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नगरीय क्षेत्र की जनगणना संकल्पना

भारत में शहरी क्षेत्रों की पहचान की कसौटी बिल्कुल अलग है। हमारा तात्पर्य है, भारत में शहरी क्षेत्रों की पहचान और उन्हें निर्धारित करने का तरीका अन्य देशों से भिन्न है। क्या आप जानते हैं कि 1901-51 तक शहरी क्षेत्रों के लिए जनगणना की परिभाषा कमोबेश एक समान थी, जबकि हम सभी अच्छी तरह जानते हैं कि 1901 से 1951 तक भारत के नगरीय आकार, संख्या, प्रसार, सभी कुछ में बहुत ज्यादा बदलाव हो चुके थे। अंततः 1961 में शहरी क्षेत्रों की जनगणना के लिए निर्मित परिभाषा में कुछ सुधार व संशोधन किए गए। तब कहीं जाकर यह परिभाषा सांख्यिकी रूप से संतोषप्रद बन सकी। ये दूसरी बात है कि 1971 व 1981 की जनगणना में भी 1961 की परिभाषा को ही आधार माना गया।

आइये सबसे पहले 1901 की जनगणना की रिपोर्ट के अनुसार शहर की परिभाषा जानें।

  • जिस शहर क्षेत्र में किसी प्रकार की नगरपालिका हो।
  • सिविल लाइन का क्षेत्र जो नगरपालिका के अन्तर्गत न हो।
  • स्थायी निवास क्षेत्र हो तथा जिसकी जनसंख्या 5000 से कम न हो।
  • हर तरह का छावनी क्षेत्र।

उपरोक्त विशेषताओं से युक्त होने पर ही, प्रान्त निरीक्षक किसी क्षेत्र विशेष को नगर का दर्जा देने का निर्णय लेता था।

इस प्रकार किसी भी क्षेत्र को नगर का दर्जा देने में दो बातों पर विशेष ध्यान दिया जाता था, पहला जनसंख्या आकार और दूसरा प्रशासनिक ढांचा। यही किसी क्षेत्र में नगर निर्धारित करने के महत्वपूर्ण मापदंड थे, साथ ही विवेक के आधार पर जनसंख्या अधिकारी किसी भी स्थान को उपरोक्त प्रशासनिक ढांचा या जनसंख्या ना होने पर भी विशेष कारणों से नगर का दर्जा दे सकता था। नगर की यह परिभाषा उतनी वस्तुनिष्ठ नहीं थी जितनी इसे होनी चाहिए थी क्योंकि यह सांख्यिकीय जांच पर आधारित नहीं थी।

भारत के नगरीय क्षेत्र की जनगणना संकल्पना की विशेषताएं-

  1. 1911, 1921, 1931 एवं 1941 की जनगणना में नगर की परिभाषा कमोबेश 1901 की जनगणना परिभाषा पर ही आधारित रही, हालांकि स्वयं जनगणना आयुक्त ने कई बार इसकी आलोचना की।
  2. यह भी गौर करने योग्य है कि 1951 की जनगणना में नगर की जिस परिभाषा को अपनाया गया, वह 1901 की ही परिभाषा थी, पर इसमें शब्दों को थोड़ा सावधानी पूर्वक सहेजा गया था। वह परिभाषा इस प्रकार है, ‘‘नगर सामान्य बसाव के वे क्षेत्र हैं जहां की कुल जनसंख्या 5000 से कम नहीं होती है, पर ऐसे क्षेत्र जहां की जनसंख्या इससे अधिक है लेकिन निश्चित नगरीय विशिष्टताएं व चरित्र नहीं है तो, उसे नगर नहीं माना जा सकता।

इस परिभाषा के बाद भी विभिन्न राज्यों के द्वारा नगरीय क्षेत्र के निर्धारण में अलग-अलग तरह के मापदंड और परिभाषाओं को अपनाया गया।

