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इलैक्ट्रानिक कचरे का उचित प्रबंधन जरूरी है

सूचना प्रौद्योगिकी में आयी क्रांति ने कई मायने में सारी दुनिया की तस्वीर ही बदल दी है। यह प्रौद्योगिकी संचारए मनोरंजनए स्वास्थ्यए शिक्षा जैसे अनेकों क्षेत्रों में मानव हित  के लिये वरदान सिद्ध हुई है। इस प्रौद्योगिकी के सहारे आज सुख सुविधा तथा सम्पन्नता की नई इबारतें लिखी जा रही हैं। जहाँ एक ओर सूचना प्रौद्योगिकी में इस्तेमाल किये जाने वाले विभिन्न उपकरणों में सुधार कर नित नये माडल तेजी से बाजार में उतारे जा रहे हैं वहीं बेकार हो गये उपकरणों के कारण बड़ी मात्रा में कचरा भी जमा होता जा रहा है। इस कचरे में सीसाए केडमियमए पाराए क्रोमियमए अज्वलनशील प्लास्टिकए कैथोड किरण ट्यूबए लिथियमए सिल्वर आक्साइडए जिंक तथा निकल जैसी विषैली भारी धातुएं तथा रसायन मौजूद होते हैं जो आसानी से प्रकृति में नष्ट नहीं होते। अतः यह कचरा धीरे.धीरे पर्यावरण तथा मानव स्वास्थ्य के लिये नुकसान दायक सिद्ध होता जा रहा है। मानव हित में इस कचरे का उचित प्रबंधन करना एक गम्भीर चुनौती बनती जा रही है।

टेलीफोनए फैक्सए कम्प्यूटरए लैपटॉपए प्रिंटरए टेलीविजनए जीरॉक्स मशीनए कैल्कुलेटरए कैमराए घड़ियांए मोबाइलए म्यूजिक सिस्टमए बैटरियां तथा कई अन्य ऐसे उपकरण हैं जो प्रयोग में आने के बाद या तो पूर्ण रूप से बेकार हो जाते हैं या फिर उनमें से कुछ रिपेयर करके पुनः प्रयोग में लाने योग्य बना लिये जाते हैं। सामान्यतः रिपेयर करने लायक उपकरणों की मात्रा काफी कम होती है तथा लोग रिपेयर में पैसा खर्च करने के बजाय नया माडल लेने पर अधिक जोर देते हैं। वैसे भी इलैक्ट्रानिक उपकरणों को रिपेयर करने की कला पश्चिमी देशों  विशेष रूप से अमेरिका तथा यूरोप में धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। अतः इन देशों में उपयोग किये गये तमाम इलैक्ट्रानिक उपकरण कचरे में तब्दील होते जा रहे हैं।

एक अनुमान के अनुसार केवल अमेरिका में ही प्रतिवर्ष लगभग 50 मिलियन टन इलैक्ट्रानिक कचरा ई.कचराद्ध उत्पन्न होता है। चूंकि इस कचरे का उचित प्रबंधन करना एक बेहद महंगी प्रक्रिया है अतः इससे बचने के लिए अधिकांश पश्चिमी देश अपने ई.कचरे को उन देशों को काफी सस्ते दामों पर बेच देते हैं जहां रिपेयर करने की कार्यकुशलता अधिक है तथा रॉ मैटिरियल की अधिक मांग है। एशिया तथा अफ्रीका में गरीबी व बेरोजगारी अधिक है तथा मजदूरी भी सस्ती है और यहाँ पर्यावरण सम्बन्धी कानून भी सख्ती से लागू नहीं किये जाते। अतः पश्चिमी देशों का ई.कचरा पुनः चक्रण (रिसाईक्लिंग) के नाम पर चीन तथा भारत के अलावा दक्षिण कोरियाए ताईवानए मलेशियाए केन्याए घानाए नाइजीरियाए आईवरीकोस्ट तथा हैती जैसे देशों को बेरोक टोक भेजा जा रहा है। चीन तथा भारत में इलेक्ट्रिनिक को बड़े पैमाने पर रिसाईक्लिंग कर बहुमूल्य धातुओं तथा पुर्जों को प्राप्त किया जाता है। यही कारण है कि चीन तथा भारत में इलेक्ट्रिनिक कचरे का उचित प्रबंधन एक बड़े उद्योग का रूप ले चुका है। आज यह उद्योग बड़े शहरों से निकलकर छोटे.छोटे शहरों तक फैलता जा रहा है। कम लागत में अधिक कमाई का जरिया बन रहे इस उद्योग के प्रति गरीब देशों के अकुशल मजदूर कारीगर तथा बेरोजगार लोग बड़ी संख्या में आकर्षित होते जा रहे हैं।

