भूगोल और आप |

किसी भी मौसम में आ सकता है पृथ्वी पर भूकम्प

ईसा पूर्व चौथी शताब्दी में, अरस्तू ने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि भूगर्भीय गुफाओं में फँसी हवा के कारण भूकम्प आता है। ऐसा माना जाता था कि गुफाओं की छतों पर हवाओं के थपेड़ों के कारण हल्के कंपन पैदा होते हैं और धरातल से हवाओं के टकराने के कारण बड़े कंपन पैदा होते हैं। इस सिद्धांत के कारण भूकम्प के मौसम के बारे में विचार उत्पन्न हुआ और यह माना गया गया कि भूमि के अन्दर बड़ी मात्रा में हवाओं के फँसे होने के कारण भूकम्प के पूर्व मौसम गर्म और शांत रहेगा। बाद के सिद्धांत में यह माना गया कि शांत और बादल भरे मौसमों में भूकम्प आने की संभावना रहती है और भूकम्प आने के पूर्व तेज हवा चलती है, आग के गोले ‘उल्काएं’ गिरती हैं। हालांकि यह भी एक मिथक ही है और मौसम तथा भूकम्प के बीच कोई संबंध नहीं है। भूकम्प पृथ्वी के भीतर की भूगर्भीय प्रक्रियाओं का परिणाम है और वह वर्ष में किसी भी मौसम और किसी भी समय आ सकता है। भूकम्प पृथ्वी तल में मीलों दूर उत्पन्न होता है। हवा, हिमपात, तापमान और बैरोमीट्रिक दबाव में परिवर्तन का प्रभाव केवल पृथ्वी के सतह और उथले उपतल पर पड़ता है। भूकम्प का फोकस बहुत गहराई में बनता है जो मौसम संबंधी कारकों से अधिक बलशाली होते हैं। भूकम्प किसी भी मौसम में किसी भी मौसमी जोन में, वर्ष की किसी भी ऋतु में और किसी भी समय आ सकता है।

यद्यपि अब ऐसा लगता है कि भूकम्पों की संख्या में वृद्धि हुई है, फिर भी 7.0 या उससे अधिक परिमाण के भूकम्प इस पूरे शताब्दी में लगभग स्थिर रहे हैं। विश्वसनीय अभिलेखों से यह सिद्ध होता है कि हाल के वर्षों में वस्तुतः भूकम्पों की संख्या में कमी आई है। आधी-अधूरी व्याख्या से यह तथ्य सही लगने लगता है कि गत बीस वर्षों में प्रतिवर्ष भूकम्पों की जितनी संख्या का हम पता लगा पाये हैं और उनकी पहचान कर पाये हैं, वह भूकम्पों की संख्या में वृद्धि को दर्शाता है। ऐसा विश्वभर में भूकम्पमापी केंद्रों की संख्या में अत्याधिक वृद्धि होने तथा विश्व में संचार व्यवस्था में सुधार होने के कारण लग रहा है। वर्ष 1931 में लगभग 350 ऐसे केंद्र थे, आज 4000 से अधिक ऐसे केंद्र हैं और इन केन्द्रों से आंकड़े टेलेक्स, कम्प्यूटर और सैटेलाइट के माध्यम से बड़ी तेजी से भेजे जाते हैं। इन केंद्रों की संख्या में वृद्धि होने तथा एकदम समय पर आंकड़े मिल जाने के कारण इन केंद्रों के लिए कई छोटे-छोटे भूकम्पों का पता लगाना संभव हो गया जिनका पहले के वर्षों में पता ही नहीं चल पाता था। आज भूकम्प का पता तेजी और प्रभावी ढंग से लगा लिया जाता है। संचार व्यवस्था में सुधार होने तथा प्राकृतिक आपदाओं के मामले में लोगों की रूचि बढ़ने के कारण भी भूकम्प आने पर लोग सामान्यतः अधिक सतर्क और जागरूक रहने लगे हैं।

लम्बे समय के अभिलेखों (करीब वर्ष 1900 से) के अनुसार किसी भी वर्ष में लगभग 18 बड़े भूकम्प (7.0-7.9) तथा एक बहुत बड़े भूकम्प (8.0 या उससे अधिक) आने की संभावना रहती है। अभिलेखों से यह पता चलता है कि वर्ष 1971 के बाद वर्ष 1992 में पहली बार बड़े भूकम्पों की संभावित औसत संख्या के आसपास या उससे अधिक संख्या में भूकम्प आये। वर्ष 1970 और 1971 में आये भूकम्पों की संख्या क्रमशः 20 और 19 थी लेकिन बाद में वर्षों में कुल भूकम्पों की संख्या दीर्घावधि औसत पर आधारित प्रतिवर्ष 18 की संख्या से काफी कम थी।

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