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उत्तर भारत में तेज आंधी-तूफान की वजहें क्या थीं?

केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार 2 मई, 2018 को आंधी-तूफान एवं बिजली गिरने की घटनाओं में देश के पांच राज्यों में 140 लोगों की जानें चली गईं और 300 से अधिक लोग घायल हो गये। सर्वाधिक 73 मौतें उत्तर प्रदेश में हुई जबकि 35 लोगों की मौत राजस्थान में हो गई। बाद में भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने ऐसी और आंधी-तूफान और बारिश आने का पूर्वानुमान किया। आईएमडी के अनुसार पश्चिमी हिमालय क्षेत्र एवं उत्तर-पश्चिमी भारत के मैदानों के ऊपर सक्रिय पश्चिमी विक्षोभ की वजह से फिर से तेज आंधी-तूफान का पूर्वानुमान किया गया।

मुख्य वजह

भारतीय मौसम विभाग के अनुसार 2 मई, 2018 को जम्मू-कश्मीर, पंजाब, हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड की कुछ जगहों पर वर्षा/आंधी तूफान के साथ हवा का तेज झोंका तथा हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, पूर्वी राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में आंधी-तूफान/धूल भरी आंधी तथा वायु का तेज झोंका के मुख्य कारण निम्नलिखित थे;

  1. पश्चिमी विक्षोभ
  2. हरियाणा एवं उसके आसपास के ऊपर निम्न स्तर पर चक्रवातीय परिसंचरण
  3. पश्चिमी हिमालय के क्षेत्र सहित भारत के उत्तरी हिस्सों के ऊपर मजबूत पूर्वी पवनों की मौजूदगी,
  4. उत्तर पश्चिमी भारतीय मैदानों विशेषकर दक्षिणी हरियाणा, दक्षिणी उत्तर प्रदेश, राजस्थान एवं मध्य प्रदेश में विगत कुछ दिनों में अत्यधिक गर्मी,
  5. आलोच्य क्षेत्र में नमी की मौजूदगी।

क्या होता है पश्चिमी विक्षोभ?

भारतीय उपमहाद्वीप के उत्तरी भाग में (शीतकाल) उत्तर-पश्चिम की ओर से चलने वाली चक्रवातीय पवन व्यवस्था को पश्चिमी विक्षोभ कहते हैं। इसकी उत्पति उत्तरी अटलांटिक क्षेत्र से मानी है जहाँ से ये भूमध्य सागर होते हुए भारतीय उपमहाद्वीप तक पहुँचते हैं। शीतकाल में मध्य एशिया में उच्च वायुदाब का केन्द्र बन जाता है, जिसके प्रभाव से शीतोष्ण कटिबन्धीय पछुआ पवनें हिमालय के उत्तरी भाग तक चलने लग जाती हैं। इस क्रम में अनेक बार ये पवनें हिमालय पर्वत को भी पार कर लेती हैं जिससे उत्तर के मैदान में तापमान 40-50 तक गिर जाता है व हिमालय में हिमपात होता है। वास्तव में ये उत्तरी-पश्चिमी भाग से आने वाले चक्रवात हैं जो भूमध्य सागर से ईरान व पाकिस्तान होते हुए भारत पहुँचते हैं। पश्चिमी विक्षोभों को भारत पहुँचने में पश्चिमी जेट पवनें सहायता करती हैं। विक्षोभ भारत में मुख्यतः दिसम्बर से फरवरी तक प्रभावी रहते हैं लेकिन कभी-कभी इनका प्रभाव मार्च तक भी रहता है जिनसे उत्तरी भारत में शीतकालीन वर्षा प्राप्त होती है इसे महावट कहते हैं। यह वर्षा गेहूँ, जौ, रबी आदि की फसलों के लिए अत्यधिक लाभदायक होती है। इसमें नई दिल्ली में 79 मिमी. वर्षा होती है। स्थानीय मानक से अधिक ठण्डा मौसम हो जाता है तथा हिमालय में हिमपात होता है।

ये पश्चिमी विक्षोभ वास्तव में भूमध्यसागरीय अवदाबों का ही सतत प्रसार होते हैं। नूतन शोध से ज्ञात हुआ है कि अनेक द्वितीयक अवदाब ईरान के ऊपर विकसित होते हैं जो प्राथमिक रूप से उत्तरी भारत में दक्षिण-पूर्वी यूरोप तथा दक्षिणी रूस से जुड़े होते हैं। इसी प्रकार विशेष परिस्थितियों में अनेक बार द्वितीयक अवदाब प्राथमिक से विकसित होकर गंगा-सिंधु के मैदान में उतरते हैं। भूमध्य सागर से पंजाब में पहुँचने वाले विक्षोभ कमोबेश रूप में धरातल पर अधिविष्ट (Occluded) रूप में वाताग्री संरचना वाले होते हैं। इनकी बारम्बार गहराई एवं गतिविधि ऊपरी विसरण (Upper Air Divergence) से सम्बन्धित होती है। पश्चिमी विक्षोभों के बारे में स्पेट (OHK Spate) ने बताया है कि ये भूमध्यसागरीय चक्रवात है या नहीं यह स्पष्टतः नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उत्तरी-पश्चिमी सीमांत के पश्चिम में सूचनाएँ पूर्णतः उपलब्ध नहीं है तथा मैदानों में हल्की वर्षा होती है, हिमालय क्षेत्र में हिमपात होता है जिससे शीतलहर चलती है। इस प्रकार भारत में आने वाले इन अवदाबों के प्रभाव हानिकारक एवं लाभकारी दोनों रूपों में परिलक्षित होते हैं। शीतकालीन वर्षा महावट के रूप में रबी की फसल के लिए अधिक लाभकारी होती है, जबकि फरवरी-मार्च में इनके कारण तूफान एवं ओलावृष्टि होती है व दिसम्बर, जनवरी में भी हिमालय में होने वाली हिमपात के कारण उत्तरी भारत में शीतलहर भी चलती है जिससे विपरीत प्रभाव पड़ते हैं।

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