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चंद्रमा पर नाभिकीय ईंधन हीलियम-3 का पता लगाएगा चंद्रयान मिशन

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन अक्टूबर 2018 में चंद्रमा पर एक बार  फिर से एक मिशन भेजने की तैयारी कर रहा है। परंतु इस बार इसरो की योजना कुछ अलग है। इसरो का अद्यतन चंद्र मिशन चंद्रमा  के दक्षिणी हिस्सा के लिए है जहां आज तक किसी देश का मिशन नहीं पहुंच सका है। अपने इस मिशन के दौरान अंतरिक्षयान चंद्रमा के क्रस्ट के नमूना का अध्ययन करेगा कि उसमें जल एवं हीलियम-3 की (Helium-3) उपस्थिति का पता लगाया जा सके। ध्यातव्य है कि यह हीलियम-3 (दो प्रोटॉन एवं एक न्यूट्रॉन) समस्थानिक पृथ्वी पर सीमित है परंतु चंद्रमा पर पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है।

अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के अनुसार चंद्रमा का धरातल हीलियम-3 जैसे वोलेटाइल्स (Volatiles) से समृद्ध है। वोलेटाइल्स निम्न क्वथनांक वाले रासायनिक तत्व या रासायनिक कंपाउंड हैं। हाइड्रोजन, जल एवं कार्बन डाई ऑक्साइड इसी के तहत हैं और चंद्रमा पर ये पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। नासा के मुताबिक चंद्रमा पर जितने भी वोलेटाइल पदार्थ हैं उनमें हीलियम-3 ही ऐसा है जो पृथ्वी के लिए महत्वपूर्ण है। एक अनुमान के अनुसार चंद्रमा के रिगोलिथ (lunar regolith) में कम से कम 10 लाख टन का हीलियम-3 छिपा हुआ है। यदि नाभिकीय संलयन में ईंधन के रूप में इनका प्रयोग किया जाता है तो यह पूरे विश्व में विद्युत सृजन के लिए निर्यात का एक प्रमुख स्रोत होगा। यदि इसका उपयोग किया जाता है तो अगले 250 वर्षों तक पृथ्वी की ऊर्जा मांग की पूर्ति कर सकता है।

चंद्रमा पर सौर हवाओं ने भारी मात्रा में हीलियम-3 की बमबारी की है क्योंकि यह पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र की तरह संरक्षित नहीं है। चंद्रमा पर हीलियम-3 की उपस्थिति का प्रथम पता अपोलो मिशन एवं अपोलो-17 का यात्री हैरिसन शिमिट द्वारा वापस लाए गए चंद्र नमूनों से चला। हीलियम-3 संलयन संयंत्रों के लिए सुरक्षित ऊर्जा माना जा रहा है क्योंकि यह रेडियोएक्टिव नहीं है और इससे खतरनाक अपशिष्ट उत्पन्न की संभावना न्यून है।

यही कारण है कि इस ऊर्जा संसाधन के दोहन के प्रति अभी से ही विभिन्न देशों की अंतरिक्ष एजेंसियां सक्रिय हो गईं हैं। नासा का स्पेस  टेक्नोलॉजी रिसर्च फेलोशिप कार्यक्रम लूनर सोलर विंड वोलेटाइल्स एक्सट्रैक्शन सिस्टम की डिजाइन के लिए वित्त प्रदान कर रहा है। ऐसे में वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अपना प्रभाव छोड़ने वाला भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो कैसे पीछे रह सकता है। हालांकि चंद्रमा पर केवल हीलियम-3 के खनन से ही पृथ्वी पर ऊर्जा सृजन आरंभ नहीं हो जाएगा। इस क्रम में कई चुनौतियां एवं समस्याएं हैं। मसलन् चंद्रमा पर यदि इनका खनन आरंभ भी किया जाता है तो वापस पृथ्वी पर इसे कैसे लाया जाएगा? यदि इसे पृथ्वी पर किसी तरह ले आया भी जाता है तो पृथ्वी पर ऐसा कोई संलयन संयंत्र हैं भी जहां ईंधन उत्पादन में इनका उपयोग कर सके? इसरो के अध्यक्ष के.सिवन के अनुसार ‘जिन देशों के पास इस संसाधन को चंद्रमा से पृथ्वी पर लाने की क्षमता होगी वही इस प्रक्रिया पर राज करेगा। मैं केवल इस प्रक्रिया का हिस्सा नहीं बनना चाहता बल्कि नेतृत्व करना चाहता हूं।’ उनके कहने का मतलब यह है कि चंद्रमा से हीलियम-3 खनन तथा उसे पृथ्वी पर लाने में इसरो पिछलग्गू नहीं वरन्् अगुआ बनना चाहता है।

यही कारण है कि इसरो ने चंद्रमा के लिए व्यापक योजना बनाया है।  इसमें रोवर लैंडिंग से लेकर कक्षा में अंतरिक्ष स्टेशन की स्थापना और चंद्रमा पर भारतीय क्रू को भेजना शामिल है।

भारत का प्रस्तावित चंद्रयान-2 में ऑर्बिटर, लैंडर व आयाताकार रोवर शामिल है। छह पहिया वाला यह यान, जो कि सौर ऊर्जा चालित होगा,  14 दिनों तक सूचना संग्रह करेगा और इस बीच में 400 मीटर त्रिज्या को कवर करेगा। इसका प्राथमिक उद्देश्य हीलियम-3 निक्षेप का पता लगाना है।

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