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तट रेखा प्रबंधन तथा मानचित्रण कार्य का निर्धारण

केरल के निकट तट रेखा प्रबंधन योजना

प्राकृतिक विषम स्थितियों के कारण और तट  रेखा के साथ.साथ मानव द्वारा बनाई गई संरचनाओं से तटीय प्रक्रियाओं में परिवर्तन होने के कारण केरल के तटीय क्षेत्रों में अत्यधिक भू-कटाव हो रहा है।

भू-कटाव के प्रेरक कारणों को समझने के लिए मुथलापोजी ज्वारीय मुहाने के किनारे के तटीय आकृति विज्ञानए पारिप्रणालियों और प्रक्रियाओं का अध्ययन किया गया। मुथलापोजी के दक्षिण में सेंट एण्ड्रयूज/थुम्बा से उत्तर में नेदुनगंडा/काइकारा तक 15 किमीण् लम्बी तटीय पट्टी के किनारे द्रव गतिक और तलछट विज्ञानी डेटा एकत्र करने के लिए क्षेत्र मापन किए गए। तट के निकट बाथीमीट्रिक सर्वेक्षण (थुम्बा नेदुनगंडा तट तक) का कार्य भी पूरा कर लिया गया। तट  रेखा  प्रबंधन हेतु मानचित्रणए तटीय प्रोफाइल मापन और तट के निकट के तलछट के नमूने भी एकत्र किए गए। अध्ययन के लिए आवश्यक पवन डेटा सीइएसएस से एकत्र किए गये हैं। तट के निकट (20 मीटर तक) क्लोज़ ग्रिड बाथीमीट्री तैयार करने के लिए मानसून पूर्व ऋतु के दौरान बाथीमीट्रिक सर्वेक्षण किए गए।

मानसून पूर्व ऋतु के लिए तरंगोंए धाराए ज्वार भाटा और समुद्री किनारों के प्रोफाइल डेटा और तलछट नमूनों का विश्लेषण कार्य पूरा कर किया गया है। मानसून से पहलेए मानसून में तथा मानसून के बाद की अवधि में समुद्र तट से तलछट के नमूने एकत्र किए गए और उनका विश्लेषण किया गया। डेटा के विश्लेषण से पता चला कि तलछट की अच्छी तरह जांच की गई है।

कर्नाटक के तट के लिए तट  रेखा प्रबंधन योजना

इस क्षेत्र में तटीय द्रव गतिकी काफी जटिल है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य पहले तो भू-कटावध्अभिवृद्धि के लिए जिम्मेदार प्रक्रियाओं (क्षेत्रीय और स्थानीय) की पहचान करना तथा उसके बाद कटावध्अभिवृद्धि से तट की सुरक्षा के उपाय सुझाते हुए तट  रेखा प्रबंधन योजना तैयार करना है। राष्ट्रीय समुद्र – विज्ञान संस्थान, गोवा के साथ मिलकर कर्नाटक तट के किनारे स्थित 4 स्थानों के लिए 5 एसएमपीएस विकसित करने की योजना बनाई  गई है। उलैर गोली पाडुकेरे (माल्प के निकट) और कुण्डापुर कोड़ी (कुण्डापुर के निकट) स्थलों के लिए ज्वार-भाटा, तरंगों, धाराओं और समुद्र तट प्रोफाइलों के डेटा एकत्र किए गए।

मासिक अन्तराल पर देवबाग, पाविनकुरबे, कुण्डापुर और पाडुकरे के प्रत्येक तीन स्टेशनों के समुद्र-तट प्रोफाइल और समुद्र तट-तलछट सहित तट  रेखा का मानचित्रण किया गया है। काली नदी (कारवारद्ध) सरवती नदी (होनावर) और पाडुकरे में मुहाने के निकट नदी से जल के निकलने के मापन भी किए गए जिससे कि तटीय धारा में नया जल आने और तलछट के बहने की जानकारी ली जा सके तथा तटीय पट्टी क्षेत्र के लिए द्रवगतिक और तलछट बहने के मॉडलों का निर्माण किया जा सके।

गोपालपुर तट के लिए तट  रेखा प्रबंधन योजना

मद्रास, एन्नौर और पारादीप बन्दरगाह में हुए अनुभवों से पता चला है कि बंदरगाह के विकास घाटों, ग्रोइनों, तरंगरोधों इत्यादि जैसी निर्माण गतिविधियों और तट संरक्षण उपायों से, तट की स्थलाकृति बहुत अधिक बदल जाती है। दक्षिणी उड़ीसा के किनारे स्थित गोपालपुर बंदरगाह अच्छे मौसम वाला बंदरगाह है जो उत्तर-पूर्वी मानसून की अवधि (अक्तूबर से मार्च) के दौरान प्रत्येक वर्ष यातायात के लिए खुला रहता है। इस समय, बंदरगाह में परिवर्तन कर इसे सभी मौसम के दौरान खुले बन्दरगाह का रूप दिया जा रहा है। इस कारण से साथ के क्षेत्रों की तट-रेखा में बदलाव आ सकते हैं।

