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तटवर्ती भूमि पर समुद्री जल वृद्धि से पड़ने वाले प्रभाव

खुले समुद्र में या भूमि के ऊपर उत्पन्न होने वाली प्रक्रियाओं से तटरेखा प्रभावित होती है। तटरेखा पर जलवायु संबंधी प्रभावों के दृष्टिगतए निम्नलिखित स्थितियां बड़ी ही चिंताजनक हैं :

  • महासागरों के तापमान बढ़ने तथा हिमनदों के पिघलने के कारण दीर्घावधि तक समुद्र के जलस्तर में वृद्धि होना। इससे जल प्लावन तो होगा ही जिससे तटवर्ती भूमि और संपत्ति को नुकसान पहुंचेगा तथा लोगों का विस्थापन होगाए इसके अलावा अन्य प्रभाव भी होंगे जैसे कि भूजल में लवण प्रवेश कर जाएगा और तटवर्ती समुद्री पारिस्थितिकी प्रणालियां प्रभावित होंगी।
  • वायुमण्डल में कार्बन-डाइऑक्साइड का घनत्व बढ़ने से महासागरों का अम्लीकरण होगा (पीएच मान में कमी आएगी) जिससे प्रवालों और अन्य समुद्री अवयवों पर दबाव पड़ेगा।
  • समुद्री पर्यावरण में सतही जल का तापमान बढ़ने से प्रवाल विरेचन और उनके विनाश होने की संभावना बढ़ जाएगी विशेषकर तब, जब पृथ्वी का तापमान भी बढ़ने लगेगा।
  • तूफानी लहर उठने की बारम्बारता में वृद्धि होने (तूफान के प्रभाव के कारण जलस्तर बढ़ने से) से चक्रवातों जैसी घटना प्रवण क्षेत्रों में जान और माल का अधिक नुकसान होगा।
  • खुले समुद्र में तूफानों की बारम्बारता में वृद्धि होने से महासागरों की सतह पर व्याप्त लहरों का स्वरूप बदल जाएगा और उसमें अधिक ऊर्जा का समावेश होगा। जब लहरें तटवर्ती भूमि से टकरायेंगी तो क्षरण के और तटरेखा के पास गाद जमा होने के सामान्य पैटर्न में बदलाव आएगा और इस प्रकार तटरेखा की सीधाई में फर्क आ जाएगा।
  • ऐसी संभावना है कि पृथ्वी का तापमान बढ़ने के कारण होने वाले परिवर्तनों से समुद्री सतह के पर्यावरण के समीप अवांछनीय अतिसूक्ष्म पादपों (फाइटोप्लैंक्टन) का उज्जीवन होगा और इस प्रकार मत्स्ययन सहित स्थानीय पारिस्थितिकी प्रणाली बाधित होगी।
  • मीठे जल के प्रवाह में अत्यधिक वृद्धि या अत्यधिक कमी से तटवर्ती भूमि पर दबाव पड़ता है (इससे मीठे जल संसाधन कम हो जाते हैं)। तीव्र अवक्षेपण होने की स्थिति में नदियों से जल के प्रवाह में अचानक तेजी आ सकती है जिससे तटवर्ती भूमि का कटाव हो सकता है तथा वह जलमग्न हो सकती है और जान-माल का विनाश हो सकता है। हिमनदों के पिघलने के कारण नदियों के जलप्रवाह के पैटर्न में आने वाले परिवर्तनों से तटवर्ती भूमि में रहने वाली जनसंख्या जो मीठे जल की आपूर्ति के लिए उस जल प्रवाह पर आश्रित होती है, उस पर दबाव बढ़ जाएगा। इस प्रकार के परिवर्तन आने की संभावना है क्योंकि हिमनद पिघल रही है। (हिमालय उदाहरण हैए इस प्रकार गंगा तथा ब्रह्मपुत्र जैसी बड़ी नदियों के माध्यम से मिलने वाले मीठे जल के प्रवाह पर दुष्प्रभाव पड़ेगा)।

पश्चिम बंगाल के सुंदरबन से लेकर गुजरात के कच्छ के रन तक भारतीय मुख्य भूमि तटरेखा की कुल लम्बाई 5700 किमी है। यदि लक्षद्वीप मिनिकॉय और अंडमान निकोबार द्वीप समूह को शामिल कर लिया जाएए तो यह आंकड़ा 7510 किमी बैठेगा।

