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कोपेन द्वारा वर्गीकृत भारत के मुख्य जलवायु प्रदेश

  1. Amw – यह उष्ण कटिबंधीय (मानसूनी) आर्द्र मुख्य जलवायु प्रदेश है जिसमें सबसे ठण्डे माह का तापमान 18 डीग्री सेंटीग्रेड से ऊपर रहता है तथा इसमें लघु शुष्क ऋतु भी होती है। ऐसी जलवायु भारत में कांकण एवं मालाबार तटवर्ती क्षेत्रों में पायी जाती है जिनमें गोवा दक्षिणी पश्चिमी महाराष्ट्र, पश्चिमी कर्नाटक, केरल तथा कन्याकुमारी तक फैला तमिलनाडु तट सम्मिलित है। इनके अतिरिक्त त्रिपुरा व दक्षिणी मिजोरम में भी यह जलवायु मिलती है। यहाँ शीतकाल शुष्क रहता है तथा ग्रीष्म काल एवं वर्षा काल में मानसूनी पवनों द्वारा वर्षा होती है। इस क्षेत्र में 200 से.मी. से अधिक वार्षिक वर्षा प्राप्त होती है, फलस्वरूप सदाबहार वनस्पति पायी जाती है। यह क्षेत्र सह्याद्री पर्वत का पश्चिमी भाग है, जो मानसूनी पवनों की अरब सागरीय शाखा के एकदम सामने पड़ता है तथा इसका दक्षिणी भाग मानसूनी पवनों के प्रवेश पर ही स्थित है, फलस्वरूप पर्याप्त वर्षा प्राप्त होती है तथा कर्क रेखा के दक्षिण में होने के कारण तापमान भी ऊँचा रहता है।
  2. Aw – यह उष्ण कटिबंधीय जलवायु मुख्य जलवायु प्रदेश है। यहाँ भी तापमान अति ठण्डे महिने में 18 डीग्री सेंटीग्रेड से ऊपर रहता है। वह जलवायु प्रदेश केवल तापमान की दृष्टि से ही आर्द्र जलवायु प्रदेश से समानता रखता है जिसका प्रमुख कारण इन प्रदेशों का कर्क रेखा के दक्षिण में अवस्थित होना है। यद्यपि यह प्रदेश Amw से अधिक उष्ण हैं क्योंकि यह सागर तट से दूरी रखता है। इसमें प्रायद्वीपीय भारत के महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, दक्षिणी पूर्वी कर्नाटक, उत्तरी-पश्चिमी तमिलनाडु, उड़ीसा, दक्षिणी बंगाल, झारखण्ड, छत्तीसगढ़, दक्षिणी मध्य प्रदेश व गुजरात को सम्मिलित करते हैं, जहाँ शीतकाल शुष्क होता है। ग्रीष्मकाल एवं वर्षा ऋतु में वर्षा होती है। 100 सेमी समवर्षा रेखा इसे पूर्व एवं पश्चिमी भागों के रूप में दो बराबर भागों में बांटती है। इस प्रकार यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 60 से 200 सेमी. के मध्य प्राप्त होती है। इस प्रकार यह मध्यम वर्षा वाला मुख्य जलवायु प्रदेश है। गुजरात के कच्छ काठियावाड में कम तथा तमिलनाडु के पूर्वी तट में औसत से अधिक भी वर्षा प्राप्त होती है। इस मुख्य जलवायु प्रदेश के घटकों का अंतर्सम्बन्ध वनस्पति के प्रकार एवं फसल प्रतिरूप के रूप में परिलक्षित होता है जबकि दीर्घकालिक रूप में मृदा निर्माण की प्रक्रिया में भी यहाँ की जलवायु की प्रवृति झलकती है।
  3. As – उष्ण कटिबंधीय मुख्य जलवायु प्रदेश का ही एक वर्ग है जहाँ शीतकाल में वर्षा होती है तथा ग्रीष्मकाल शुष्क रहता है। इसका विस्तार दक्षिणी पूर्वी आंध्र प्रदेश के तटीय भागों तथा पूर्वी तमिलनाडु में है। यह प्रदेश मानसून की बंगाल की खाड़ी की शाखा के मार्ग में लगभग समानांतर पड़ता है जो ग्रीष्मकाल में वर्षा से वंचित रहता है। जबकि लौटते हुए मानसून से नवम्बर से जनवरी तक वर्षा होती है। जब ये पवनें बंगाल की खाड़ी से पुनः आर्द्रता ग्रहण कर लेती हैं। यहाँ होने वाली वर्षा की प्रवृति चक्रवातीय होती है। इस मुख्य जलवायु प्रदेश में तापमान ऊँचा (18 डीग्री सेंटीग्रेड से ऊपर) रहता है तथा वर्षा 60 से 200 सेमी तक प्राप्त होती है।
  4. BShw – यह एक प्रकार की स्टैपी जलवायु है जहाँ अर्द्धशुष्क दशायें पायी जाती है तथा संभाव्य वाष्पोत्सर्जन अधिक होता है। वार्षिक तापमान ऊँचा (18 डीग्री सेंटीग्रेड से ऊपर) रहता है। वर्षा का अधिकांश भाग ग्रीष्मकाल तथा शीतकाल में ही प्राप्त होता है। पर्याप्त वर्षा प्राप्त नहीं होती जिस कारण अर्द्ध शुष्क दशायें बनी रहती हैं। इस जलवायु प्रदेश वर्ग में देश के दो क्षेत्र सम्मिलित हैं तथा दोनों ही भिन्न भौगोलिक अवस्थिति वाले क्षेत्र हैं। प्रथम क्षेत्र अरावली पर्वत श्रृंखला के पश्चिम में लगभग समानान्तर विस्तृत है जिसके ठीक पश्चिम में थार का रेगिस्तान है। यह पर्वतीय एवं मरूस्थलीय दशाओं के मध्य स्थित अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश है जहाँ मानसूनी पवनों की अंतिम पहुँच में स्थित होने तथा अरावली के समानान्तर व अधिक अवरोधक अवस्थिति एवं ऊँचाई नहीं होने से वर्षा पर्याप्त नहीं होती है। दूसरा मुख्य जलवायु प्रदेश प्रायद्वीपीय भारत में पश्चिमी घाट के पूर्वी भाग में वृष्टि छाया प्रदेश में अवस्थित है जिसका मुख्य विस्तार कर्नाटक में है।
  5. BWhw – यह शुष्क उष्ण कटिबंधीय मरूस्थली (जर्मन शब्द Wurst = Desert मरूस्थल) जलवायु प्रदेश है, जहाँ का औसत वार्षिक तापमान 18 डीग्री सेंटीग्रेड से ऊपर होता है तथा शीतकाल शुष्क रहता है। वर्षा ग्रीष्मकाल में होती है। ऐसी जलवायु राजस्थान में थार के मरूस्थल में पायी जाती है, जिसका मुख्य विस्तार जैसलमेर, बाड़मेर व बीकानेर जिलों में है। यहाँ औसत वार्षिक वर्षा 20 सेमी. से कम ही प्राप्त होती है। यहाँ मरूद्भिद वनस्पति मिलती है। इस जलवायु प्रदेश में तापीय विलोमता के कारण भी वर्षा कम प्राप्त होती है।
  6. Cwg – यह उष्ण शीतोष्ण मुख्य जलवायु वर्ग का जलवायु प्रदेश है, जहाँ शीतकाल शुष्क (w) रहता है तथा वर्षाकाल से पूर्व लम्बे समय तक तापमान उच्च बना रहता है तथा लम्बी उष्ण अवधि के बाद ग्रीष्मकाल में वर्षा होती है। इस जलवायु प्रदेश का विस्तार पूर्वी राजस्थान से लेकर उ. पू. गुजरात मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, पंजाब, हरियाणा, बिहार, उत्तरी बंगाल, असम, नगालैण्ड, मेघालय तक है तथा मध्यवर्ती भाग में 100-200 सेमी. व पश्चिमी भाग में 40 से 100 सेमी. वर्षा प्राप्त होती है।
  7. Dfc – यह शीतशीतोष्ण वर्ग का मुख्य जलवायु प्रदेश (D) है जिसमें स्थिर आर्द्र ऋतु होती है तथा शुष्कतम माह में भी कम से कम 3 सेमी. वर्षा होती है। यहाँ उष्णतम माह का तापमान 22 डीग्री सेंटीग्रेड से नीचे लेकिन 1 से 3 माह 10 डीग्री सेंटीग्रेड से ऊपर रहता है। इस प्रकार कोई ऋतु शुष्क नहीं होती है। देश में ऐसी जलवायु सिक्किम, अरूणाचल प्रदेश व उत्तरी असम में पायी जाती है। यह हिमालय का उत्तरी पूर्वी भाग है।
  8. E – यह धु्रवीय प्रकार का मुख्य जलवायु प्रदेश है, जहाँ उष्णतम माह का तापमान 10 डीग्री सेंटीग्रेड से कम रहता है। भारत में ध्रुवीय जलवायु उच्चावचन के कारण पश्चिमी हिमालय में अवस्थित जम्मू कश्मीर, हिमाचल प्रदेश तथा उत्तराखंड में पायी जाती है। जम्मू एवं कश्मीर के पूर्वी भाग में शीत मरूस्थल-लद्दाख स्थित है, जहां 20 सेमी. से भी कम वर्षा होती है। शेष भाग में 20 से 60 सेमी. के मध्य वर्षा होती है। हिमाचल प्रदेश एवं उत्तराखंड में वर्षा 100 से 200 सेमी. तक भी होती है।
  9. ET – यह ध्रुवीय जलवायु प्रदेश का ही एक वर्ग (E) है, जिसे टुण्ड्रा जलवायु कहते हैं। यहाँ उष्णतम माह का तापमान 10 डीग्री सेंटीग्रेड से 0 डीग्री सेंटीग्रेड के मध्य रहता है। इसमें उत्तरी उत्तराखंड के पर्वतीय भाग सम्मिलित हैं।

