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जल मार्ग आकृतिक विज्ञान से जलधारा का ज्ञान होना

‘जल मार्ग’ अंग्रेजी शब्द ‘चैनल’ का हिन्दी रूपान्तरण है जिसका तात्पर्य यह है कि किसी प्राकृतिक जल स्रोत का वह भाग जहाँ से परिवहन का कार्य सम्पादित होता हो। लेकिन जल मार्ग का व्यवहारिक सम्बन्ध नदी मार्ग से है। वस्तुतः नदी का सर्वाधिक गहरा भाग जिससे होकर नदी की मुख्य धारा प्रवाहित होती है उसे चैनल अथवा जल मार्ग कहा जाता है।

जल मार्ग आकृतिक विज्ञान, जिसे नदी मार्ग आकृति विज्ञान भी कहा जाता है, यह विज्ञान की वह शाखा है जिसके अन्तर्गत नदी मार्ग के उद्गम, उसके क्रमिक विकास, आकृति तथा वितरण के वर्गीकरण का विश्लेषण किया जाता है। अर्थात् इसके अंतर्गत नदी धारा की आकृतिए धारा की लम्बाईए चौड़ाईए गहराईए ढ़ाल तथा विसर्प जैसी आकृतियों का अध्ययन किया जाता है। वस्तुतः जल मार्ग आकृतिक विज्ञान में निम्नलिखित अवयवों का एक क्रमबद्ध अध्ययन प्रस्तुत किया जाता है। जैसे.

  • जल मार्ग ज्यामिति।
  • द्रवीय ज्यामिति।
  • जलधारा तली आकृति।
  • जलधारा के प्रकार।
  • जलमार्ग प्रतिरूप।

जलधारा या जल  मार्ग ज्यामिति का सम्बन्ध जल  मार्ग के अनुप्रस्थ एवं अनुदैर्ध्य स्वरूप के विस्तार से हैए जिसके अन्तर्गत जल  मार्ग की लम्बाई, चौड़ाई, गहराई, भीगी परिमिति, जल मार्ग ढाल, जल  मार्ग तली तथा जल  मार्ग की मध्य धारा या घाटी रेखा (थाल  वेग) की आकृति की विशेषताओं तथा अंतर सम्बन्धों का अध्ययन किया जाता है।

वस्तुतः जल  मार्ग का स्वरूप त्रिविमिय होता है, जिसके अन्तर्गत नदी के ढालए अनुप्रस्थ खण्ड तथा प्रतिरूप को सम्मिलित किया जाता है। संरचनात्मक प्रकृति के आधार पर जल  मार्ग को दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम-आधार शैली वाली जलधारा, द्वितीय-जलोढ़ जलधारा।

यदि नदी कठोर शैल आधार से प्रवाहित हो रही है तो उसे आधार शैली जलधारा कहा जाता है वहीं यदि जलोढ़ क्षेत्र से प्रवाहित हो रही हो तो उसे जलोढ़ जलधारा कहा जाता है। नदी अपने उद्गम से लेकर सागर में मिलने तक अनेक स्वरूपों से गुजरती है। उद्गम से मुहाने तक अधिकतम् गहराई वाले बिन्दुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को मध्य रेखा या थाल वेग घाटी रेखा कहते हैं। अर्थात् यह रेखा उद्गम से जल के निम्न बिन्दुओं को प्रवाह की दिशा में मुहाने से मिलाती है। वहीं उद्गम से मुहाने तक विस्तृत मध्य बिन्दुओं को मिलाने वाली काल्पनिक रेखा को जलधारा की लम्बाई कहते हैं। सैद्धान्तिक निरूपित जल  मार्ग से वास्तविक जलमार्ग के विचलन को सरिता वक्रता कहते हैं, और सरिता के मोड़ के शीर्ष तथा जल  मार्ग के आर-पार के दो मध्य बिन्दुओं से खींचे गये वृत्त के अर्द्धव्यास को ष्वक्रता का अर्द्धव्यासष् की संज्ञा दी जाती है।

