता है। नूतन वर्षों
में अल-निनो सन् 1953, 1957-58, 1972-73, 1976, 1982-83 तथा 1990 के दशक में प्रभावी रही है।
वैज्ञानिकों ने शोध के उपरान्त पाया है कि जब धारा परिवर्तित रूप में प्रकट होती है तो एक विशेष प्रकार
की भौगोलिक परिघटना उत्पन्न होती है। कुछ महत्वपूर्ण पर्यावरणीय परिघटनाओं तथा अल-निनो घटना
के मध्य कुछ रोधक सहसम्बन्ध स्थापित किये गये हैं जिनमें पूर्वी प्रशान्त क्षेत्र के सहारे स्थित
अन्तःसागरीय भूकम्पीय गतिविधियाँ (Submarine Seismic Activities) सम्मिलित हैं जो पृथ्वी की मध्य
सागरीय घटक पर सर्वाधिक तीव्र गति से प्रवाहित होने वाली व्यवस्था है। लेकिन यह संयोजन सभी
कारण सहित सिद्ध नहीं हुआ है। अंतरा उष्ण कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र विषुवत रेखा के पास पाया जाने
वाला ऐसा न्यून दाब रेखा का क्षेत्र होता है। जहां उत्तर-पूर्वी तथा दक्षिणी पूर्वी व्यापारिक पवनें आपस में
मिलती है। यह क्षेत्र ऋतुओं के अनुसार विषुवत रेखा से उत्तर तथा दक्षिण की ओर खिसकता रहता है।

सूर्य के उत्तरायण होने पर यह उत्तरी गोलार्द्ध में 25 डिग्री अक्षांश तक पहुंच जाता है। मानसून उत्पत्ति में
भी इसकी महत्वूर्ण भूमिका है। यह अपनी सामान्य दशाओं में शांत रहता है तथा अधिक दाब स्थिति में
उत्तर में प्रसारित हो जाता है। जहां व्यापारिक पवनें शक्तिशाली होती हैं तथा दक्षिणी भूमध्यरेखीय धारा
भी शक्तिशाली होती हैं। फलस्वरूप दक्षिणी अमेरिकी की ओर सागरीय जल ठंडा होने लगता है लेकिन
ITCZ का दक्षिण की ओर स्थानान्तरित होना प्रकृति में एक निश्चित चक्रीय व्यवस्था है। अन्तरा उष्ण
कटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र के दक्षिण में स्थानांतरण की स्थिति को दक्षिणी दोलन (Southern
Oscilllation) कहते हैं। इस प्रकार अल-निनो एवं दक्षिणी दोलन की सामूहिक स्थिति एन्सो (ENSO)
कहलाती है।
स्पष्ट है कि ITCZ के दक्षिण में स्थानान्तरण से दक्षिणी दोलन उत्पन्न होता है जो न्यूनदाब का केन्द्र
होता है तथा दक्षिणी गोलार्द्ध में व्यापारिक पवनों को कमजोर एवं सामान्य बना देता है जिससे उनकी
दक्षिणी पूर्वी दिशा में परिवर्तन से प्रशान्त महासागर में दक्षिणी विषुवत् रेखीयधारा कमजोर होकर विपरीत
हो जाती है। जिससे उष्ण जल दक्षिणी अमेरिका की (पीरू-इक्वेडोर तट) ओर प्रवाहित होकर संचित होने
लगता है जिससे वहां तापमान में वृद्धि हो जाती है। सन् 1983 में यहां का तापमान सामान्य से 1 डिग्री
सेंटीग्रेड से अधिक बढ़ गया था। ITCZ दिसम्बर से फरवरी में सामान्य से भी दक्षिणतम होते हैं तथा
अल-निनो का प्रभाव भी सर्वाधिक इसी समय उत्पन्न होता है।

Post a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.