भारत के संदर्भ में जब हम ई-कचरे का मूल्यांकन करते हैं तब कई चौंकाने वाले तथ्य हमारे सामने आते हैं। इस समय अमेरिका तथा यूरोप से भारी मात्रा में ई-कचरा भारत में आयात किया जा रहा है। आंकड़े यह बताते हैं कि भारत में ई-कचरे का आयात 48 प्रतिशत तक बढ़ गया है। केवल पिछले ही साल विकसित देशों का 64 लाख टन विषैला ई.कचरा भारत में जमा किया गया। जबकि भारत में स्वयं का 59 लाख टन ई-कचरा उत्पन्न हुआ। कन्ट्रोलर तथा आडिटर जनरल (सीएजी) की एक रिपोर्ट तथा अन्य स्रोतों के अनुसार 7 लाख टन से अधिक विषाला औद्योगिक कचराए 4 लाख टन ई-कचराए 1.5 लाख टन प्लास्टिक कचरा और 1.7 लाख टन मेडिकल कचरा तथा 48 लाख टन  म्यूनिस्पिल कचरा प्रतिवर्ष भारत में उत्पन्न होता है। अगर भारत से आने वाला ई-कचरा और स्वयं उत्पन्न किये गये ई.कचरे की यही रफतार रही तो भारत जल्दी ही दुनिया के सबसे बड़े कूड़ेदान में बदल जायेगा। एक अध्ययन के अनुसार चीन के बाद सबसे अधिक ई-कचरा भारत में उत्पन्न होने की सम्भावना व्यक्त की जा रही है। लगभग 800 हजार मिलियन टन ई-कचरा प्रतिवर्ष भारत में उत्पन्न होगा। इस समय भारत में उत्पन्न हो रहे म्यूनिस्पिल तथा प्लास्टिक कचरे का लगभग 40 प्रतिशत इकट्ठा ही नहीं किया जाता तथा 50 प्रतिशत जैविक कचरा अनुपचारित रह जाता है। ऐसा इसलिये है कि भारत के अधिकांश शहरों में घरेलू तथा प्लास्टिक कचरे के उचित प्रबंधन के लिये समुचित संसाधन उपलब्ध नहीं हैं जबकि इस कार्य के लिये सुयोग्य तकनीक विकसित की जा चुकी है। पर्यावरण मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में 110 ऐसे सुविधा सम्पन्न स्थल हैं जहाँ जैविक कचरे के 50 प्रतिशत का उपचार किया जा सकता है। इस प्रकार भारत में घरेलू तथा ई-कचरे के उचित प्रबंधन हेतु पर्याप्त व्यवस्था ना होने के कारण बाहर से आने वाले ई.कचरे के साथ घरेलू ई-कचरा भी रिसाईक्लिग उद्योग में लगे छोटे.बड़े व्यापारियों द्वारा खरीदा जा रहा है जिसको वे अपने ढंग से ठिकाने लगा रहे हैं।

