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प्रवालभित्ति विरेचन की घटनाएं बढ़ना चिंताजनक

समुद्री सतह के तापमान बढ़ने, सौर्य विकिरण, गाद जमा होने, जेनोबाइटिक्स, उपवायव (सबएरियल) प्रकटीकरण, अकार्बनिक पोषक तत्वों, मीठे जल के सम्पर्क के कारण जल की सान्द्रता कम होने, एपिजूटिक्स सहित प्रवाल पर्यावरण में मानव जनित और प्राकृतिक परिवर्तनों के कारण प्रवालभित्ति का विरेचन होता है। विगत 30 वर्षों के दौरान प्रवाल विरेचन की घटना  में होने व्यापकता और बारम्बारता दोनों की दृष्टि से वृद्धि हुई है। प्रवाल विरेचन की घटना की वृद्धि में पृथ्वी पर जलवायु परिवर्तन की भूमिका होती है और इसके कारण बड़े प्रवाल क्षेत्रों का विनाश हो सकता है तथा बहुत सारी प्रवाल प्रजातियां लुप्त हो सकती हैं। सामान्य भाषा में प्रवाल को मूंगा कहा जाता है।

1980 तक, प्रवाल विरेचन की घटना का केवल एक बार अभिलेख मिलता है जो फ्लोरा हरिकेन के कारण आने वाली बाढ़ के कारण हुआ था जिसके परिणामस्वरूप पानी का खारापन काफी कम हो गया था तथा प्रवाल विरेचन होने के कारण जमैका में प्रवाल नष्ट हो गये थे। 1982.83 में एलनिनो के प्रभाव के कारण बड़े पैमाने पर हुई प्रवाल विरेचन  की घटना को पनामा के प्रशान्त तटीय भाग में पहली बार देखा गया था जिसमें 99 प्रतिशत से अधिक प्रवाल नष्ट हो गये थे तथा गैलापागोस द्वीप में प्रवाल संरचना का पूर्ण विनाश हो गया था और पनामा में 50 प्रतिशत प्रवाल नष्ट हो गये थे। समुद्र के तापमान में होने वाले सूक्ष्म परिवर्तनों के प्रति भी प्रवालों की संवेदनशीलता शोधकर्ताओं के लिये भारी चिंता के कारण बन गयी क्योंकि पृथ्वी का तापमान और अधिक बढ़ने की भविष्यवाणी की गई थी तथा आगे एलनिनो की घटनायें भी सामने आने लगी। 1997.98 में आये एलनिनो का अब तक का सबसे भारी प्रभाव रहा है। जिसके कारण पूरे विश्व में प्रवाल विरेचन की घटना में अभूतपूर्व  वृद्धि हुई और प्रवाल भारी मात्रा में नष्ट हो गये।

प्रवाल विरेचन की घटना
प्रवाल विरेचन की घटना के कारण प्रवाल  विरेचन की घटना सामान्य तौर पर दबाव के कारण होती है जिसके एक या कई कारण होते हैं। इसलिये स्पष्ट तौर पर विरेचन के किसी एक कारण की पहचान करना कठिन होता है लेकिन फिर भी कुछेक कारणों की पहचान की जा सकती है जो प्रवाल विरेचन की घटना को अंजाम देते हैं।

तापमान
प्रवाल प्रजातियां अपेक्षाकृत कम तापमान वाले क्षेत्र में रहती हैं। समुद्र का तापमान असमान रूप से कम या अधिक होने से प्रवाल विरेचन की घटना हो सकती है। तापमान में अचानक कमी हो जाने से तथा उसके बाद जलस्तर बढ़ जाने तथा मौसम ठंडा हो जाने के परिणामस्वरूप प्रवाल विरेचन हो सकता है।

सौर्य विकिरण
गर्मी के महीनों मेंए मौसम का तापमान बढ़ने के दौरान विकिरण अधिकतम होने के कारण अक्सर उथले जल में रहने वाले प्रवालों में और उन क्षेत्रों में अवस्थित प्रवालों जिन पर विकिरण का कहीं अधिक प्रभाव पड़ता है, पर कहीं अधिक प्रवाल विरेचन की घटना होती है। प्रकाश संश्लेषणीय दृष्टि से सक्रिय विकिरण तथा अल्ट्रावॉयलेट विकिरण दोनों ही प्रवाल विरेचन के कारण बनते हैं।