जल  मार्ग में जल की उपलब्धता के आधार पर नदियों को दो भागों में विभाजित किया जाता हैः

  • चिरस्थायी नदियां या इफ्लूएण्ट
  • मौसमी नदियां या इनफ्लूएण्ट

जिन नदियों में वर्षभर जल का प्रवाह होता रहता है उन्हें इफ्लूएण्ट सरिता कहा जाता है, ऐसी सरितायें आर्द्र प्रदेशों में प्रवाहित होती हैं। वहीं जिन नदियों में केवल वर्षा के समय जल प्रवाहित होता है, उन्हें मौसमी या इनफ्लूएण्ट सरिता कहा जाता है।

उद्गम से मुहाने तक नदियां दो प्रकार की परिच्छेदिकाओं का निर्माण करती हैं-अनुदैर्ध्य परिच्छेदिका तथा अनुप्रस्थ परिच्छेदिका। उद्गम से मुहाने तक नदी की जलधारा की आकृति को अनुदैर्ध्य परिच्छेदिका कहा जाता है। जबकि एक तट से दूसरे तट की नदी घाटी को मिलाने वाली जलधारा को अनुप्रस्थ परिच्छेदिका की संज्ञा दी जाती है। यह प्रत्येक स्थान पर परिवर्तनशील होती है।

जलीय ज्यामिति या द्रवीय ज्यामिति का सम्बन्ध सरिता में जल विसर्जन, जलवेग, जलधारा ढाल, अवसाद भार, जलधारा की चौड़ाई, गहराई  तथा उसकी आकृति इत्यादि के अन्तर्सम्बन्धों के विश्लेषण से है। ये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जलधारा मार्ग को प्रभावित करते हैं जिससे जलधारा की आकृति में परिवर्तन होता रहता है। जैसे-यदि नदी का ढाल अधिक है तो इसका वेग अत्यधिक होगा और इसकी परिवहन क्षमता अधिक होगी तथा लम्बवत् अपरदन के कारण घाटी की चौड़ाई कम होगी। वहीं दूसरी ओर यदि ढाल कम है तो नदी का वेग कम हो जायेगा। फलतः अवसाद जमा होने लगेगी और पार्श्वीय अपरदन के कारण नदी घाटी चौड़ी होने लगेगी।

जल  मार्ग की तली में विभिन्नात्मक अपरदन तथा अवसाद जमा होने के कारण अनेक प्रकार की स्थलाकृतियाa निर्मित होती हैं। जैसे कुण्ड, अवनालिका, रेत रोधिका, रेत-द्वीप इत्यादि। उपरोक्त स्थलाकृतियों में कुण्ड को छोड़कर अन्य स्थलाकृतियाa निक्षेप जनित होती हैं। यदि जल  मार्ग सीधा होता है, तो स्थलाकृतियों का विकास नहीं होता है। लेकिन जैसे ही जल  मार्ग में विसर्प की प्रक्रिया शुरू होती जाती है, वैसे ही स्थलाकृतियों का विकास होने लगता है।

जिस क्षेत्र विशेष से नदी प्रवाहित होती है, संरचनात्मक विभिन्नता के कारण वह कई प्रकार के मार्ग अनुसरण करती है। चट्टानों की विशेषता के आधार पर सरिता मार्ग को दो वर्गों में विभाजित किया जाता है।

प्रथम – आधार शैल जलधारा।

द्वितीय – जलोढ़ जलधारा।

प्रथम को अपरदनात्मक जलधारा भी कहा जाता है क्योंकि इन प्रदेशों में नदियां सामान्यतः तीव्र कटाव के द्वारा अपरदनात्मक क्रियाओं को सम्पादित करती हैं। अपरदन के फलस्वरूप इन क्षेत्रों में अंग्रेजी अक्षर V आकार की घाटी, गॉर्ज, कैनियन, जलप्रपात, क्षिप्रिका, अवनमन कुण्ड इत्यादि का निर्माण करती हैa। जैसे सिन्धुए सतलजए तिस्ता तथा ब्रह्मपुत्र हिमालयी क्षेत्रों में इस प्रकार के स्वरूप को प्रस्तुत करती हैं। सिन्धु विश्व के सबसे गहरे गॉर्ज का निर्माण करती है, वहीं संयुक्त राज्य अमेरिका में कोलोरैडो नदी प्रसिद्ध ‘ग्राण्ड-कैनियन’ का निर्माण करती है।