इस समय ई-कचरा उत्पन्न करने के मामले में मुम्बई शहर सबसे ऊपर है और उसके बाद दिल्ली का नंबर आता है। केवल मुम्बई में ही प्रतिवर्ष  लगभग 19 हजार टन ई-कचरा उत्पन्न होता है और लाखों टन कचरा विदेशों से आयात किया जाता है। बंगलुरू में प्रतिमाह दस हजार टन ई-कचरा उत्पन्न होता है। भारत के महानगरों में जनसंख्या घनत्व अधिक होने के कारण इस विषैले कचरे से लोगों के प्रभावित होने की सम्भावना अधिक होती जा रही है। इस समय भारत के गुजरातए महाराष्ट्रए आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, पश्चिम बंगाल तथा तमिलनाडु जैसे राज्यों में देश का लगभग 80 प्रतिशत ई-कचरा उत्पन्न हो रहा है।

भारत में ई-कचरे का उचित प्रबंधन एक उद्योग का रूप ले चुका है। अधिकांशतः इस व्यापार को अनौपचारिक सेक्टर द्वारा संचालित किया जा रहा है। इस उद्योग में अनुमानतः 5 मिलियन लोग लगे हुये हैं। एक आंकड़े के अनुसार केवल दिल्ली में ही प्रतिवर्ष 10 से 20 लाख टन ई-कचरे को ठिकाने लगाने में लगभग 25 हजार लोग गैरकानूनी ढंग से लगे हुए हैं। जबकि केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार दिल्ली में केवल 16 फर्मों को इलैक्ट्रानिक कचरे के उचित प्रबंधन के लिये पंजीकृत किया गया है। पूरे देश में 5 हजार से भी कम फर्में इस काम के लिये पंजीकृत हैं। कृषि कार्य में जहां लोग वर्ष भर में महज 50 हजार रूपये कमा पाते हैं वहीं कचरे के उचित प्रबंधन में उन्हें आसानी से 12 से 15 हजार रूपये प्रतिमाह मिल जाते हैं। अब मुम्बई, दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, बंगलूरू जैसे महानगरों से इस व्यापार को पैसा कमाने की लालच में मेरठ, मुरादाबाद, फिरोजाबाद तथा रेवाड़ी जैसे छोटे-छोटे शहरों की ओर ले जाया जा रहा है। यद्यपि 2008 के विषैले कचरा प्रबन्धन कानूनों में इलैक्ट्रानिक-कचरे के उचित प्रबंधन के कई पहलुओं को परिभाषित किया गया है परन्तु अधिकांश लोगों द्वारा इन कायदे-कानूनों को ताक पर रखकर काम किया जाता है। जबकि इन कानूनों में दोषी पाये जाने वालों के खिलाफ कठोर दण्ड दिये जाने का प्रावधान भी किया गया है। साथ ही साथ लेड तथा लेड एसिड बैटरियों तथा रेडियोसक्रिय विषैले कचरों के आयात पर सरकार द्वारा प्रतिबंध भी लगाया गया है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि इलैक्ट्रानिक-कचरे में मौजूद विषैले पदार्थों के सम्पर्क में यदि कोई व्यक्ति बराबर रहता है तो उसके मस्तिष्कए नाड़ी तंत्राए फेफड़ेए गुर्दे तथा जननांगो के ऊपर काफी बुरा प्रभाव पड़ता है। लोगों के अस्थमा तथा कैंसर से पीड़ित होने के कई उदाहरण मिलते हैं। इलैक्ट्रानिक-कचरे में मौजूद तमाम विषैले रसायन तथा तत्व धीरे-धीरे घातक तथा जहरीले साबित होते हैं। एक अध्ययन के मुताबिक इस उद्योग में लगे दस में से सात लोगों के खून में सीसे की मात्रा बढ़ी हुई पायी गयी है। इन विषैले पदार्थों के प्रति जागरूकता की कमीए गरीबीए बेरोजगारी तथा दो समय की रोटी का जुगाड़ करने के लिये मजबूरी में लोग अपनी जान जोखिम में डालते हैं। 2008 में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक दल का गठन किया था जिसने इस क्षेत्र में काम करने वालों को मेडिकल सुविधाएं देने के लिये कई सुझाव दिये थे। इलैक्ट्रानिक-कचरे को जब अनियन्त्रित ढंग से जलाया जाता है तो भयंकर धुएं का गुबार उठता है जिसमें डाई आक्सीन और फुरेन जैसी जहरीली गैसें मौजूद होती हैं। इससे वायु प्रदूषित होती है तथा लोगों के शरीर के विशेष अंगो पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

