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दैनिक उपयोग के प्लास्टिक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार

हाल में प्रकाशित एक शोध के अनुसार दैनिक जीवन में प्रयोग में आने वाला प्लास्टिक भी सौर प्रकाश से संपर्क में आने पर ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन करता है। इनमें बोतल से लेकर पैकिंग सामग्री तक शामिल हैं।

प्लस वन नामक पत्रिका में प्रकाशित शोध आलेख के अनुसार आम प्रयोग वाले प्लास्टिक भी बीतते समय के साथ मीथेन, एथिलीन व प्रोपेन जैसे ग्रीनहाउस सक्षम गैस उत्सर्जित करते हैं। शोधकर्त्ता सारा जेन्नी रॉयर ने अपने शोध में पाया कि धूप में रहने के 212 दिन बाद दैनिक उपयोग में लाए गए ये प्लास्टिक शोध आरंभ होने के दिन की तुलना में 176 गुणा अधिक मीथेन का उत्सर्जन कर रहे थे। इससे वैश्विक तापवृद्धि के लिए उत्तरदायी कारकों की संख्या और बढ़ गई है। हालांकि शोध में यह भी कहा गया है कि इस रूप में प्लास्टिक के कम उत्पादन की वजह से वैश्विक मीथेन बजट का यह कम महत्वपूर्ण घटक है। हालांकि कम महत्वपूर्ण घटक होने के बावजूद ग्रीन हाउस गैस समस्या का तब तक समाधान नहीं हो सकता जब तक कि उसके प्रत्येक उत्तरदायी कारकों की पहचान नहीं कर ली जाए। इस दृष्टिकोण से यह महत्वपूर्ण खोज है। यह खोज इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि अब तक  प्लास्टिक के निर्माण में ईंधन व गैस जैसे जीवाष्म ईंधनों के इस्तेमाल को ही जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में जोड़कर देखा जा रहा था किंतु अब प्रत्यक्ष तौर पर प्लास्टिक भी एक कारक उभर कर आया है।

गौरतलब है कि मीथेन (CH4) उत्सर्जन का मुख्य कारण जीवाष्म ईंधनों का दहन है और यह उत्सर्जन वैश्विक तापवृद्धि में महत्वपूर्ण रूप से योगदान करता है। अमेरिकी पर्यावरण सुरक्षा एजेंसी (यूएसईपीए) के अनुसार मीथेन का उत्सर्जन कोयला, प्राकृतिक गैस एवं तेल के उत्पादन एवं परिवहन के दौरान होता है। मीथेन का उत्सर्जन मवेशी एवं अन्य कृषि गतिविधियों तथा नगरपालिकों के ठोस अपशिष्ट जमावों से भी होता है। आईपीसीसी की वर्ष 2014 की रिपोर्ट के अनुसार गैसों द्वारा वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में मीथेन 16 प्रतिशत का योगदान करता है।  ं

जहां तक प्लास्टिक की बात है तो हाल के वर्षों में यह बड़ी पर्यावरणीय समस्या बनकर उभरी है। इसी कारण वर्ष 2018 के विश्व पर्यावरण दिवस की थीम भी प्लास्टिक प्रदूषण को समाप्त करने से संबंधित रखी गई थी। साइंस एडवांसेस 2017 में प्रकाशित एक आलेख के अनुसार पूरे में अब तक 8.3 अरब मीट्रिक टन का प्लास्टिक उत्पादित कर लिया गया था। वर्ष 2015 की स्थिति के अनुसार लगभग 6.3 अरब टन का प्लास्टिक अपशिष्ट सृजित हुआ है जिनमें से 9 प्रतिशत का पुनर्चक्रण  हुआ है, 12 प्रतिशत जल दिया गया और 79 प्रतिशत को या तो मिट्टी के नीच गाड़ दिया गया है या फिर प्राकृतिक पर्यावरण में जमा है।  यदि प्लास्टिक के उत्पादन व अपशिष्ट प्रबंधन की यही प्रवृत्ति जारी रही तो वर्ष 2050 तक 12 अरब मीट्रिक टन का प्लास्टिक अपशिष्ट या तो जमीन के नीचे गड़ा होगा या प्राकृतिक पर्यावरण में होगा। वहीं संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार महासागरों में प्रतिवर्ष 80 लाख टन का प्लास्टिक बोतल, पैकेज एवं अन्य अपशिष्ट फेंक दिए जाते हैं।  इंडोनेशिया के बाली द्वीप में प्लास्टिक का इतना जमावड़ा हो गया था कि दिसंबर 2017 में वहां ‘अपशिष्ट आपात’ तक की घोषणा करनी पड़ गई थी। दरअसल प्लास्टिक इतना खतरनाक इसलिए भी है कि इनमें अधिकांश बायोडिग्रेडेब्ल नहीं हैं और अपघटित होने में 400 से अधिक वर्षों का समय लेता है।

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