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पेरू एवं बूदेविए द्वारा वृद्धि ध्रुव मॉडल

द्वितीय विश्वयुद्ध के उपरान्त 60 एवं 70 के दशक में विश्व की विकसितए विकासशील एवं अविकसित अर्थव्यवस्थाओं में असमानताओं को प्रस्तुत करने के लिए अर्थशास्त्रियों एवं भूगोलवेत्ताओं ने अनेक प्रादेशिक विकास मॉडल प्रस्तुत किये। ये प्रस्तुत मॉडल निर्यात आधारितए आगम-निर्गम तथा वृद्धि धु्रव उपागम पर आधारित हैं। जिसमें से पेरू एवं बूदेविए के द्वारा प्रस्तुत ‘‘वृद्धि धु्रव मॉडल’’ वर्तमान में परिवहन, संचार, बैंकिंग, सकारात्मक नीतियों तथा विश्व  द्वारा व्यापार संगठन  जैसी संकल्पनाओं के विकास के कारण अत्यधिक प्रासंगिक है।

विश्व के वे राष्ट्र जो नियोजित विकास की नीति का अनुसरण करते हैंए वहाँ निश्चित रूप से वृद्धि धु्रव के मॉडल का उपयोग किया गया है। वस्तुतः वृद्धि धु्रव नियोजन प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण एवं स्थायी अवयव है।

प्रादेशिक विकास के संदर्भ में पेरू (पेराक्स) के दिए गये मॉडल को ‘विकास धु्रव’ तथा बूदेविए के दिए गये मॉडल को ‘वृद्धि केन्द्र’ के रूप में माना जाता है। सामान्यतः वृद्धि धु्रव तथा वृद्धि केन्द्र का उपयोग समान अर्थों के लिए किया जाता है। लेकिन इनका सूक्ष्म विश्लेषण किया जाये तो इनमें मौलिक अन्तर है। जहाँ एक ओर वृद्धि धु्रव का उपयोग निरपेक्ष ‘आर्थिक दिक्स्थान’ के रूप में किया जाता है। वहीं वृद्धि केन्द्र का प्रयोग ‘‘भौगोलिक दिक्स्थान’’ के रूप में किया जाता है। लेकिन दोनों ही अवधारणाएँ आर्थिक विकास से सम्बन्धित हैं। सर्वप्रथम वृद्धि धु्रव का उपयोग 1955 में फ्रांसीसी भूगोलवेत्ता ‘फ्रंकाय पेरू’ ने 1955 में किया। उनके अनुसार वृद्धि धु्रव किसी प्रदेश का विशिष्ट केन्द्र होता है जिसके विकास से आस-पास के क्षेत्र के विकास को गति एवं दिशा प्राप्त होती है। वास्तव में पेरू ने इस अवधारणा को अर्थव्यवस्था के ‘एक गतिक क्षेत्र’ के रूप में प्रस्तुत किया। जिसका स्वरूप या प्रकृति प्रणोदी है। किसी वृद्धि धु्रव के विकास को प्रोत्साहित करने के लिए तीन अवधारणाएं या तत्व उत्तरदायी हैं.

  1.  वृद्धि धु्रव में स्थापित उद्योग तथा सहायक उद्योगए सकारात्मक अन्तः सम्बन्धों के कारण तेजी से विकसित होते हैं।
  2. वृद्धि धु्रव अपनी प्रणोदी प्रकृति के कारण बाध्य क्षेत्रों को त्वरित रूप से प्रभावित करता है जिससे बाहरी क्षेत्रों का विकास तेजी से होता है। वृद्धि की इस संकल्पना को अर्थशास्त्री दो रूपों में प्रस्तुत करते हैं-प्रथम छलकाव प्रभाव, द्वितीय.गुणक प्रभाव।
  3. ये सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को प्रेरित करने में सक्षम होते हैं अर्थात् ये तेज विकास के लिए प्रेषण प्रक्रिया को जन्म देते हैं जिससे अर्थशास्त्री रिसाव प्रभाव।

लेकिन 1996 में फ्रांसीसी अर्थशास्त्री जेण् आरण् बूदेविए ने वृद्धि धु्रव सम्बन्धित संकल्पना को संशोधित करते हुए ‘वृद्धि केन्द्र’ के रूप में मॉडल प्रस्तुत किया। वस्तुतः वृद्धि धु्रव तथा वृद्धि केन्द्र अवधारणाओं में आंतरिक एवं तात्विक समानता है, फिर भी इनमें मौलिक भिन्नता है। एक अमूर्त है और दूसरी मूर्त है। लेकिन अर्थशास्त्रियों ने दोनों अवधारणाओं को विकास केन्द्र के रूप में प्रस्तुत किया है।

