भूगोल और आप |

भारत का 15 प्रतिशत क्षेत्र भूस्खलन प्रभावित है

भूस्खलन एक गुरूत्व प्रेरित भूगर्भीय घटना है, जो मुख्यतः पहाड़ी भूभागों से जुड़ा हुआ है। हालांकि भूस्खलन की घटनाएं उन क्षेत्रों में भी हो सकती हैं, जहां राजमार्ग, भवनों और खुले मुँह वाले खदानों के लिए सतह की खुदाई जैसी गतिविधियों को अंजाम दिया जाता है। उथला भूस्खलन उन क्षेत्रों में हो सकता है, जहां निचले क्षेत्र में सरंध्र मृदाओं या विवर्त्त पड़ चुके चट्टानों की चोटी पर उच्च सरंध्र मृदाओं से युक्त ढालें होती हैं। अल्पावधि में अचानक और भारी वर्षा, जिसका स्वरूप अक्सर स्थानीय होता है, को बादल फटने की घटना कहा जाता है, के कारण कभी-कभी भूस्खलन हो सकता है। गहरे भूस्खलनों के मामले में आमतौर पर गहरे विघटित चट्टान या आधार शैल अन्तग्रस्त होता है और इसमें बढ़े ढालों की विफलता शामिल होती हैं। कुछ भूस्खलन तेजी से होते हैं, जो सेकेडों में घटित हो उठते हैं, जबकि कुछ भूस्खलन को घटने में घंटे, सप्ताह या उससे भी अधिक समय लग सकता है।

भूस्खलन प्राकृतिक आपदाओं में से एक है जो कम से कम 15 प्रतिशत भूक्षेत्र को प्रभावित करता है, इसका क्षेत्र 4,90,000 वर्ग किमी से अधिक है। विभिन्न प्रकार के भूस्खलन हिमालय, पूर्वोत्तर भारत और पश्चिमी घाटों तथा दक्षिणी घाटों तथा दक्षिणी भारत की नीलगिरी पहाड़ियों जैसे स्थिर क्षेत्रों में भी होते रहते हैं। पूर्वोत्तर क्षेत्र में अराकान योगा श्रृंखलाओं से बना लगभग 0.098 मिलियन वर्ग किमी. तथा हिमालय, नीलगिरि, रांची पठार और पूर्वी तथा पश्चिमी घाटों के 0.392 मिलियन किमी. क्षेत्र भूस्खलन से प्रभावित होते हैं। भूस्खलन के कभी-कभी संकटपूर्ण परिणाम होते हैं, भारत के विभिन्न भागों में 2005 में भूस्खलन के कारण 500 से अधिक लोग मारे गये थे। भूस्खलन संकट के विश्लेषण एवं मानचित्रण से त्रासदीपूर्ण नुकसान को कम करने हेतु उपयोगी जानकारी मिल सकती है तथा संपोषित भू-उपयोग आयोजन के लिए विकास हेतु दिशा-निर्देश तैयार करने में सहायता मिल सकती है।

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