द्वितीय को निक्षेपणात्मक जलधारा कहा जाता है। वस्तुतः नदियां ढाल की कमी के कारण विभिन्न प्रकार के निक्षेप जमा करने लगती हैं। जिसके फलस्वरूप अनेक प्रकार की स्थलाकृतियों का उद्भव एवं विकास होता है जैसे बाढ़ कृत मैदानए प्राकृतिक कटिबंध तथा डेल्टा इत्यादि।

अन्ततः जलधारा प्रतिरूप के अन्तर्गत जलोढ़ जल धाराओं का अध्ययन किया जाता है। सामान्यतः जलधारा का प्रतिरूप सीधा विसर्पित या गुम्फित रूप में प्रस्तुत किया जाता है। लेकिन अनेक भू.आकृति वैज्ञानिकों ने अनेक वर्गीकरण प्रस्तुत किये, परन्तु इनमें समरूपता का अभाव है। निष्कर्षतः जल धाराओं को सर्वमान्य अवधारणा के आधार पर पाँच वर्गों में विभाजित किया गया हैः-

  • सीधी जलधारा प्रतिरूप।
  • विसर्पित जलधारा प्रतिरूप।
  • गुम्फित जलधारा प्रतिरूप।
  • शाखा जालित जलधारा प्रतिरूप।
  • प्रत्यागत जलधारा प्रतिरूप।

सीधी जलधारा प्रतिरूप का अस्तित्व प्रकृति में शायद ही सम्भव है। क्योंकि नदी जलधारा में विचलन सतत् रूप से होता रहता है लेकिन विद्वानों का मानना है कि यदि वक्रता सूचकांक 1.05 से कम है तो  जलधारा सीधी होगी। वहीं सूचकांक 1.05-1.5 के मध्य है तो धारा वक्र हो जायेगी जिसे वक्रामा जलधारा की संज्ञा दी जाती है।

यदि वक्रता सूचकांक 1.5 से अधिक है तो उसे विसर्पित जलधारा कहा जायेगा। इस अवस्था में कुण्ड तथा रिफल का निर्माण होता है। रेत अवरोधिका तथा रेत द्वीपों का विकास यदि जलधारा मध्य में हो जाता है तो जलधारा कई उपशाखाओं में विभाजित हो जाती है। इसे गुम्फि जलधारा कहते हैं। गुम्फित जलधारा के लिए जलधारा वेग में कमी, परिवहन क्षमता में कमी तथा जल विसर्जन में परिवर्तन मुख्य रूप से उत्तरदायी माना जाता है। इस प्रकार की जलधाराएँ डेल्टा प्रदेशों में देखी जाती हैं। यदि गुम्फित जलधारा का विशिष्टीकरण हो जाता है तो उसे शाखा जालित प्रतिरूप कहते हैं। वस्तुतः गुम्फित जलधारा मार्ग में परिवर्तन होता रहता है जबकि शाखा जालित प्रतिरूप जलधारा के मार्ग में अपने अस्तित्व को बनाये रखते हैं। वहीं मुख्य जलधारा से निकली शाखाएँ कुछ दूरी तय करने के बाद मुख्य धारा में मिलती हैंए तो उन्हें प्रत्यागत जलधारा कहा जाता है।

जल  मार्ग आकृतिक विज्ञान के अध्ययन की सहायता से भू.सतह पर बहिर्जात बल नदी के विभिन्न स्वरूप एवं प्रकृति के साथ.साथ अनेक प्रकार की स्थलाकृतियों के उद्भव एवं विकास का अध्ययन किया जा सकता है।

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