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जल की आवश्यकता संसाधन संरक्षण से पूरी होगी

जल सुरक्षा नीतियों पर व्यापार एक वास्तविक प्रभाव डाल सकता है, समुदाय आधारित संगठनों के लिए संगठनात्मक और वित्तीय सहायता अभी भी मुख्यधारा नीति सुधार एजेण्डा का भाग नहीं है और मानव उपभोग के लिए पृथ्वी पर जल की आवश्यकता का स्तर अभी भी गूढ़ ही बना हुआ है। इसका अर्थ यह है कि विश्व व्यापार संगठन में इस पक्ष को मान्यता दी जाए ताकि व्यापार एजेण्डा में वास्तविक चर्चा की जा सके। सर्वसुलभ व्यापार जल संसाधनों का संरक्षण हो सकता है।

द्वितीय समुदाय आधारित संगठनों के लिए संगठनात्मक और वित्तीय सहायता अभी भी मुख्यधारा नीति सुधार एजेण्डा का भाग नहीं बन पाए हैं। नीतियों के लिए इसका स्थानीय, राष्ट्रीय और वैश्विक निहितार्थ हैं। मानव उपभोग के लिए जल की आवश्यकता का स्तर अभी भी गूढ़ बना हुआ है और इस पृथ्वी पर जल की आवश्यकता पूर्ति को संसाधनों का संरक्षण करने और बुनियादी जरूरतों की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है (एम.डी.जी.)।

वर्तमान में, भारत की विभिन्न कृषि जलवायु से जुड़ी व्यवस्थाओं को आगे बढ़ाने के लिए विभिन्न नीतियों में काफी व्यापक ऊर्जा है जिससे कि राष्ट्रीय व वैश्विक बाजारों में एक अधिक प्रतियोगी कृषि को आगे बढ़ाया जा सके। कृषि जलवायु से जुड़ी नीतियों का आधार संसाधन व्यवस्था और मृदा, जलवायु व जल की वहन क्षमता है इसलिए ये नीतियां व्यापार व विशेषीकरण को बढ़ावा देने वाली हैं। भारतीय किसानों ने अधिक खाद्यान्न उगाने की क्षमता को दर्शाया है। निर्धारित वितरण नीतियों के साथ विभिन्न व व्यापक कृषि से पैदा आय ने खाद्य सुरक्षा के उद्देश्यों को प्राप्त किया है।

दोहा घोषणा के 13 वें अनुच्छेद (डब्ल्यू. डी./एम.आई.एन. (01) डी.ई.सी./1) में कहा गया है हम इस बात पर सहमत हैं कि वार्ताओं के सभी तत्वों में विकासशील देशों को विशेष व विशिष्ट दर्जा दिया जाना एक आंतरिक भाग होगा और रियायतों व प्रतिबद्धताओं के अनुच्छेदों में इन्हें शामिल किया जाएगा। होने वाली वार्ता के लिए नियम व अनुशासन इस  तरह से उपयुक्त होने चाहिए कि प्रभावशाली ढंग से कार्य कर सकें और विकासशील देश अपनी विकास आवश्यकताओं जैसे खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण विकास का ध्यान रख सकें। सदस्यों द्वारा वार्ता के लिए प्रस्ताव जमा किए गए हैं। जिनमें गैर-व्यापार चिन्ताएं भी दिखाई देती हैं। हमने इस पर ध्यान दिया है और विश्वास दिलाते हैं कि गैर व्यापार चिन्ताओं को वार्ताओं में, कृषि के लिए समझौते के अनुसार, पूरा ध्यान रखा जाएगा।

समुदाय आधारित संगठन और पद्धतियां

प्रत्येक कृषि-जलवायु से जुड़ा क्षेत्र अपनी समस्याओं का समाधान भी रखता है, यह बात सबको पता है। यह कहना पर्याप्त होगा कि निर्धारित लक्ष्यों की ढांचागत परियोजनाएं, बढ़िया व्यवहार मामले, और नीतियां व विद्यमान खतरे जो पहले भी थे, से संबंधित ढांचागत योजनाएं निराशजनक रूप से केवल कागजों तक सीमित हैं। विकास की व्यवसायिक दृष्टिकोण से समीक्षा की गई है। ‘बिग-टिकट’ केन्द्रीय क्षेत्र योजनाएं स्थानीय स्तर पर उत्तरदायित्व व सशक्तीकरण के लिए पूर्व दशाओं के रूप में जानी जाती हैं (विस्तृत जानकारी के लिए देखें, वाई.के.अलघ, 2009, एफ.ए.ओ.)।

राज्य की कृषि से जुड़ी योजनाओं को जिलों (इस प्रारम्भिक) की योजनाओं पर आधारित होना चाहिए। इसकी अपनी योजना में विवेकशील संसाधनों और केन्द्र से उपलब्ध संसाधनों का समावेश होना चाहिए। राज्य की कृषि से जुड़ी प्रगति के लक्ष्यों को प्राप्त करना लक्ष्य होना चाहिए। इसमें प्राकृतिक संसाधनों का संपोषित प्रबन्धन और प्रत्येक कृषि-जलवायु से जुड़े क्षेत्र में (बल और पारासंकलन भी शामिल) होना चाहिए। इस प्रकार से इस योजना द्वारा प्रत्येक जिलों की अन्तिम संसाधन आच्छादन, उनकी उत्पादन योजना और सहयोगी आदान योजना का निर्धारण किया जाना चाहिए।