  1. 1961 की जनगणना में शहर की परिभाषा को और अधिक स्पष्ट बनाया गया ताकि मापदंडों की भिन्नता और इससे उत्पन्न उलझनों से बचा जा सके। और हाँ, सिर्फ परिभाषा को ही 1961 में और सख्त नहीं बनाया गया बल्कि यह भी सुनिश्चित किया गया कि संपूर्ण भारत में परिस्थितियों के माफिक होने पर एक ही विधि के अन्तर्गत नगरों की पहचान की जाये। 1961 की परिभाषा के अनुसार नगर के लिए अनिवार्य शर्तें इस प्रकार हैं –
  • जनसंख्या का घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग कि.मी. से कम न हो।
  • जनसंख्या कम से कम 5000 हो।
  • कार्यशील जनसंख्या का कम से कम 75 प्रतिशत भाग गैर कृषि कार्यों में संलग्न हो।
  • उस स्थान में नगरों की कुछ विशेषताएं व सुविधाएं अवश्य हों।

यह परिभाषा यथार्थ के थोड़ा अधिक करीब थी, हालांकि बाद में इससे तुलनात्मकता के संदर्भ में, समस्याएं उत्पन्न होने लगीं। साथ ही इसके उपबंध में थोड़ी सी जगह विवेकाधिकार के लिए भी छोड़ दी गयी, जिसमें नागरिक सुविधाओं के तहत, नए स्थापित औद्योगिक क्षेत्रों, बृहत अधिवास या पर्यटन महत्व के स्थानों को नागरिक सुविधाओं के आधार पर नगर के रूप में मान्यता दी जा सके।

  1. इसी परिभाषा को 1971 और 1981 की नगरीय जनगणना का भी आधार बनाया गया। हालांकि विवेकाधिकार और सीमान्त क्षेत्रों से संबंधित कुछ छोटे-मोटे सामंजस्य की गुंजाइश रखी गई। जबकि न्यूनतम जनसंख्या 5000 व्यक्ति, प्रति वर्ग कि.मी. घनत्व 400 व्यक्ति तथा प्रशासनिक स्थिति जैसे महत्वपूर्ण मापदंड पहले की ही तरह अपनाये गये।
  2. जनगणना संकल्पना में नगरीय क्षेत्रों की तीन सीमाओं की पहचान की गईः
  • राजनीतिक या प्रशासनिक इकाई का निर्धारण नगरपालिका या निगम की सीमा द्वारा।
  • भौगोलिक सीमा का निर्धारण लगातार बने भवनों व भवनों के क्षेत्र द्वारा।
  • र्यात्मक सीमा का निर्धारण सामाजिक व आर्थिक संबंधों के द्वारा और सामाजिक व आर्थिक संबंधों का निर्धारण नगर द्वारा।
  1. दूसरे या तीसरे मापदंड को आंशिक रूप से स्थान देने के क्रम में 1951 में जनगणना में ‘नगर समूह’ संकल्पना कर समावेश किया गया जो शहर नगर की संकल्पना से अलग था। इससे पूर्व एक अकेले नगर और एक के बाद एक नए सामूहिक नगरों के बीच फर्क को परिभाषित नहीं किया गया था। 1951 की जनगणना में ‘नगर समूह’ की संकल्पना को सिर्फ प्रथम श्रेणी के नगरों पर ही लागू किया गया जबकि 1961 में इसे सभी नगरीय श्रेणियों पर लागू किया गया।

1961 की जनगणना में 132 नगर-समूहों की पहचान की गई, जिन्हें 3 प्रकारों के अन्तर्गत रखा गया।

  • ऐसे नगर समूह जो नगर पालिका और नगर पालिका क्षेत्रों के समूह से बने हों।
  • ऐसे नगर समूह जो पड़ोस की नगर पालिका क्षेत्रों व छावनी क्षेत्र आदि के समूह से बने हों।
  • ऐसे नगर समूह जो छोटे शहरों के साथ नजदीकी ग्रामीण क्षेत्रों या गांवों के समूह से बने हों।

‘नगर समूह’ को परिभाषित करने के क्रम में जिन मापदंडों को मुख्य आधार बनाया गया उनमें परिवहन सुविधाएं जैसे सड़क, रेल मार्ग आदि तथा व्यापार एवं कार्यों के सिलसिले में लोगों की आवाजाही को प्रमुख आधार बनाया गया तथा अधिक जनसंख्या वाले नगर की 6 कि.मी. की परिधि में आने वाले नगरों को नगरीय विशेषताओं के बरकरार रहने पर, संचार की सुविधा होने पर तथा आर्थिक व अन्तर्निर्भर क्रियाओं से जुड़े होने पर नगर समूह का दर्जा दिया गया।

