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भारतीय महासागर के ऊपर चक्रवात निर्माण की दशा

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात निम्न दबाव के ऐसे गहन सिस्टम होते हैं जहाँ सतह संचरण सिस्टम में पवन गति 33 नॉटिकल मील प्रति घंटे से अधिक हो जाती है। उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर निम्न दबाव के सिस्टमों को सतह स्तर पर उनसे जुड़ी अधिकतम सतत सतह पवन के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है। दबाव एवं इससे अधिक गहनता वाले सिस्टमों को चक्रवाती – विक्षोभ माना जाता है। ‘चक्रवात‘ 34 नॉट अथवा इससे अधिकतम सतह पवन वाले निम्न दबाव सिस्टम से जुड़ा एक जातिगत शब्द है। यह प्रशांत एवं अटलांटिक जैसी अन्य महासागर द्रोणियों के ऊपर उष्ण कटिबंधीय तूफानों की परिभाषा के अनुरूप है। उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर प्रचंड चक्रवाती तूफानों के सदृश इन द्रोणियों के ऊपर अधिकतम सतह पवन गति 64 नॉट या अधिक हो जाने पर इन्हें उष्ण कटिबंधीय चक्रवात अथवा प्रचंड तूफान कहते हैं।

उत्तर भारतीय महासागर के चक्रवातों पर जलवायु वैज्ञानिक अभिलेखों को अद्यतन करने के लिए भारत मौसम विभाग द्वारा अनेक प्रयास किए गए हैं क्योंकि यह तटीय इलाकों से संबंधित पूर्व चेतावनी एवं आयोजना पर उपयोगी मार्गदर्शन प्रदान करता है।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवातों की आवृत्ति

अब यह जलवायु विज्ञान का एक सर्वविदित तथ्य है कि मानसून पूर्व मौसम (मार्च, अप्रैल, मई) और मानसून बाद मौसम (अक्तूबर, नवम्बर, दिसम्बर) के दौरान उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर वर्ष में लगभग 5-6 चक्रवात आते ही हैं (भारत मौसम विज्ञान, 2008)। यह विश्वभर में आने वाले चक्रवातों का लगभग 7 प्रतिशत है। बंगाल की खाड़ी तथा अरब सागर के ऊपर चक्रवात निर्माण का अनुपात 4ः1 है।

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का आगे बढ़ना

उष्ण कटिबंधीय चक्रवात सामान्यतः पूर्वोत्तर दिशा में आगे बढ़ते हैं। तथापि, पर्यावरणिक परिस्थितियों के अनुसार वे कभी-कभी पीछे की ओर भी मुड़ सकते हैं। बंगाल की खाड़ी का चक्रवात प्रायः ओडिशा – पश्चिम बंगाल तट को अक्तूबर में, आंध्र के तट को नवम्बर में तथा तमिलनाडु के तट को दिसम्बर में प्रभावित करता है। बंगाल की खाड़ी के 50 प्रतिशत से अधिक चक्रवात भारत के पूर्वी तट के विभिन्न भागों में आते हैं, 30 प्रतिशत चक्रवात बंग्लादेश, म्यांमार तथा श्रीलंका के तटों पर तथा लगभग 20 प्रतिशत स्वयं समुद्र के ही ऊपर समाप्त हो जाते हैं। अरब सागर के ऊपर बिखर जाने वाले चक्रवातों की प्रतिशतता उच्चतर (60 प्रतिशत) है क्योंकि पश्चिमी अरब सागर अपेक्षाकृत ठंडा है। चक्रवातों का अधिकतम स्थलावतरण भारतीय महासागर के गुजरात तट (अरब सागर में कुल चक्रवातों का 18 प्रतिशत) पर और उसके बाद ओमान तट पर होता है।

जीवनावधि

उत्तर भारतीय महासागर के ऊपर चक्रवात की जीवनावधि 5-6 दिन होती है। 6 दिन के वैश्विक औसत के मुकाबले इसकी बहुत भारी चक्रवाती तूफान (वीएससीएस) तीव्रता 2-3 दिनों तक रहती है। औसत चक्रवात की जीवनावधि का वर्णन कई चरणों में किया जाता है। इन चरणों का वास्तव में पृथक अस्तित्व नहीं होता बल्कि ये एक सतह प्रक्रिया का प्रतिनिधित्व करते हैं। अलग-अलग चरण किसी तूफान विशेष में जीवन चक्र के दौरान एक से अधिक बार भी घटित हो सकता है। किसी प्रारंभिक विक्षोभ अर्थात निम्न दबाव क्षेत्र के बनने से लेकर इसके डिप्रेशन, डीप डिप्रेशन और चक्रवाती तूफान तक में बदलना और अंततः इसका कमजोर पड़ना, उष्ण कटिबंधीय चक्रवात का जीवनचक्र है। जीवन चक्र को चार चरणों में विभाजित किया जा सकता है : निर्माण का चरण, अपरिपक्व चरण, परिपक्व चरण, कमजोर पड़ने का चरण।