एकीकृत तटीय और समुद्री क्षेत्र प्रबंधन, इकमाम परियोजना निदेशालय ने बरहामपुर विश्वविद्यालय के साथ मिलकर ‘गोपालपुर तट के लिए तट  रेखा प्रबंधन योजना’ पर एक परियोजना शुरू की ताकि फील्ड प्रेक्षणों, यथा-बाथीमीट्री, धारा, ज्वार-भाटा, तरंगों, तलछट विशेषताओं, समुद्र तट स्थलाकृति, तट  रेखा मानचित्रण तथा तलछट विशेषताओं और गणितीय मॉडलों के अध्ययन के माध्यम से तट  रेखा का प्रबंधन के लिए अपेक्षित उपचारात्मक उपाय सुझाए जा सकें। इन डेटा का प्रयोग तट की वर्तमान स्थितिए बंदरगाह के प्रभाव का विश्लेषण करने तथा भावी परिवर्तनों का पूर्वानुमान करने के लिए प्रभावी मॉडलों का विकास करने में किया जाएगा।

तट रेखा प्रबंधन हेतु गोपालपुर बंदरगाह के निकट एक वर्ष की अवधि के लिए 23 मीटर की गहराई पर एक वेब राइडर ब्वॉय तथा आरसीएम करंट मीटर स्थापित किए गए ताकि धाराओं और तरंगों के पैटर्न को समझा जा सके। जलस्तर संबंधी सूचना एकत्र करने के लिए बंदरगाह के अन्दर तक ज्वार.भाटा मापी लगाया गया। तरंग डेटा से पता चलता है कि जून-जुलाई महीने के दौरान सबसे ऊंची तरंगें 3.4 मीटर तक होती हैं तथा ज्वार-भाटा की अधिकतम रेंज 2 मीटर होती है।

दिसम्बर, 2008 से जनवरी 2009 के दौरान तरंग, धाराओं और ज्वार-भाटा के स्थलों के लिए चार अलग-अलग स्थानों पर ऋतुकालिक मापन किया गयाए तथा 20 किमीण् तट से 20 मीटर गहराई तक के बाथीमीट्रिक डेटा एकत्र किए गए। डेटा का विश्लेषण किया जा रहा है।

चिल्का झील के लिए पारिप्रणाली मॉडलिंग

चिल्का झील की उत्पादकता नई मछलियों की आवक सहित मछलियां पकड़ने के तरीकों में किए जाने वाले परिवर्तनों पर निर्भर करती है। पारिप्रणाली में मौजूद तथा परिणाम स्वरूप उत्पादकता में परिवर्तन लाने वाले जैविक भू-रासायनिक परिवर्तनों को समझने के लिए वर्तमान परियोजना शुरू की गई है तथा इसे चिल्का विकास प्राधिकरण और आन्ध्रा विश्वविद्यालय के सहयोग से क्रियान्वित किया जाता है।

इस परियोजना के अंतर्गत मुख्य क्रियाकलाप हैः (अ) चिल्का की समग्र द्रवगतिक अनुक्रिया के अध्ययन-पारिप्रणाली-मॉडल में जानकारी देने के उद्देश्य से पानीए लवण और तलछट की मात्रा का अनुमान लगानाए (ब) प्रवेश मार्ग गतिकी का अध्ययन करना तथा यह निर्धारित करना कि नई मछलियां ठीक प्रकार से हैं अथवा उन पर खारे पानी का प्रभाव पड़ रहा है तथा (स) जैव भू-रासायनिक मॉडल विकसित करना।

द्रवगतिक मॉडलिंग और पारिप्रणाली मॉडलिंग के लिए चिल्का अपतट पर 5 किमी उत्तर और 5 किमी दक्षिण में 200 मीटर के अंतरालों पर ईको साउंडर सर्वेक्षण करके अपेक्षित बाथीमीट्री संबंधी जानकारी प्राप्त की गई। ईकोसाउंडर सर्वेक्षण में 3 मीटर और 20 मीटर गहरे कंटूर के मध्य का अपतटीय क्षेत्र कवर किया गया। झील और नदियों में जैविक भू-रसायन पैरामीटरों पर प्रथम मासिक प्रेक्षण दिसम्बर 2008 के दौरान पूरे कर लिए गए थे।

प्रथम चरण (दिसम्बर 2008/जनवरी 2009) के फील्ड मापनों के बाद सभी पैरामीटरों पर द्वितीय और तृतीय ऋतुकालिक मापन 2009-2010 के दौरान जारी रहेंगे। प्राप्त डेटा के द्रव गतिक, जल की गुणवत्ता और जीव-विज्ञान के मॉडल विकसित करने के लिए प्रयोग किया जाएगा।

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