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जैव विविधता में महत्वपूर्ण हैं मूंगे की चट्टानें

मूंगे की चट्टानें उष्ण कटिबन्ध में पायी जाने वाली सबसे जटिल और रंग-बिरंगी पारिस्थितिकीय प्रणाली है। जहाँ तक जीव-जन्तुओं की उपस्थिति का सवाल है इनमें जैसी जैव विविधता पायी जाती है वैसी वर्षा वनों के अलावा और कहीं देखने को नहीं मिलती। मूंगे की चट्टानें में पाये जाने वाले जीवधारी ऐसी विशाल और जटिल भौतिक संरचनाओं का निर्माण करते हैं जिनमें दुनिया के बेहद आकर्षक पेड़-पौधे और जीव निवास करते हैं। मूंगे की चट्टानें की पारिस्थितिकीय प्रणाली उत्पादकता की दृष्टि से भी अत्यन्त समृद्ध और विविधता लिये हुए होती है। मूंगे की चट्टानें का निर्माण करने वाले जीव लगातार नई-नई संरचनाएं बनाते रहते हैं और इन संरचनाओं में जीव-जन्तुओं की अनगिनत प्रजातियां एक-दूसरे के साथ रहती हैं।

प्रवाल अथवा मूंगा एक प्रकार का सूक्ष्म कीड़ा होता है जो लाल,पीले, हरे, बैंगनी तथा सफेद रंगों में पाया जाता है। प्राणी विज्ञान के अनुसार प्रवाल एक मांसल जीव है जो मधुमक्खी की भाँति छत्ता बनाकर विकसित होता है। ये जीव प्रायः समूह में रहते हैं तथा अपने चारों ओर चूने के खोल बनाते हैं जो सुरक्षा कवच की भांति होते हैं। जब कोई मूंगा मर जाता है तो उसके ऊपर दूसरा मूंगा अपना खोल बनाने लग जाता है। इस क्रिया के कारण एक लम्बे समय के अन्दर एक विस्तृत भित्ती बन जाती है, जिसे प्रवाल भित्ती कहते हैं। ये जीव जल के बाहर जीवित नहीं रह सकते। मृत प्रवालों के जीवावशेषों में चूने व डोलोमाइट की प्रधानता होती है। प्रवाल स्थलाकृतियों के निर्माण में फैरामिनीफैरा, मोलस्का, नलीपोर, शैवाल, इकिनोडर्म आदि कैल्शियम जीवों का भी सहयोग होता है। ये जीव प्रवाल स्थलाकृतियों को अधिक कठोर बनाने में योगदान देते हैं।

यह जीव मूंगा नाइडेरिया वर्ग के अन्तर्गत आता है। इस वर्ग के अन्य जीवों में हाइड्रा, जेलीफिश और इसी तरह के अन्य समुद्री जीव शामिल हैं। ये जीव गतिहीन प्राणी हैं जो पेड़ों की तरह जीवन भर एक ही स्थान पर रहते हैं। ये अपने स्पर्शकों से छोटी-छोटी मछलियां और प्लैंक्टन जैसे जीवों को पकड़कर खाते हैं। मूंगे बड़ी-बड़ी बस्तियों में समूह में रहते हैं जिनमें से प्रत्येक प्राणी को पोलिप कहते हैं। इस जीव को जब भी किसी परभक्षी जीव से खतरे की आशंका होती है तो वे मूंगे के आवरण के भीतर घुस जाते हैं। मूंगे की चट्टानें धरती में कुल उत्पादकता की दृष्टि से सबसे ऊँचे स्तर के लिये जानी जाती है। मूंगे की शुद्ध प्राथमिक उत्पादकता प्रति वर्ग मीटर हर साल करीब 2500 ग्राम कार्बन उत्पन्न करने की है। इसके मुकाबले उष्णकटिबन्धीय वर्षा वन हर साल प्रति वर्ग मीटर करीब 2200 ग्राम कार्बन का उत्पादन करते हैं और खुले समुद्र में प्रतिवर्ग मीटर सिर्फ 125 ग्राम कार्बन का उत्पादन होता है।

मूंगे की चट्टानों का वितरण

मूंगे की चट्टानें महासागरों में दूर-दूर तक फैली हुई हैं। इण्डोनेशिया में सबसे बड़ी मूंगे की चट्टान पायी जाती है, जिसका कुल क्षेत्रफल 51020 वर्ग कि.मी. है। इसके बाद आस्ट्रेलिया, फिलिपीन्स और पापुआ न्यू गिनी पर पाई जाती है। उष्ण कटिबन्धीय क्षेत्रों में प्रवालों की उत्पत्ति की उत्तम दशा होने के कारण प्रशान्त, हिन्द एवं अटलांटिक महासागरों में 25 अंश उत्तर व 25 अंश दक्षिणी अक्षांशां के मध्य पायी जाती हैं। विषुवतरेखीय क्षेत्रों में उच्च तापमान चूने की कमी एवं वर्षा की अधिकता के कारण मूंगे की चट्टानें नहीं पायी जाती हैं। 20 अंश – 30 अंश उत्तर व दक्षिण अक्षांशां के मध्य किसी समय मूंगे की चट्टानें उपस्थिति थीं परन्तु प्लीस्टोसीन हिमयुग में समुद्र की सतह नीची हो जाने के कारण अधिकांश प्रवाल मर गये तथा ये चट्टानें नष्ट हो गईं। भारत में 5790 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में मूंगे की चट्टानें हैं जो कि दुनिया में मूंगे की चट्टानों के कुल क्षेत्रफल का 2.04 प्रतिशत है। भारत में मूंगे की चट्टानों को निम्नलिखित क्षेत्रों में बांटा गया है :