जहां तक कृषि से जुड़ी जलवायु उपागम में परियोजनाओं के लिए बैंकिंग वित्त की बात है, सन् 1990 में नाबार्ड ने जलवायु से जुड़ी योजनाओं के उपागम को अपनी ऋण देने की नीति में जोड़ा था, परन्तु इसका सही ढंग से प्रयोग नहीं हो पाया। इस उपागम को फिर से लागू किया गया। नाबार्ड का नया विचार ग्रामीण विकास की दिशा में उच्च स्तरीय है। अब नाबार्ड अपनी भूमिका में यह देखता है कि उसे वित्तीय उत्पादों के लिए फिर से वित्त का विकास करना है जो प्रत्येक क्षेत्र की कृषि से जुड़ी प्राथमिकताओं से मेल खा सके, और राज्य द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले वित्त को योजना के लिए छोड़ दिया जाए। यह एक अच्छा विचार है और इसका दूरगामी प्रभाव हो सकता है। डच कोओप रेबो के अलावा बहुत से निजी व विदेशी बैंक ग्रामीण ऋण उपलब्ध कराते हैं। उदाहरण के लिए कुछ राज्यों जैसे महाराष्ट्र ने इस दिशा में काफी कार्य किया है। इसने पृथ्वी पर जल की आवश्यकता पूर्ति हेतु जल भण्डारण विकास, पहाड़ी नालियों, पेड़ की फसलों के लिए बीज यहां तक कि महंगे बीज जैसे बी.टी, बागवानी हेतु वृक्ष विकास चक्र के लिए, ड्रिप सिंचाई व्यवस्था  के लिए आसानी से ऋण उपलब्ध कराने की योजना बनाया है। नई आवश्यकताएं भी जोड़ी जा सकती हैं जैसे पशुचारे के लिए फसलें, नई जल प्रबन्धन तकनीक के लिए पैसा, कृषि तालाबों व ड्रिप्स का समावेश, पाइप डिलीवरी सिस्टम, सावयव को प्रमाणित करना, एकत्रित गंदगी को मिट्टी से निकालने के लिए प्रारम्भिक खर्च वहन करना और इसी तरह अन्य कार्यक्रम हैं। बहुत से राज्यों में सामान्य उदाहरण इनके विपरीत हैं। कम्पनी अधिनियम में जो उत्पादक समूह आते हैं उन्हें कार्यशील पूंजी नहीं दी जाती है क्योंकि सहकारी संस्थाओं के लिए ही ये कानून हैं।

मानव उपभोग के लिए जल

अगर मांग पक्ष की ओर देखें, उद्योग कृषि के लिए पृथ्वी पर जल की आवश्यकता का अनुमान लगाने की तकनीकें जग जाहिर हैं और ये मांग व पूर्ति आंकड़ों से जुड़ी हुई हैं। व्यक्तिगत उपभोग के लिए पृथ्वी पर जल की आवश्यकता के बारे में स्पष्टता काफी कम है। घरेलू उपयोग के लिए ताजे जल की आवश्यकता में इसका प्रयोग तुलनात्मक रूप से कम मगर कल्याणकारी दृष्टि से महत्वपूर्ण है और यह एक मूलभूत आवश्यकता के रुप में जाना जाता है। डब्ल्यू. आर. आई. के अनुसार वैश्विक स्तर पर कृषि के लिए 69 प्रतिशत, उद्योग के लिए 23 प्रतिशत और घरेलू उपयोग के लिए 8 प्रतिशत जल का प्रयोग किया जाता है (डब्ल्यू. आर.आई. 1998)।

क्षेत्रीय भिन्नताएं भी हैं, और विकसित देशों में उद्योग में इस जल की सबसे अधिक खपत है। शिकलोमानोव के अनुसार 1995 में 350 क्यूसिक किलोमीटर ताजे जल का प्रयोग घरेलू उपयोग में किया गया। अफ्रीका में प्रतिदिन मात्र 47 लीटर, यू.के. में 334 लीटर और अमेरिका में 578 लीटर उपभोग था। पीटर गिलीक ने पीने के लिए जल व साफ सफाई के लिए जल की आवश्यकता में उपलब्धता को 20 से 40 लीटर प्रतिदिन माना है और अगर नहाना व रसोई कार्य को शामिल करें तो यह 27 से 200 लीटर के बीच है। गिलीक ने पीने के लिए, नहाने के, साफ-सफाई के और रसोई कार्य के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 50 लीटर’’ पृथ्वी पर जल की आवश्यकता को अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर माना है। उनके अनुसार 1990 में 55 देशों के एक बिलियन लोगों को यह सुविधा उपलब्ध नहीं थी। मालिन फाकेनमार्क ने विकासशील देशों में व्यक्तिगत प्रयोग के लिए प्रतिदिन 100 लीटर की बात कही है। हालांकि इन अनुमानों में कोई सर्वमान्य राय नहीं है। यह दिखाया गया है कि मूलभूत जरूरत के लिए पृथ्वी पर जल की आवश्यकता न्यूनतम प्रतिवर्ष 400 से 2000 क्यूमिट प्रति व्यक्ति उपभोग है, ऐसे विचार बहुत से विशेषज्ञों के है। स्पष्ट है कि इस क्षेत्र में अधिक कार्य करने की आवश्यकता है।

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