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नासा द्वारा जारी मानचित्र में भारत की भयावह तस्वीर

हाल में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा द्वारा भारत का एक मानचित्र जारी किया गया है जिसमें मध्य भारत की कई जगहों को लाल बिंदुओं से इंगित किया गया है। ये बिंदु आग लगने की जगह हैं। जिन राज्यों को इसमें कवर किया गया है, वे हैं; उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र एवं कुछ दक्षिणी राज्य।

भीषण गर्मी में ये आग गर्मी को बढ़ाने के साथ-साथ ब्लैक कार्बन प्रदूषण को भी बढ़ा रहे हैं। एक अध्ययन में ब्लैक उत्सर्जन में कमी का वायु गुणवत्ता एवं मानव मृत्य दर पर प्रभाव को अनुमानित किया गया है। इसके अनुसार वैश्विक स्तर पर मानव गतिविधियों से ब्लैक कार्बन के उत्सर्जन को आधा करने पर विश्व में प्रतिवर्ष 157,000 अकाल मृत्यु को टाला जा सकता है। इनमें से अधिकांश मौतों को पूर्वी एशिया (चीन, 54 प्रतिशत) एवं दक्षिण एशिया (भारत-31 प्रतिशत) में टाला जा सकता है (ब्लैक कार्बन एमिशन इन इंडिया-यूएसईए, अक्टूबर 2012)।   ज्ञातव्य है कि ब्लैक कार्बन के कई स्रोत हैं। खुले में बायोमास (जिसमें वनाग्नि और फसल अपशिष्ट को जलाना भी शामिल है) को जलाना  ब्लैक कार्बन, आर्गेनिक पदार्थ एवं कार्बन मोनो ऑक्साइड उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान (25 प्रतिशत) करता है (एमिशन फ्रॉम ओपन बायोमास बर्निंग इन इंडिया-इंटीग्रेटिंग द इन्वेंटरी एप्रोच विद हाई रिजोल्यूशन मोडरेट रिजोल्यूशन इमेजिंग स्पेक्ट्रोरेडियोमीटर एक्टिव फायर एंड लैंड कवर डाटा-सी.वेंकटरमन, जी. हबीब एवं अन्य)।

मानचित्र में जिन क्षेत्रों को दर्शाया गया है वे जंगल वाले क्षेत्र हैं और ये वनाग्नि की घटनाएं भी हो सकती हैं। परंतु नासा गोडार्ड स्पेस फ्लाइट सेंटर के शोध वैज्ञानिक हिरेन जाथवा तर्क अलग है। उनके अनुसार नासा के मानचित्र में आग लगने वाली जिन बिंदुओं को दर्शाया गया है वे मुख्यतः फसल जलाने वाले स्थल हो सकते हैं। वे मानते हैं कि जंगलों में लगी आग अनियंत्रित होती हैं और ये अधिक धुआं व धुंध फैलाते हैं।

कृषि वैज्ञानिक हाल के वर्षों में फसल दहन के पीछे ‘कंबाइन हार्वेस्टिंग’ यानी मशीन के जरिय फसल कटाई को जिम्मेदार मानते हैं। ‘कंबाइन हार्वेस्टिंग’ में फसल कटाई के पश्चात पराली खेत में ही रह जाती है जिसे जलाना पड़ता है। फसल कटाई दो तरीके से की जाती है। श्रमिकों के द्वारा और कंबाइन हार्वेस्टिंग के तहत। श्रमिकों की कमी के चलते अब किसान कंबाइन हार्वेस्टिंग का सहारा ले रहे हैं। अब तक धान की पराली जलाये जाने के ही उदाहरण सामने आते थे क्योंकि चारा के रुप में इसका उपयोग नहीं हो पाता, किंतु अब यह ट्रेंड गेहूं के फसल के मामले में भी देखा जा रहा है। नासा ने जिन जगहों पर आग लगने को दर्शाया है वे धान-गेहूं की खेती वाले क्षेत्र हैं।

पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश एवं राजस्थान जैसे राज्यों में फसलों के अपशिष्टों के दहन से पर्यावरणीय प्रदूषण स्तर में बढ़ोतरी होती है। नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल ने दिल्ली सहित उपर्युक्त चार राज्यों को इस संबंध में कड़े उपाय करने का निर्देश वर्ष 2017 में दिया था। इसी आलोक में केंद्रीय कृषि मंत्रालय द्वारा किसानों के बीच जागरुकता फैलाने के लिए कुछ परामर्श भी जारी किये गये। इनमें शामिल था; किसानों को फसल अपशिष्ट प्रबंधन मशीन एवं उपकरण उपलब्ध कराना जैसे कि जीरो टिल सीड ड्रिल, हैप्पी सीडर, स्ट्रॉ बेलर, रोटावेटर इत्यादि।

उपर्युक्त दिशा-निर्देश के पश्चात आर्थिक मामलों की केंद्रीय समिति द्वारा 7 मार्च, 2018 को फसल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए कृषि यंत्रीकरण हेतु 1151.80 करोड़ रुपये (2018-2020) आवंटित किए गए। सरकार द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के तहत संबंधित राज्यों को स्वस्थाने फसल अपशिष्ट प्रबंधन तंत्र के लिए कृषि यंत्रीकरण बैंक भी स्थापित करने को कहा गया।

उपर्युक्त सारे उपायों के परिणाम दीर्घकाल में ही पता लग पाएगा परंतु फिलहाल जो स्थिति है वह भयावह प्रतीत होता है।

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