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कर्नाटक में पत्थर विखंडन इकाईयां और एनआरडीएमएस

पत्थर विखंडन बड़े पत्थरों को अपनी आवश्यकताओं के आधार पर छोटे पत्थरों में विभाजित करने की प्रक्रिया है। विखंडन पत्थर विभिन्न निर्माण गतिविधियों के लिए कच्चे माल हैं और इनका सड़कों, राजमार्गों, भवनों, पुलों तथा अन्य निर्माणों में उपयोग किया जाता है। सीमेंट उत्पादों जैसे कंकरीट, खोखले ब्लॉक, दरवाजा फ़्रेम और सड़क बिछाने के लिए भी इनका उपयोग आवश्यक है। निर्माण गतिविधियों की बढ़ती संख्या के कारण हर प्रमुख शहर में पत्थर विखंडन इकाइयों की आवश्यकता होती है। निर्माण और कच्चे माल उद्योग में उच्च मांग के बाद, वर्ष 2007-08 में भारत में पत्थर विखंडन उद्योग का सालाना कारोबार 1 अरब अमरीकी डालर (सीपीसीबी, 2009) के बराबर अनुमानित था।

पत्थर विखंडन इकाइयों में मजदूरों की आवश्यकता अधिक संख्या में है और इस क्षेत्र में अशिक्षित और अकुशल मैनुअल श्रमिकों को रोजगार उपलब्ध है। इकाइयां खनन में शामिल हैं, पत्थर विखंडन आकार के वर्गीकरण करती हैं और कच्ची सामग्रियों को निर्माण स्थलों तक पहुंचाती हैं। ये संचालन उड़ने वाले धूल कणों को जारी करता है जो कि मजदूरों और आसपास के पौधों में रहने वाले जनसंख्या दोनों के लिए हानिकारक हैं। क्षेत्र के सौंदर्यशास्त्र में बाधा आने के कारण ये उत्सर्जन गंभीर श्वसन समस्याओं का कारण है। इसके अलावाए इन कणों ने गंभीर रूप से वनस्पतियों और पशुओं को प्रभावित किया है, इससे वनस्पतियों का विकास प्रभावित हो सकता है।

पत्थर विखंडन इकाई स्थापित करने के बाद के प्रभाव को ध्यान में रखते हुए, कुछ सुरक्षित क्षेत्रों को पहचानने की आवश्यकता है। इन सुरक्षित क्षेत्रों की पहचान दिशा निर्देशों के एक समूह के द्वारा की गई हैए जो राज्य सरकार और उसके प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा तय किए गए हैं। टिकाऊ विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए पर्यावरण पर पत्थर विखंडन इकाई के प्रभाव को कम करने के लिए ये दिशानिर्देश तैयार किए गए हैं। कच्चे माल की मांग और भौगोलिक इलाके को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक राज्य के अपने दिशानिर्देश हैं।

कर्नाटक उन भारतीय राज्यों में से एक है, जिनमें भारी खनिज भंडार हैं। सीएसई इंडिया के अनुसारए कर्नाटक में भारत का सबसे बड़ा लौह अयस्क भंडार है, जो देश में कुल भंडार का 41% हिस्सा है। राज्य में पत्थरों का उत्खनन भी एक बड़ा व्यवसाय है। रेत, मिट्टी, लेटेराइट और ग्रेनाइट की उत्खनन ने कर्नाटक को देश में सबसे बड़ा पत्थर विखंडन हॅब बनने के लिए उत्तरदायी किया है। उत्खनन, खनन और विखंडन की व्यापक मात्रा में राज्य के लिए कई पर्यावरणीय समस्याएं सामने आई हैं, जिनमें भूमि गिरावटए वायु और ध्वनि प्रदूषण और भूजल प्रदूषण शामिल है।

 

कर्नाटक प्राकृतिक संसाधन डाटा प्रबंधन प्रणाली (एनआरडीएमएस) कार्यक्रम को 1992 में विकसित किया गया था ताकि सूचनाओं तक आसान पहुँच के लिए एक स्थानिक डेटा प्रबंधन प्रणाली विकसित की जा सके। कर्नाटक एनआरडीएमएस कार्यक्रम को विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी), भारत सरकार और कर्नाटक सरकार से सक्रिय समर्थन और धन प्राप्त हुआ। इस कार्यक्रम का उद्देश्य स्थानीय क्षेत्र की योजना और विकास में स्थानिक डेटा विश्लेषण का उपयोग करना था। पत्थर विखंडन में शामिल गंभीर पर्यावरणीय मुद्दों को ध्यान में रखते हुए, कर्नाटक सरकार ने 2012 में श्स्टोन क्रशर्स एक्टश् लागू किया था जिसमें पत्थर विखंडन इकाई को स्थापित करने के लिए कई दिशा निर्देश दिए थे। दिशानिर्देश निम्नानुसार हैं-

