भूगोल और आप |

त्रिकुटा पहाड़ी के जंगलों में लगी आग व भारत में वनाग्नि

जम्मू स्थित वैष्णो देवी मंदिर, जहां दर्शन के लिए देश भर से प्रतिदिन  औसतन 35000 श्रद्धालु आते हैं, में यात्रा को फिलहाल टाल दिया गया है। वजह है वनाग्नि या दावानल। अब इन श्रद्धालुओं को जंगलों में लगी आग को काबू में पाने का इंतजार है। त्रिकुटा पहाड़ियों, जहां वैष्णो देवी मंदिर स्थित है, के जंगलों में 23 मई को आग लग गई थी। यह आग नई बैटरी कार ट्रैक पर लगी थी। श्रद्धालुओं की सुरक्षा को देखते हुए उन्हें आगे बढ़ने से रोक दिया गया।

वैसे भारत में गर्मियों में वनाग्नि या दावानल की घटनाएं अब आम हो गई हैं। अकेले उत्तराखंड में विगत सात दिनों में 4300 से अधिक वनाग्नि चेतावनियां प्राप्त की गईं जो विगत वर्ष के मुकाबले लगभग 10 गुणा अधिक हैं। इसी प्रकार हिमाचल प्रदेश में 17 मई से अब तक 2000 वनाग्नि चेतावनियां प्राप्त की गईं हैं (स्रोत-भारतीय वन सर्वेक्षण)। भारतीय वन सर्वेक्षण द्वारा एसएनपीपी, वीआईआईआरएस एवं मोडिस उपग्रहों की सहायता से वनाग्नि चेतावनियां जारी की जाती हैं।

वर्ष 2018 में सर्वाधिक अग्नि चेतावनियां प्राप्त करने वाले पांच राज्य

राज्य                                       अग्नि चेतावनियों की संख्या

मध्य प्रदेश                             36493

महाराष्ट्र                                 32544

ओडिशा                                31269

छत्तीसगढ़                             30942

मिजोरम                               12943

(स्रोतः भारतीय वन सर्वेक्षण)

भारत में वनाग्नि

अक्सरहां जनवरी से जून की ओर शुष्क मौसम के बढ़ने के साथ भारत में आग लगने की चरम घटनाओं में अक्षांशीय बदलाव देखा जाता है।  आग लगने की अधिकांश घटनाएं दक्षिणी भारतीय वनों में फरवरी-मार्च के दौरान, मध्य भारतीय वनों में मार्च-अप्रैल के दौरान और पश्चिमी हिमालय में मई-जून के दौरान दर्ज की जाती है। पूर्वोत्तर भारत झूम खेती के अधीन हैं और वहां आग लगने की चरम घटनाएं प्रतिवर्ष मार्च में घटित होती हैं।

वनाग्नि को प्रभावित करने वाले कारक

वायुमण्ल का तापक्रमः- यह ईधन के तापक्रम को प्रभावित करता है व तदनुसार ईधन की प्रज्वलन तापक्रम तक पहुंचने के लिए उष्मा की आवश्यकता दर्शाता है।

सापेक्ष आर्द्रताः सापेक्ष आर्द्रता कम होने पर अग्नि की सम्भावना ज्यामिति अनुपात मे बढती है।

अन्तिम वर्षा के दिनों की संख्या वर्षा से भूतलीय व भूस्तरीय ईधन की नमी मे बढोतरी हो जाती है, बहुत दिनो तक वर्षा न होने पर इस प्रकार के ईधन से नमी मे कमी हो जाती है

वायु गतिः वायु की गति प्रज्वलन दर को सीधे प्रभावित करती है। हवा के द्वारा आग की लपटों का कोण न्यून हो जाता है जिसके कारण ईधन का गर्म होना अधिक सरल हो जाता है व आग का फैलाव बढ जाता है।

ढालः ढालू जमीन में लपटों का कोण स्वत. कम हो जाता है, साथ ही ढाल आग के फैलाव को सीधे प्रभावित करता है।

दावाग्नि के प्रकारः

जंगलो की आग को निम्न प्रकार से वर्गीकृत किया जाता हैः

  1. रेंग कर चलने वाली अग्नि (क्रीपिंग फायर): यह भू सतह पर बहुत ही कम लपटां के साथ धीरे-धीरे फैलती है। ग्रीष्म ऋतु की रातों में जब हवा न चल रही हो, इसमे भूसतह पर पडी धास, पत्ती इत्यादि जल जाती है, यह आग कम हानिकारक होती है।
  2. भू सतह वाली अग्नि (ग्राउण्ड फायर): इसमे भू सतह पर स्थित वनस्पति, घास जल जाती हैं। इससे भू-सतह की मिट्टी भी प्रभावित होती है जिसके कारण भूमि की बनावट, जलग्राही क्षमता व उर्वराशक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव पडता है।
  3. सतह पर फैलने वाली अग्नि (सरफेस फायर): यह केवल भूमि की सतह पर पड़ी पत्तियों, झाडियों को जलाती है, इसमें वृक्षों को क्षति नहीं पंहुचती है।