  1. कच्छ की खाड़ी : यहाँ की मूंगे की चट्टानें सीमान्त किस्म की हैं और द्वीपों की श्रृंखला के किनारे-किनारे उत्तर में जोधिया से लेकर दक्षिण में ओखा बन्दरगाह तक पायी जाती हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में धुर उत्तर की मूंगे की चट्टाने यहीं है। पर्यावरण सम्बन्धी कठिन वातावरण के कारण यहाँ चट्टाने कम विकसित हो पायी है तथा जैव विविधता भी कम पायी जाती है। कच्छ की खाड़ी उच्च औद्योगिक विकास का क्षेत्र भी है जिस कारण हाल के वर्षो में यहाँ मूंगे की चट्टानें नष्ट हो रही हैं।
  2. लक्षद्वीप : यहाँ मूंगे की चट्टानें की 10 श्रृंखलाएं हैं और 36 द्वीप हैं। जिनमें से 10 पर लोग निवास करते हैं। इनका क्षेत्रफल 30 से 300 वर्ग कि.मी. है। जिन द्विपों पर लोग निवास नहीं करते वहाँ मूंगे की चट्टानें आमतौर पर अच्छी हालत में है।
  3. मन्नार की खाड़ी : यहाँ उत्तर में रामेश्वरम् से दक्षिण में तुतीकोरिन तक के 20 द्वीपों के किनारे-किनारे मूंगे की चट्टानें पायी जाती हैं।
  4. अण्डमान निकोबार द्वीप समूह : बंगाल की खाड़ी में स्थित इस क्षेत्र में लगभग 500 द्वीप हैं तथा सभी के किनारे मूंगे की चट्टाने स्थित हैं। इनमें से निकोबार की मूंगे की चट्टानें अच्छी हालत में है।
  5. अन्य चट्टानें : पश्चिमी तट पर महाद्वीपीय मग्न तट वाले क्षेत्र में ज्वार भाटे वाले स्थानों पर मूंगे की चट्टानें छोटी-छोटी संरचनाओं के रूप में पायर जाती हैं। यहाँ मूंगे की कुछ खास प्रजातियां भी पायी जाती हैं। भारत में मूंगे की करीब 260 प्रजातियां पायी जाती हैं।

मूंगे की चट्टानों का महत्व

मूंगे की चट्टानों वाले क्षेत्रों का पर्याप्त महत्व है। इन पर नारियल के वृक्ष काफी मात्रा में पाये जाते हैं। इसके अलावा सागरीय जीवों की पर्याप्त विविधता मिलती है। इनके अलावा इन चट्टानों का महत्व निम्न प्रकार से है :

  1. भोजन एवं आमदनी का स्रोत : मूंगे की चट्टानें दुनिया में लाखों लोगों की रोजी-रोटी का जरिया हैं इनसे पर्यटन, मछली पकड़ने एवं समुद्री मनोरंजन आदि के लिए लोगों को रोजगार और आमदनी के अवसर उपलब्ध होते हैं। अतः इनका पर्यटन की दृष्टि से पर्याप्त महत्व है।
  2. चिकित्सा में उपयोग : मूंगे से न केवल जीवन मिलता है बल्कि ये जीवन रक्षा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। वैज्ञानिकों ने एड्स तथा कैंसर जैसी बीमारियों के उपचार के लिए उपयोग में लाये जाने वाले रसायनों को मूंगे की चट्टानों से ही प्राप्त किया है जिस कारण इनका चिकित्सा सम्बन्धी अनुसंधान कार्य में भी पर्याप्त महत्व है।
  3. मछलियों के प्रजनन के स्थान : मूंगे की चट्टानें मछलियों की नर्सरी कही जा सकती हैं क्योंकि इनमें व्यापारिक दृष्टि से महत्वपूर्ण मछलियों को आश्रय मिलता है तथा यहीं से मछलियों का सर्वाधिक उत्पादन होता है।
  4. समुद्री लहरों से बचाव : मूंगे की चट्टानें नाजुक समुद्र तटों को समुद्री लहरों के थपेड़ों से तथा तूफानों से बचाती है। समुद्र में स्थित इन चट्टानों को ढक देते हैं फलस्वरूप इन अवसादों के जमाव के कारण सूर्य प्रकाश नहीं मिलने से ये चट्टाने नष्ट हो जाती है।

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