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नगरीय विन्यास के नियोजन में सड़क का महत्व

नगर निर्माण की योजना में सड़कों का स्थान महत्वपूर्ण है। नगरीय विन्यास के नियोजन में सड़कें विन्यास के लिए आधार तैयार करती हैं। लोगों के आवागमन और यातायात की सुविधा, सामान ढोने के लिए परिवहन की सुविधा, आवासीय क्षेत्रों, बाजारों, कार्यालयों, स्वास्थ्य केन्द्रों, शिक्षण संस्थानों और न्यायालयों को एक-दूसरे के साथ जोड़ने का काम सड़कों के द्वारा होता है। मैदानी क्षेत्रों में अवस्थित नगरों का विन्यास पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित नगरों से अलग होता है। नियोजित नगरों तथा अनियोजित नगरों के विन्यास में एकरूपता नहीं पायी जाती है।

नगरीय विन्यास के नियोजन में सड़क सम्बंधी कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को ध्यान में रखा जाता है। ये निम्न प्रकार से हैं :

  • सड़कों को नगरों के विकास तथा विस्तार सम्बंधी क्रियाकलापों में सहायक होना चाहिए।
  • सड़कें बाधारहित होनी चाहियें। दुर्घटना की सम्भावना को खत्म करने के लिये तेजगति वाले वाहनों, धीमी गति वाले वाहनों और पैदल चलने वालों के लिए रेखीय व्यवस्था होनी चाहिये। मुख्य मार्ग पर हर तरह के आवागमन के लिए यातायात व्यवस्था में अलग स्थानों को सुनिश्चित किया जाना आवश्यक है, ताकि वाहनों के टकराने की स्थिति ना उत्पन्न हो और दुर्घटनाओं से बचा जा सके।
  • सड़क पर चलने वाले वाहनों तथा मनुष्यों सभी के लिए प्रकाश, ठहराव स्थल और सुरक्षा के आवश्यक प्रबन्ध होने चाहिये।

सड़क विन्यास के लिए आवश्यक तथ्यों को ध्यान में रखते हुए नगरीय विन्यास को निम्न रूपों में नियोजित किया जा सकता है।

आयताकार विन्यास : समतल क्षेत्र के लिए उपयुक्त समझा जाने वाला यह विन्यास प्रारूप अत्यन्त उपयोगी है। इसके अनुसार सड़कों में किसी प्रकार के अवरोध नहीं होने चाहिये। सड़कों के किनारे पैदल चलने वालों के लिए अलग स्थान होने के अलावा वाहनों के ठहराव और सामान को लादने व उतारने का स्थान होना चाहिये। एक-दूसरे को काटने वाली सड़कों के मिलन-स्थल पर गोल-चक्कर अवस्थित होने चाहिये। मुख्य मार्ग के किनारे विश्राम स्थल, जल-पान स्थल और वाहनों की मरम्मत सम्बंधी सेवा-स्थल स्थापित होने चाहिये। नगर के प्रत्येक क्षेत्र में ऐसे सम्पर्क मार्ग विकसित होने चाहिये जिनके द्वारा मुख्य मार्ग तक आसानी से पहुंचा जा सके।

आयताकार विन्यास प्रारूप में सड़कें पूर्व से पश्चिम तथा उत्तर से दक्षिण एक-दूसरे को समकोण पर नगर में काटती हैं। मकान निर्माण के लिए सुनिश्चित भू-खंड भी आयताकार होते हैं। इससे नगर की भूमि का जरा-सी भी टुकड़ा बर्बाद नहीं होता। भवन निर्माण के लिए अधिक से अधिक भूमि उपयोग में आ जाती है। निर्मित मकानों के समीप ही वाहनों को खड़ा करने के लिए स्थान उपलब्ध रहता है। निर्माण कार्य कम खर्चीले होते हैं तथा जलापूर्ति विद्युत आपूर्ति जैसी सुविधाएँ आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं। परन्तु, यदि धरातल विषम हो तो सड़कों व मकानों के निर्माण का खर्च बढ़ जाता है। प्राचीन निर्माण शैली में निर्मित भारत का नवीन जयपुर नगर आयताकार विन्यास का उत्तम उदाहरण है। इसके अतिरिक्त उत्तर से दक्षिण की अवस्थिति वाला पुराना कोलकाता भी आयताकार विन्यास वाला नगर है।

कर्णवत आयताकार विन्यास : इस प्रारूप में आयताकार संरचना को विकर्णों के द्वारा विभाजित कर दिया जाता है। इससे दो अलग-अलग कोनों को एक सीधी सड़क द्वारा सम्बद्ध कर दिया जाता है। इससे लम्बे मार्ग पर घूमकर आने से बचा जा सकता है तथा समय, ऊर्जा व धन तीनों की बचत हो जाती है। विकर्णों के सम्पर्क स्थानों पर पार्क आदि की स्थापना की जाती है। यातायात में किसी प्रकार का अवरोध अनुभव नहीं होता। भारत में उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित गोमती नगर, इंदिरानगर आदि नवविकसित आवासीय क्षेत्र इसके उत्तम उदाहरण हैं।