उपवायवीय उदभासन (सबएरियल एक्सपोजर)
समुद्री ज्वारभाटा का उफान बिल्कुल कम हो जाने, समुद्री स्तर के नीचे गिरने या विवर्तनकारी उठान होने जैसी घटनाओं के दौरान वायुमण्डल के अचानक सम्पर्क में भित्ति पर सपाट पड़े प्रवालों के आ जाने से प्रवाल विरेचन की घटना होने की संभावना बढ़ जाती है। तापमान अधिक या कम होनेए सौर्य विकिरण अधिक होनेए समुद्र सूखने और भारी वर्षा के समुद्री जल की सान्द्रता कम होने से जुक्सैनथेले नष्ट होते हैं जिससे प्रवाल मर जाते हैं।

गाद जमा होना
प्रवाल विरेचन की घटना में कुछेक घटनाओं को समुद्र में गाद भरने से भी जोड़ा जा सकता है। ऐसा संभव है किन्तु यह देखने में नहीं आया है कि गाद भरने के कारण जुक्सैनथेलेट प्रजातियों में विरेचन की घटनायें हुई हो।

मीठे जल के कारण समुद्री जल की सान्द्रता कम होना
तूफान के कारण होने वाले अवक्षेपण और पानी बहकर आने से प्रवालभित्ति जल की सान्द्रता काफी कम हो सकती है जिससे प्रवाल विरेचन की घटना हो सकती है। आमतौर पर प्रवाल विरेचन की ऐसी घटनायें काफी कम देखने को मिलती हैं और ये घटनायें अपेक्षाकृत छोटे स्तरए समुद्री तट तक ही सीमित होती हैं।

अकार्बनिक पोषक तत्व
इनके कारण प्रवाल विरेचन होने की बजाय परिवेशी पोषक तत्वों के सान्द्रण (अमोनिया और नाइट्रेट) बढ़ने से वस्तुतः जुक्सैनथेले के घनत्व में 2 से 3 गुना वृद्धि हो जाती है। यद्यपि युट्रोफिकेशन का शैवाल नष्ट होने से सीधा संबंध नहीं हैए फिर भी इसका अन्य प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है जैसे कि प्रवाल की प्रतिरोधकता कम हो जाना और उसका रोगग्रस्त हो जाना आदि।

जेनोबायोटिक्स
तॉंबाए शाकनाशियों और तेल जैसे विभिन्न रासायनिक प्रदूषकों के सम्पर्क में प्रवालों के आने से जुक्सैनथेले नष्ट होते हैं। चूंकि जेनोबायोटिक्स के उच्च सांद्रण से शैवाल नष्ट होते हैंए इसलिये ऐसे स्रोतों से होने वाले प्रवाल विरेचन का प्रभाव स्थानिक और अस्थायी होता है।

प्रवालभित्ति विरेचन की भौगोलिक और अस्थायी श्रेणी
1870 के बाद से सभी प्रमुख प्रवालभित्ति क्षेत्रों में प्रवालभित्ति पारिस्थितिकी प्रणाली में बड़े पैमाने पर प्रवालों के मरने की घटनायें सामने आती रही हैं। 1970 के बाद से प्रवाल विरेचन की घटना की व्यापकता एवं बारम्बारता नाटकीय रूप से बढ़ी है। इसका एक कारण संभवतः यह है कि हाल के वर्षों में इन घटनाओं के प्रेक्षण अधिक हुये हैं तथा इस मामले को सामने लाने में रूचि बढ़ी है। 1979 और 1990 के बीच बड़े पैमाने पर प्रवालों के मरने की 105 घटनाओं में 60 से अधिक बार प्रवाल विरेचन का प्रभाव पाया गया है और इसकी तुलना में इसके पूर्व के 103 वर्षों के दौरान 63 बार बड़े पैमाने पर प्रवालों के मरने की घटनायें हुई हैं जिनमें केवल 3 बार प्रवाल विरेचन के कारण यह विनाश हुआ था। 1980 के दौरान विश्व के लगभग सभी प्रमुख प्रवालभित्ति क्षेत्रों – कैरेबियाई पश्चिमी अटलांटिक महासागरए पूर्वी प्रशान्त, मध्य और पश्चिमी प्रशान्त महासागर, हिंद महासागर, अरब की खाड़ी, लाल सागर में प्रवाल विरेचन की घटना और प्रवालों के मरने की घटना हुई थीं।

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