इन वर्गों के अतिरिक्त H वर्ग भी पाया जाता है जिसे कोपेन ने उच्च भूमि वाली जलवायु के लिए प्रयुक्त किया है। भारत में ऐसी जलवायु हिमालय पर्वतीय क्षेत्र में काराकोरम श्रृंखला में पायी जाती है।

कोपेन का वर्गीकरण आनुभाविक आंकड़ों के आधार पर किया गया था। यद्यपि यह एक वैज्ञानिक वर्गीकरण था लेकिन फिर भी अनेक कमियाँ रह गईं। कोपेन ने तापमान, वर्षा तथा इनकी मौसमी प्रवृत्ति (Regime) व इनके वनस्पति के साथ अनुक्रिया पर ही अधिक बल दिया जबकि वायुदाब, पवनों, आर्द्रता आदि तत्वों को महत्व नहीं दिया। जलवायु के स्थानिक प्रतिरूप, ऊँचाई (Altitude) भूमि एवं जलीय वितरण आदि से नियंत्रित होते हैं जिसे भी कोपेन ने सम्मिलित नहीं किया। अत्यधिक अक्षरों के प्रयोग के कारण भी यह वर्गीकरण दुरूह हो गया है।

One Comment

  1. Prajput September 21, 2017 12:53 am Reply

    Leave your message..geography and you… Best

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