छत्र पर फलने वाली अग्नि (क्राउन फायर):  इस प्रकार की अग्नि जमीन की सतह से फैलकर वृक्षों के छत्रां तक  लपटों के साथ फैलती है, इसमे आग वृक्षों के छत्रों तक लपटों के साथ फैलती है जिससे वृक्षों को अपार क्षति होती है।

आग लगने के कारणः

कई अध्ययन यह बताते हैं कि आग की 95 प्रतिशत धटनाओं के लिए स्वंय मनुष्य जिम्मेदार है, फिर चाहे वह असावधानीवश फेंकी गये बीडी, सिगरेट के टुकडे हो या जानबूझकर लगायी गयी आग। जंगलों के निकट स्थित खेतों की सफाई के दौरान लगाई गयी आग जंगल तक पहुंच जाती है। नई घास उग आने की प्रत्याशा में भी  कई बार स्थानीय लोग स्वयं आग लगाते हैं। प्रतिवर्ष वृक्षारोपण के नाम पर करोडों रुपये व्यय करने तथा इसी तरह वन विभाग कई अन्य योजनायें संचालित करता है, इन योजनाओं की खामियों को छिपाने के लिए भी यह एक आसान तरीका है। कई बार स्थानीय लोग चोरी छुपे इन जंगलों से पेड काट लेते हैं। जंगल  में आग लगा देने पर कटे पेडों के ठूँठों को छुपाने में भी मदद मिलती है। साथ ही आग में जले हुऐ सूखे गिरे पेडों को बटोरने का मौका भी मिल जाता है।

जंगलो में आग लगने के कई कारण हैं जिनमे मुख्य रूप सेः

(1) लापरवाही,

(2) जानबूझकर आग लगाना,

(3) खेतों में खर पतवार व कंटीली झाडियों को जलाने पर

(4) सडक निर्माण के दौरान डामरीकरण के लिए जलाई जाने वाली आग

(5) प्राकृतिक रूप से आकाशीय बिजली गिरना भी दावाग्नि का प्रमुख कारण है।

-तापमान का तेजी से बढना, वर्षा न होना भी आग लगने के लिए अनुकूल वातावरण तैयार कर देता है। आग लगने का एक प्रमुख कारण पिरूल (चीड़ की सूखी पत्तियाँ) है। 90 प्रतिशत पिरूल आज भी जंगलों में वैसे ही पडा रहता है। यह आग को तेजी से पकड़ता है। उतराखण्ड के जंगलों में पिरूल की बहुतायत आग का सबसे बडा कारण बनता जा रहा है।

भारत में वनाग्नि प्रबंधन आधुनिक प्रौद्योगिकी

वैसे भारत में भारत में कुशल वन अग्नि प्रबंधन उपग्रह जनित इनपुट उपलब्ध कराने हेतु इसरो के राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी), ने व्यापक वनाग्नि अन्वेषण व निगरानी प्रणाली विकसित किया है। मौजूदा आग लगी जगहों तथा जले क्षेत्रों के प्रसार का पता करने तथा आग लगने के संभावित क्षेत्रों के प्राथमिकीकरण के लिए क्षेत्रीय व राष्ट्रीय डेटा प्राप्ति हेतु, जंगलों की आग की अंतरा व अंतः मौसमीय स्थानिक-तापीय प्रणाली की निगरानी व विश्लेषण किया जाता है।

भारतीय वनाग्नि प्रत्युतर व आकलन प्रणाली, इन्फ्रास’ (INFRAS) की स्थापना इसरो के आपदा प्रबंधन सहायता प्रणाली केंद्र (डीएमएसपी) के निर्णय सहायता केंद्र (डीएससी) के अंग के रूप में दावानल के लिए सर्वाधिक अनुकूल मौसम (प्रतिवर्ष फरवरी-जून) में जंगलों में लगी आग की दिन व रात में वास्तविक समय चेतावनी सृजन व प्रसार के लिए हुयी थी। यह वर्ष 2006 से प्रचालन में है। इसके अलावा, जंगलों में लगी आग की बड़ी घटनाओं से जुड़े जलजे क्षेत्र का आकलन का कार्य भी किया जाता है।  इन्फ्रास राज्य वन विभागों को, अग्नि नियंत्रण और जले क्षेत्र आकलन तथा शमन नियोजन के लिए प्रारंभिक नियोजन के लिए उपग्रह सुदूर संवेदी और जीआईएस आधारित इनपुट भी उपलब्ध कराता है।

Post a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*