जिन स्थानों पर इलैक्ट्रानिक-कचरे की प्रोसेसिंग की जाती है वहां जलए वायु, भूमि तथा कृषि उत्पादों के प्रदूषित होने के कारण कई प्रकार की पर्यावरणीय समस्याऐं उत्पन्न होती पायी गयी हैं। विषैले रसायन तथा भारी तत्वों के भूमि में रिसाव के कारण भूमिगत जल भी प्रदूषित होता जाता है। स्वास्थ्य तथा पर्यावरण के लिये खतरा बन रहे इलैक्ट्रानिक-कचरे की उचित प्रबंधन की प्रक्रिया को आधुनिक बनाने के प्रयास नहीं किये जा रहे हैं क्योंकि इस व्यवसाय में लगे लोगों को पर्यावरण तथा स्वास्थ्य की चिंता ना होकर केवल धन कमाने का लालच रहता है।

जब टेलीविजनए वीसीआर इत्यादि जैसे उपकरणों के प्रिंटेड सर्किट बोर्ड का निस्तारण करना होता है तब लोगों के सामने कई चुनौतियाँ आती हैं क्योंकि इनमें सोना, चाँदीए प्लेटिनम, तांबा, लोहा तथा एलुमिनियम जैसे मूल्यवान धातुओं का प्रयोग किया जाता है। इसके लिए क्रायोजनिक डिकम्पोजिशन जैसी विधियाँ इजाद की गयी हैं परन्तु शायद ही लोग इसका प्रयोग करते हों। चूंकि इलैक्ट्रानिक-कचरे की प्रोसेसिंग करने से कम लागत पर इन धातुओं को प्राप्त किया जाता है इसीलिये लोग अपने स्वास्थ्य और पर्यावरण की परवाह किये बगैर किसी आधुनिक विधि को उपयोग में लाये बगैर इस काम में लगे हुये हैं।

भारत में इलैक्ट्रानिक-कचरे की बढ़ती मात्रा के कारण यह कचरा पर्यावरण तथा स्वास्थ्य के लिये एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। अतः इस कचरे का उचित प्रबंधन आधुनिक विधियों से करना बेहद जरूरी हो गया है। इस मामले में शहरों के प्रशासकों को गंभीर प्रयास करने होंगे तथा सरकार को कठोर कायदे कानून बनाने होंगे। सबसे पहले विदेशों से आने वाले कचरे को प्रतिबंधित कर इस कार्य की शुरूआत होनी चाहिए। चीन ने पहल करते हुए विदेशी कचरे के आयात पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।

गौरतलब है कि इस समय भारत में कचरे का उचित प्रबंधन के केवल दस प्रतिशत लक्ष्य ही प्राप्त किया जा रहा है। इतने कानून तथा कायदे मौजूद होने के बावजूद यदि यह स्थिति है तब इस क्षेत्र के प्रति उपेक्षा का भाव स्वयं ही परिलक्षित होता है जो भारतीय समाज के लिये शुभ नहीं कहा जा सकता। यद्यपि इलैक्ट्रानिक कचरे का उचित प्रबन्धन एक खर्चीला कार्य है परन्तु पर्यावरण तथा स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिये यह काम गम्भीरता से करना होगा।

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