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पर्यावरणीय पारितन्त्र और मानवीय क्रिया

मानवीय हस्तक्षेप, पारिस्थितिकी प्रणालियों और पारिस्थितिकी सेवाओं जो आवश्यक रूप से जन कल्पना के दायरे में नहीं आते, के अधीन पारस्परिक अंतः निर्भरता को प्रभावित करता है। मानवीय क्रिया के संदर्भ में पर्यावरणीय पारितन्त्र की संपोषणीयता को समझने के लिए सूक्ष्म संबंधों को समझना जरूरी है।

पारितन्त्रों के अन्तर्गत अपनी अन्तः निर्भरता को मानवीय हस्तक्षेप प्रभावित करते हैं और यह आवश्यक नहीं है कि पर्यावरणीय पारितन्त्र सेवाएं जन कल्पना शक्ति के दायरे में आयें ही। इन अर्थभेदी संबंधों को समझना आवश्यक है ताकि पर्यावरणीय संपोषिता को मानवीय क्रियाओं से समन्वय में बेहतर ढंग से समझा जा सके।

अधिकांश मामलों में, पृथ्वी ग्रह की संभाव्य वहन क्षमता से मानवीय हस्तक्षेप के द्वारा हुए शोषण के अनुसार ही पर्यावरणीय पारितन्त्र की संपोषिता को देखा जाता है। चाहे ‘प्रलय’ निकट आ रही है या इसकी कल्पना की जा रही हो यह लेखकों द्वारा ली गई वैचारिक स्थिति पर निर्भर करता है। तकनीकी सुधार और संभावनाएं हमारे सामने संपोषित भविष्य के लिए सीमाओं के विस्तार का सुझाव दे सकती हैं। हालांकि, ऐसा लगता है कि तकनीक को अपने लिए उपयुक्त बनाने वाले समाज इस तथ्य की अनदेखी कर रहे हैं कि अपनी सेवाओं की आपसी अन्तःनिर्भरता के साथ पारितन्त्रों की समुचित कार्यप्रणाली-पर्यावरणीय पारितन्त्र सेवाएं-मानवता की उत्तरजीविता के लिए एक महत्वपूर्ण तथ्य हैं।

यद्यपि आम तौर पर व्यक्ति मानव आवास को बनाने वाले पारितन्त्रों के प्रति जागरूक है, फिर भी पारितन्त्र सेवाएं एक नई संकल्पना हैं और, ‘‘वे परिस्थितियां व प्रक्रियाएं हैं जिनके द्वारा पर्यावरणीय पारितन्त्र व प्रजातियां मिलकर मानवीय जीवन को संपोषित व पूर्ण करती हैं; (डेली, 1997)। इस संपूर्ण ग्रह को एकीकृत पारितन्त्रों के एक व्यापक जाल के रूप में देखा जा सकता है और पारितन्त्र सेवाएं वैश्विक स्तर से लेकर छोटे-छोटे स्तर तक फैली हुई हैं।

यदि हम संबंधों की बात करें तो, पर्यावरणीय पारितन्त्र अन्तः निर्भर सेवाओं का एक जाल है : पेड़-पौधे कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन पैदा करते हैं, जीव-जन्तु अवशिष्ट पदार्थों को अपघटित और निर्विश करते हैं; खेती के लिए आवश्यक मृदा निर्माण की मदद के लिए प्रजातियां हैं; जानवरों की हजारों प्रजातियां पेड़ों का परागण करती हैं, उन्हें उर्वरक प्रदान करती हैं और उन्हें नाशक जीवों से बचाती हैं और पेड़-पौधों के बीजों को इधर-उधर बिखेरती हैं।

हालांकि पर्यावरणीय पारितन्त्र सेवाओं को आंतरिक खतरों का सामना करना पड़ता है। यहां यह बात ध्यान देने योग्य है कि आवास के उजड़ने से पादप के पुनरूत्पादन पर एक गंभीर प्रभाव पड़ता है। दक्षिणी भारत के कोरोमण्डल तट के उष्णकटिबंधीय शुष्क सदाबहार वनों में, पादपों के पुनरूत्पादन पर परागकणों की कमी, जो ‘‘फल पुंज की परागकण कर्त्ता की सीमा’’ कहलाती है, का काफी गहरा असर पड़ा है। आपस में न मिलने वाली प्रजातियों ने परागण

कर्त्ता  की सीमा के प्रभावित उच्चतर स्तर को लांघ दिया है। वास्तव में इन प्रजातियों की पौध और पौधारोपण का घनत्व काफी कम है जो इशारा करता है कि परागणकर्त्ता की सीमा इनकी पर्यावरण की सफलता को प्रभावित करती है। इस प्रकार के मामलों में, वनों के छोटे-छोटे टुकड़े कार्य करना बंद कर सकते हैं और तब परागणकर्त्ता के प्राणिसमूह को फिर से बसाने के कार्य पर ध्यान देना होगा। पादपों की जनसंख्या का आधार एक अन्य समस्या है। अगर कुछ व्यक्तिगत पादप दूर-दूर रहें, तब भी इन्हें पुनरूत्पादन का सामना करना पड़ता है क्योंकि परागणकर्त्ता प्रभावशाली नहीं होता है और ये आपस में मिल भी नहीं पाते हैं। इसलिए वन को बसाने के किसी भी कार्य में प्रत्येक व्यक्तिगत जाति की संख्या व उनका घनत्व भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यदि पौधारोपण का घनत्व कम है, तब ये पादप पुनरुत्पादन नहीं कर पाएंगे क्योंकि पराग को इधर-उधर पौधों में ले जाने के लिए परागणकर्त्ता को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।