वृद्धि धु्रव तथा वृद्धि केन्द्र एक समेकित उद्योगों का समुच्चय हैए जो किसी प्रणोदी अग्रणी क्षेत्र या उद्योग के पास भौगोलिक रूप में विकसित किया गया हो। ये वृद्धि धु्रव तथा वृद्धि केन्द्र न केवल स्वयं तेजी से वृद्धि करने में सक्षम होते हैं बल्कि ये आस.पास के क्षेत्रों की भी वृद्धि के लिए प्रेरक तत्व के रूप में कार्य करते हैं। ये कार्य ष्ष्छलकावष्ष् तथा ष्ष्गुणकष्ष् आर्थिक प्रभावों के द्वारा सम्पन्न होते हैं।

एक वृद्धि धु्रव की निम्नलिखित विशेषताएं हो सकती हैं.

1ण् इस क्षेत्र की जनसंख्या बड़ी होती है। फ्रांस के संदर्भ में 5 से 25 लाख बताया गया हैए जबकि भारत एवं चीन के संदर्भ में ये करोड़ों तक हो सकती है।

2ण् किसी भी वृद्धि धु्रव क्षेत्र में द्वितीयक तथा तृतीयक आर्थिक क्रियाओं का प्रभाव होता है।

3ण् वृद्धि धु्रव में आर्थिक वृद्धि की क्षमता होती है और ये आस.पास के क्षेत्रों को विकास के लिए प्रेरित करता है। अतः इससे सम्पूर्ण अर्थ व्यवस्था विकसित हो सकती है।

चूँकि इनसे राष्ट्र विकास की अवधारणा जुड़ी होती है अतः ऐसे धु्रवों के विकास के लिए सतत् प्रयास होना चाहिए। वृद्धि धु्रवों के विकास के लिए निम्नलिखित सुझाव दिए गए हैं .

  • पिछड़े तथा अल्पविकसित क्षेत्रों के वृद्धि धु्रव के लिए देश के विकसित भागों से उद्यमियों को अविकसित क्षेत्रों में स्थानान्तरित करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिएए जिसके लिए आर्थिक नीति में पूँजीए कर में छूट तथा औद्योगिक सुरक्षा का भरोसा देना चाहिए।
  • अल्पविकसित प्रदेशों में स्थानीय उद्यमियों के विकास के लिए उचित प्रशिक्षणए तकनीकी विकास के साथ.साथ निवेश उपलब्ध कराना चाहिए।

भारतीय परिप्रेक्ष्य में इसी मॉडल पर प्रादेशिक नियोजन प्रस्तुत किए गए हैं।  इसके अतिरिक्त विशेष आर्थिक क्षेत्रए तकनीकी पार्क  तथा अन्य औद्योगिक संकुल स्थापित किए जा रहे हैं। इसी अवधारणा पर की संकल्पना के तहत 2020 तक ग्रामीण क्षेत्रों को विकसित एवं शहरी सुविधा उपलब्ध कराने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है।

यद्यपि इस मॉडल का बहुदिशात्मक महत्व है लेकिन इसमें कुछ मूलभूत कमियां भी हैंए जैसे.

(1)  कौन सा उद्योग प्रणोदी तथा गुणक हैए इसका चयन अत्यधिक कठिन है।

(2)  वृद्धि धु्रव के विकास के लिए उद्यमियों का स्थानान्तरण एवं निवेश एक जटिल कार्य है।

(3)  ऐसे केन्द्र के विकास के लिए सरकारी नीतियों में स्पष्टता तथा लोच जरूरी है जो कि व्यवहारिक रूप में दिखाई नहीं देती है।

(4)  वृद्धि धु्रव के विकास से औद्योगीकरणए शहरीकरण के विकास के फलस्वरूप अत्यधिक जनसंख्या का संकेन्द्रण होता हैए फलतः विनियोजित नगरीकरण, अनावश्यक जनसंख्या का पलायन तथा प्रदूषण जैसी समस्याएं उत्पन्न होती हैं।

(5)  सेज जैसे वृद्धि धु्रव के कारण भारत जैसे देश में कई प्रकार की सामाजिक एवं राजनीतिक समस्याएं उत्पन्न हुई है।

उपरोक्त कमियों के बावजूद विश्व में अनेक राष्ट्र औद्योगिक विकास के लिए इसी आधार पर नीति निर्धारण कर रहे हैं।

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