भारत के समुद्री संसाधन हिन्द महासागर, अरब सागर और बंगाल की खाड़ी तक फैले हुए हैं। देश के अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) का क्षेत्रफल 2.02 मिलियन वर्ग किमी है जिसमें पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र में 0.86 मिलियन वर्ग किमीए पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र में 0.56 मिलियन वर्ग किमी और अंडमान तथा निकोबार द्वीपसमूह में लगभग 0.6 मिलियन वर्ग किमी का क्षेत्र शामिल है। पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र में कृषि और जल कृषि जैसे गतिविधियों को समर्थन मिलता है जबकि पश्चिमी तटवर्ती क्षेत्र में बहुत सारे उद्योग संचालित होते हैं। गोवा, केरल और उड़ीसा जैसे तटवर्ती राज्यों में पर्यटन मुख्य आर्थिक गतिविधि के रूप में उभरकर सामने आया है।

समुद्री जलस्तर में अनुमानित वृद्धि होने से निचले क्षेत्रों, दलदली तटवर्ती भूमि और आर्द्रभूमि जलमग्न हो सकती हैं और तटों का कटाव हो सकता है तथा नदियों, खाड़ियों और जलक्षेत्रों में बाढ़ आ सकती है तथा खारापन बढ़ सकता है। तटवर्ती क्षेत्रों जिन पर अधिकतर खतरा मौजूद है, में लक्षद्वीप मिनीकॉय और अंडमान निकोबार का सम्पूर्ण तटवर्ती क्षेत्र तथा निचला क्षेत्र शामिल है। इस बात की संभावना है कि महासागरों के विस्तार तथा हिमनदों के पिघलने से बंगाल उड़ीसा क्षेत्र तथा गुजरात रन क्षेत्र की निचली भूमि जलमग्न हो जाए और इसके परिणामस्वरूप सागर भूमि का अतिक्रमण कर ले। फसलों और मैंग्रोव वाला यह वृहत क्षेत्र जो अपने आप में अद्वितीय हैए जलमग्न हो सकता है। तटवर्ती अवसंरचना को क्षति पहुंचाने के अलावाए समुद्री जल के आ जाने से मीठे  जल की आपूर्ति को नुकसान पहुंच सकता है।

समुद्री जलस्तर में एक मीटर की वृद्धि होने से भारत में लगभग 7.1 मिलियन लोग विस्थापित हो जाएंगे तथा लगभग 5,764 वर्ग किमी तटवर्ती भूमि क्षेत्र और साथ ही 4,200 किमी सड़क बर्बाद हो जाएंगे।

इन प्रत्यक्ष प्रभावों के अलावाए गंगाए ब्रह्मपुत्र और सिंधु नदियों के प्रमुख डेल्टा क्षेत्रों जिनकी जनसंख्या का बड़ा भाग नदियों के संसाधनों पर निर्भर है, जल क्षेत्रों में परिवर्तनए खारे जल के प्रवेश और भूमि का क्षय होने से प्रभावित  होगा।

अनुमान लगाया गया है कि –  

  • तटवर्ती भूमि क्षेत्रों पर जलवायु परिवर्तन तथा समुद्री तल में परिवर्तन के कारण तटीय क्षरण जैसे जोखिम बढेंगे।
  • समुद्री सतह के तापमान में 1 से 3 सेंटीग्रेड तापमान की वृद्धि होगी।
  • वर्ष 2080 तक समुद्र तल में वृद्धि होने से प्रतिवर्ष कई लाख और अधिक लोग बाढ़ग्रस्त होंगे।
  • सन् 2100 ईस्वी तक समुद्र तल में 3ण्5 से 34.6 इंच की वृद्धि होगी जिससे भू-जल और अधिक खारा हो जाएगाए आर्द्र भूमि पर खतरा आ जाएगा और बहुमूल्य भूमि तथा तटवर्ती भूमि क्षेत्रों में रहने वाले समुदाय जलमग्न हो जाएंगे।
  • समुद्री जल के अतिक्रमण से खारे जल में मछली पालन के बढ़ने की संभावना हैए लेकिन तटवर्ती क्षेत्र के जलमग्न हो जाने से जलकृषि उद्योग के विनाश होने का खतरा मौजूद है।
  • इस सदी के अन्त तक प्रतिवर्ष समुद्री तल में वृद्धि होने से आने वाली बाढ़ से कई लाख लोगों के प्रभावित होने की संभावना है। बड़ी एशियाई नदियों (गंगा-ब्रह्मपुत्र जैसी) के आस पास छोटे-छोटे द्वीपसमूहों और भीड़-भाड़ वाले डेल्टा क्षेत्र को सर्वाधिक जोखिम का सामना करना पड़ेगा। आईपीसीसी ने भारत के तटवर्ती क्षेत्रों में 4 डेल्टाओं की पहचान की है जिन पर विशेष तौर पर खतरा मौजूद है : गंगा-ब्रह्मपुत्र (अत्यधिक खतरा), गोदावरी (काफी खतरा), कृष्णा और महानदी (दोनों में मध्यम स्तर का खतरा) मौजूद है।

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