एक अन्य मुद्दा अन्तः प्रजनन का है। पेड़-पौधे भी हमारी तरह ही हैं, उन्हें भी उत्तरजीविता, बढ़ने की आवश्यकता होती है और ये अपने साथियों को भी तलाशते हैं। स्थलीय समुदाय का अधिकांश कार्बन भण्डारण वनों के पेड़ों में ही होता है। हालांकि जैसा कि स्केरसियोग्लू (2010) ने बताया था कि औद्योगिक युग को पहले की अपेक्षा कार्बन चक्र को 13 प्रतिशत नुकसान पहुंचा है। जीवन को बनाने व जलवायु को नियंत्रित करने में कार्बन की एक महत्वपूर्ण भूमिका है, मगर यह अस्त-व्यस्तता इतनी अधिक हो गई है कि जलवायु परिवर्तन में महत्वपूर्ण बदलाव आ रहे हैं और भविष्य में इनका विपरीत प्रभाव पड़ने की उम्मीद है (जलवायु परिवर्तन पर अन्तःसरकारी पैनल, 2007)।

जब मनुष्य पर्यावरणीय पारितन्त्रों से खिलवाड़ करता है, तब सबसे पहले बड़ी स्तनपायी प्रजातियां गायब होती हैं। इन बड़ी स्तनपायी प्रजातियों की जनसंख्या के कम होने से नकारात्मक पर्यावरणीय और आर्थिक परिणाम सामने आते हैं और ये परिणाम इन प्रजातियों की पर्यावरणीय भूमिका व स्थिति पर निर्भर करते हैं।

मांसाहारियों की कमी से जलप्रपातों का पोषण प्रभावित हुआ है, उच्च परभक्षी की अनुपस्थिति में शाकाहारियों की बढ़ोतरी हुई है और पेड़-पौधों का क्षरण हुआ है, जिससे कि अन्य प्रजातियों के घनत्व व विविधता में कमी आयी है (टिप्पल व बेस्सेता 2006)। शाकाहारियों व उनका शिकार करने वालों की कमी का विपरीत असर पड़ सकता है। पेड़-पौधों पर कोई नहीं रहेगा, छोटे शाकाहारियों की संख्या उसी अनुपात में बढ़ जाएगी, जैसे कि कृन्तक (कीजिंग, 2000) और उनके परभक्षियों, जैसे कि सर्पों (मैकाले व अन्य, 2006) में बढ़ोतरी। इस प्रकार की बढ़ोतरी, यद्यपि स्वयं से निर्धारक नहीं है, परन्तु इसके दुःखद परिणाम ही सामने आएंगे।

बहुत-सी प्रजातियां विशेष कर बड़ी स्तनपायी प्रजातियों की गतिविधियों पर निर्भर हैं। कुछ पेड़ बड़ी फल व बीज पैदा करते हैं और बड़े कोंपलों के द्वारा इधर-उधर जाने के अनुकूल होते हैं (गुईमारीज व अन्य, 2008)। इन बड़े स्तनपायी जीवों का मलमूत्र इन बीजों का संग्रह करता है और बहुत से कीड़ों को भोजन उपलब्ध कराता है। ये कीड़े अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ होते हैं। पूर्वी अफ्रीका में, जब हाथी चरने के लिए निकलते हैं तब उससे पैदा हलचल के कारण पेड़ पर रहने वाली छिपकली के लिए वह पूरा क्षेत्र अधिवास जैसा बन जाता है (प्रिंगल 2008)। हालांकि बड़े शाकाहारियों के कुल ह्रास से जटिल प्रजातियों के परस्पर संबंधों के जाल में चींटी-पादप संबंधों के चरित्र में तो बदलाव आया ही है (पामर व अन्य, 2008)।

इसी तरह से, बड़े स्तनपायी के संरक्षण की आवश्यकता के लिए बड़े क्षेत्रों के संरक्षण हेतु कभी-कभी छोटे कीड़े-मकोड़ों की तथाकथित ‘‘छाता प्रभाव’’, की व्यापक विविधता का भी संरक्षण करना होता है। एक आपसी तरीके में, जितना जटिल एक पर्यावरणीय पारितन्त्र होता है, वहां उतनी ही अधिक जैव विविधता होती है जिसके कारण पर्यावरणीय पारितन्त्र के कार्यों में बढ़ोतरी होती है।

इन कुछ उदाहरणों से, लोगों के कल्याण के लिए पर्यावरणीय पारितन्त्र सेवाओं के महत्व का स्पष्ट पता चल जाता है। मुद्दा यह है कि इस विचार को किस प्रकार से लागू किया जाए। इसके लिए विभिन्न विषयों जैसे एक तरफ तो जीव विज्ञान व भौतिक शास्त्रों और दूसरी ओर सामाजिक विज्ञान-के विशेषज्ञों की तीखी नजर की आवश्यकता है, साथ ही पर्यावरणीय पारितन्त्र की सेवाओं का मूल्य, राजनीतिक इच्छा शक्ति में खुलापन के लिए नए कार्यक्रमों और संस्थाओं को खड़ा करने की भी आवश्यकता है। प्रभावशाली ढ़ंग से लागू न होने से अच्छे यंत्र भी बेकार सिद्ध होते हैं।

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