निर्माण का चरण

चूंकि उष्ण कटिबंधीय चक्रवात की प्रकृति लगातार विकास की है, इसलिए भारतीय महासागर इसके जीवन चक्र के बिल्कुल प्रारंभिक चरणों से जुड़ी विशेषताएं परस्पर व्याप्त हो सकती हैं। निर्माण का चरण किसी विक्षोभ के एक परिपक्व चक्रवात के रूप में बदलने की अवधि है। इस प्रकार यह ऐसा चरण है जिसमें निम्न दबाव का प्रारंभिक विक्षोभ डिप्रेशन, डीप डिप्रेशन और अंततः चक्रवात में बदलता है। सतह पवन गति में वृद्धि के साथ दबाव धीरे-धीरे कम होता जाता है। इस चरण में, तूफान से जुड़े बादल और वर्षा बेतरतीब पैटर्न में होती है। पथ प्रेक्षित बादल समूहों का विकास भी इसी चरण में होता है। यह चरण कुछेक दिनों का होता है।

अपरिपक्व चरण

इस चरण में मुख्यतः 2 चीजें होती हैं :

  • चक्रवात के केंद्रीय क्षेत्र में दबाव में तेज गिरावट
  • सतह परिसंचरण में पवन की प्रबलता

इस चरण के समाप्त होते ही, तूफान से जुड़ा निम्नतम दबाव एवं प्रबलतम पवन शुरू हो जाती है। इस चरण में, पवन, बादल, वर्षण पैटर्न और संगठित हो जाते हैं। ये अंदर की ओर कुंडलित पट्टियों (बैंड्स) का निर्माण करते हैं। इस चरण की अवधि आधे से 2-3 दिन की होती है।

परिपक्व चरण

इस चरण में सिस्टम गहनता की कमोबेश स्थिर अवस्था प्राप्त कर लेता है। अब केंद्रीय दबाव में और गिरावट नहीं आती तथा सतह परिसंचरण में पवन की प्रबलता में वृद्धि नहीं होती। तथापि, परिसंचरण के क्षेत्र में वृद्धि होती है और सिस्टम का आकार सभी दिशाओं में क्षैतिज रूप से बढ़कर अपना अधिकतम आकार प्राप्त करता है। प्रबल पवन केंद्र से 200 मील दूर तक फैल जाती है। चरण में चक्रवात से जुड़ी परिसंचरण समरूपता पूरी तरह समाप्त हो जाती है तथा अधिकतम पवन एवं अधिकतम दबाव प्रवणता, उत्तरी गोलार्ध में चक्रवात के ठीक अगले क्षेत्र में संघनित हो जाती है। इस चरण की अवधि, निर्माण द्रोणी के आधार पर कुछ दिनों से लेकर एक सप्ताह तक होती है।

 

ह्रास का चरण

इस चरण के दौरान चक्रवात, भारतीय महासागर, पर्यावरण एवं वायुमंडल की स्थिति के अनुसार डीप डिप्रेशन, डिप्रेशन, निम्न के रूप में कमजोर पड़ जाता है तथा धीरे-धीरे अथवा तेजी से इसके लक्षण समाप्त हो जाते हैं। मुख्य रुप से वर्षण निम्नलिखित कारणों से होता है :

  • चक्रवात के स्थलावतरण के कारण सतह घर्षण में वृद्धि तथा नई आपूर्ति का रुकना।
  • चक्रवात का अपेक्षाकृत ठंडे जल वाले क्षेत्र में प्रवेश (260 सें. से नीचे)।
  • जब चक्रवात महासागर के उसी क्षेत्र में काफी लंबे समय तक रहता है तो समुद्री जल का ऊपरी 100 फीट मिश्रित होता रहता है और अपवेलिंग के कारण रुका हुआ ठंडा जल चक्रवात की तीव्रता को बढ़ा नहीं पाता है।
  • चक्रवात परिवेश के निचले स्तरों में ठंडी एवं शुष्क हवा के प्रवेश से परिसंचरण कमजोर पड़ता है।
  • जब चक्रवात में ऊर्ध्वाधर पवन दबाव के कारण संवहन एवं हीट इंजन केंद्र से दूर हटता है, इसमें आगे और वृद्धि नहीं होती।
  • बाहरी आई-वॉल का निर्माण होता है, (तूफान केंद्र से लगभग 50-100 मील दूर) जो भीतरी आई-वाल के भीतर संवहन को अवरुद्ध करता है। जब तक उपर्युक्त अन्य शर्तें पूरी न हों, ऐसा कमजोर पड़ना प्रायः अस्थायी होता है। यह भीतरी आई-वॉल के साथ मिल सकती है जिससे चक्रवात और सशक्त हो सकता है।

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