  • दो सुरक्षित क्षेत्रों के बीच कम से कम 50 किमी दूरी का होना चाहिए
  • प्रत्येक पत्थर विखंडन इकाई एक एकड़ के न्यूनतम क्षेत्र में स्थित होगी
  • सुरक्षित क्षेत्र कम से कम होना चाहिएर –
  • निकटतम लिंक रोड से 500 मीटर दूर
  • निकटतम वन से 1 किमी दूर
  • निकटतम राज्य राजमार्ग से 1.5 किमी
  • नजदीकी राष्ट्रीय राजमार्ग से 2 किमी दूर
  • निकटतम निवास स्थान से 2 किमी
  • पूजा के निकटतम स्थान से 2 किमी
  • निकटतम शैक्षणिक संस्थान से 2 किमी
  • निकटतम नदी से 2 किमी दूर
  • निकटतम तालुक मुख्यालय से 2 किमी
  • जिला मुख्यालय से 4 कि. मी.
  • नगर निगम की सीमा से 8 किमी दूर

इन कठोर दिशानिर्देशों के कारणए तटीय और अनिवासी क्षेत्रों में सुरक्षित क्षेत्र की पहचान करना मुश्किल हो जाता है शिमोगा की भौगोलिक विशेषताओं के कारण कुछ मानदंडों को विराम दिया गयाए जिसमें वनस्पति और जल निकाय शामिल हैं। शिमोगा जिले के लिए दिशानिर्देश निम्नानुसार हैं-

  • सुरक्षित क्षेत्र कम से कम होना चाहिए
  • निकटतम सड़क से 250 मीटर (पहले 1 किमी)
  • निकटतम नदी से 250 मीटर (पहले 2 किमी)
  • निकटतम जंगल से 250 मीटर (पहले 1 किमी)
  • निकटतम निवास स्थान से 1 किमी
  • कृषि भूमि के लिए कोई दूरी दिशा-निर्देशित नहीं है

एनआरडीएमएस के सहयोग से कर्नाटक स्टेट काउंसिल ऑफ टेक्नोलॉजी (केएससीएसटी) ने जीआईएस टेक्नोलॉजी का उपयोग स्थानिक और गैर-स्थानिक डेटा का उपयोग करते हुए किया, जिसमें पत्थर विखंडनए वन सीमाएं, भूमि कवर और ढलान के नक्शे शामिल थे। कर्नाटक के शिमोगा जिले के जीआईएस मैपिंग के द्वारा पता चला है कि ढीले मापदंड के बावजूद, कई सुरक्षित क्षेत्र न आने पर सभी बाधाएं जीआईएस सॉफ्टवेयर (केएसएसटी, 2014) में जोड़ दी गईं। यह कर्नाटक सरकार के लिए एक वरदान साबित हुआ क्योंकि इससे भविष्य में स्थानिक डेटा का उपयोग करके आवश्यक क्षेत्र में सुधारात्मक उपाय करने में उन्हें सहायता मिल सकती है।

निष्कर्ष

जीआईएस स्थानिक डेटा प्रबंधन को आकार दे रहा है और इसे दैनिक जीवन के हर हिस्से में लागू कर रहा है। शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, पुलिस, कानून प्रवर्तन और पर्यटन केवल उन पहलुओं में से कुछ हैं जिनके जीआईएस को एकीकृत किया गया है। एनआरडीएमएस कर्नाटक सरकार के साथ मिलकर चुनाव में जीआईएस को लागू करने, पत्थर विखंडन इकाइयों, दूरसंचार और अपराध मानचित्रण के लिए स्थानों की पहचान करने के लिए काम कर रहा है। आज के समय और युग में जीआईएस द्वारा लोगों की भलाई के लिए कानूनों और नीतियों को तैयार करने में सरकार की सहायता करने के लिए अनगिनत संभावनाएं हैं। शिमोगा जिला ऐसा ही एक प्रदर्शन है जहाँ कि जीआईएस वास्तव मेंए स्थानिक डेटा का प्रबंधन और विश्लेषण करने के लिए एक सफल प्रणाली है जो सरकारी निकायों को दिशा निर्देशों को प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद कर सकती है।

Natural Resource Data Management System (NRDMS), विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग, भारत सरकार के तहत, विभिन्न इलाकों में सूक्ष्म स्तर की योजना के लिए भारत में स्थानिक डेटा अवसंरचना के विकास के लिए लगातार काम कर रहा है। अधिक जानने के लिए, wwww.NRDMS.gov.in पर जाएं

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