अरीय एवं केंद्र-बिन्दु विन्यास : इस प्रारूप में नगर का केन्द्र-स्थल महत्वपूर्ण होता है। इस केन्द्र से चारों ओर को जाने वाली सड़कों के सहारे नगर का विस्तार हो जाता है। केन्द्र से नगर के प्रत्येक स्थान तक आसानी से पहुँचा जा सकता है। अरीय अवस्था में विकसित सड़कों के केंद्र से जुड़े होने के कारण इन पर यातायात अधिक रहता है। अरीय सड़के ही मुख्य मार्ग होती हैं। केंद्र के चारों ओर वृत्त बनाने वाली मुख्य सड़क पर यातायात चक्राकार स्थिति में गतिशील रहता है। केंद्र नगर का हृदय स्थल बन जाता है, जैसे नई दिल्ली का कनाट प्लेस। इस विन्यास प्रारूप से नगर कई बड़े टुकड़ों में विभाजित हो जाता है और आवासीय क्षेत्र में मौजूद स्ट्रीट या गलियां मुख्य सम्पर्क मार्गों से तथा मुख्य अरीय मार्ग से समकोण पर मिलती हैं। भूमि का सम्पूर्ण उपयोग निर्माण कार्यों हेतु नहीं हो पाता है।

आयताकार मकड़ी वृत्त विन्यास

यह दो भिन्न शैली के विन्यासों का मिश्रण है। समतल मैदानों पर स्थित नगरों के लिए इसका उपयोग उत्तम माना गया है। वृत्ताकार मुख्य मार्ग से अरीय सम्पर्क मार्ग जुड़े होते हैं। एक ओर से मार्ग प्रशासनिक क्षेत्र को जाता है तो अन्य मार्गों से व्यावसायिक स्थल और आवासीय क्षेत्र जुड़े होते हैं, जैसे नई दिल्ली का इंडिया गेट।

जैविक मार्ग विन्यास

यह बिना किसी पूर्व योजना के विकसित होने वाला नगर विन्यास प्रारूप है। इसके मार्ग विभिन्न प्रकार की चौड़ाईयों वाले और विभिन्न प्रकार के आकार वाले सीधे अथवा सर्पाकार हो सकते हैं। नगर के विशिष्ट भवन मार्गों के दिशा परिवर्तन वाले केंद्रों व कोणों पर स्थित होते हैं। आकर्षक विन्यास वाले ऐसे नगर अक्सर नदी तट के किनारे, किसी बड़ी झील के किनारे अथवा कई झीलों के समूह के मध्य स्थित पाये जाते हैं। द्वीपों और टापू पर अवस्थित नगरों का विन्यास प्रारूप भी इसी प्रकार का होता है। अंडमान निकोबार स्थित पोर्ट ब्लेयर, गोवा का पणजी, लक्षद्वीप का कावारत्ती इसके उदाहरण हैं।

पंक्तिबद्ध विन्यास

इस प्रारूप वाले नगरों का विकास एक पंक्ति के रूप में राजमार्गों अथवा नदियों के किनारे समानांतर रूप में हो जाता है। सभी प्रकार के विशिष्ट प्रशासनिक तथा औद्योगिक भवन मुख्य मार्ग के किनारे-किनारे अवस्थित होते जाते हैं। आवासीय क्षेत्रों में गलियों का विस्तार मिलता है। भारत में मथुरा, एटा और फरीदाबाद इसके उदाहरण हैं।

वेदी प्रारूप विन्यास

पर्वतीय क्षेत्रों के नगर इस प्रकार का प्रारूप रखते हैं। घाटियों के ढाल पर स्थित मार्गों के किनारे इमारतों का विस्तार होता है। दूर से देखने पर ये सीढ़ी की भाँति दिखते हैं। शिमला, नैनीताल, मसूरी, देहरादून आदि नगर इस शैली के हैं।

तारकनुमा विन्यास

अरीय विन्यास के समान ही इसके मुख्य मार्ग केंद्र स्थल से सम्बद्ध होते हैं और चारों तरफ फैल जाते हैं। नगर का विस्तार एक तारे की भांति दिशाओं में हो जाता है। भारत में जयपुर व बरेली इसके उदाहरण हैं।

मिश्रित प्रारूप विन्यास

इस प्रकार के नगरों का विन्यास कई प्रकार के प्रारूप वाला होता है। विकास की विभिन्न अवस्थाओं में इनका विस्तार अलग-अलग दिशाओं में अलग-अलग प्रारूपों में हो जाता है। सह-अनियोजित नगरों में इसके उदाहरण आसानी से देखे जा सकते हैं। भारत में लखनऊ, कानपुर, रायपुर आदि इसी प्रकार के नगर हैं।

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