बहरहाल, इस परिभाषा को वास्तविक रूप से लागू करने पर बहुत से वस्तुनिष्ठ निर्णय लेने पड़े। जैसे कुछ राज्यों में एक-दूसरे से अधिक संख्या में जुड़े गांवों को ‘नगर समूह’ का दर्जा दे दिया गया। अतः 1971 और 1981 की जनगणना में ‘नगर समूह’ शब्दावली को हटा दिया गया, इसके स्थान पर ‘नगर-जमघट’ शब्द का प्रयोग किया जाने लगा।

  1. 1971 में अपनायी गई गई शब्दावली ‘नगर-जमघट’ की परिभाषा भी कमोबेश 1961 के ‘नगर-समूह’ की परिभाषा जैसी ही थी। जिसके अनुसार नगर के नगर पालिका सीमा से बाहर के शहर ‘नगर-जमघट’ का हिस्सा हैं जबकि ग्रामीण पॉकेट्स इसमें शामिल नहीं हैं। यदि ग्रामीण क्षेत्र के कुछ हिस्से नगरीय क्षेत्र सीमा की निरन्तरता में आंशिक रूप से आ रहे हों, तब भी नहीं।
  2. एक नई संकल्पना (एसयूए) ‘स्तरीय नगरी क्षेत्र’ को 1971 में प्रस्तुत किया गया जिसके अन्तर्गत जिन नगरों की जनसंख्या 1991 तक 50000 या इससे अधिक हो जाने की संभावना थी उनकी संख्या कम करने की कोशिश की गई। एसयूए की पहचान करने के लिए मुख्य शहर के साथ जुड़े शहरों एवं गांवों की श्रृंखला को इस दृष्टि से परखा गया कि वे 1991 तक मुख्य शहर में होने वाले भौतिक विकास के साथ अपना तारतम्य बिठा सकते हैं या नहीं। एसयूए ने हमारी संकल्पनात्मक सोच को एक निश्चित व स्थायी इकाई दी है। इस संकल्पना के प्रयोग द्वारा 2 से 3 दशक के जनगणना आंकड़ों के सारणीकरण पर नगर पालिका सीमा में बदलाव आ जाने के बावजूद कोई फर्क नहीं पड़ता था। साथ ही, अब नगरीय केन्द्रों के इर्द-गिर्द नगरीकरण प्रवृतियों के अध्ययन के लिए एक उपयुक्त ढांचा भी हमारे पास उपलब्ध हो गया।
  3. ‘सिटी’ और ‘टाउन’ दोनों ही नगर के अर्थ में प्रयुक्त होने वाले शब्द हैं पर भूगोल में जनसंख्या के आकार के आधार पर इन दोनों में स्पष्ट अंतर किया जाता है। पारंपरिक रूप से 100000 या इससे अधिक जनसंख्या वाले शहरों (जो कि प्रथम श्रेणी के शहर हों) को सिटी या नगर कहा जाता है।

‘भौगोलिक नगर‘ एक या अधिक वैध नगरों की लगातार श्रृंखला को कहा जाता है जिसमें भवन भी लगातार क्रम में बने हुए हों। नगरीय क्षेत्र वैध नगर में तब तब्दील होता है जब वहां नगर निगम की स्थापना हो जाए (जबकि टाउन या कस्बा नगर पालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है)। यह जरूरी नहीं कि वैध नगर के अन्तर्गत संपूर्ण भवन निर्मित क्षेत्र शामिल हो। कभी-कभी संपूर्ण क्षेत्र को शामिल किया जाता है, कभी नहीं। और यह भी जरूरी नहीं कि ‘भौगोलिक नगर‘ की सीमाएं वैध नगर की सीमाओं के बराबर हों। उदाहरण के लिए दिल्ली एक भौगोलिक नगर है जिसमें कई वैध नगर हैं जैसे दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली नगर निगम और छावनी बोर्ड इत्यादि। वस्तुतः भौगोलिक नगर, अन्तर परिवर्तनीय के साथ-साथ आम बोल-चाल की भाषा में नगर के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है।

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