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भूजल के स्तर में गिरावट रोकने के नियंत्रणकारी उपाय जरूरी

भूजल के अंधाधुंध निष्कासन से बहुत सी समस्याएं उभरकर आई हैं जैसे पंजाब के दक्षिण पश्चिम के भागों में जलस्तर में चढ़ाव के कारण जलभराव और खारापन की समस्या उत्पन्न हो गई है। इस क्षेत्र में भूजल का अत्यधिक निष्कासन किया जा रहा है। जलभराव ऑक्सीजन स्तर को कम करता है तथ जड़ों के आस पास कार्बन डायऑक्साइड के जमाव के कारण फसल की उत्पादकता कम होती जाती है। मिट्टी के तल में खारे तत्वों की जमावट के कारण रासायनिक अपकर्षक की समस्या पैदा होती है जिससे पर्यावरण में असंतुलन उत्पन्न हो जाता है। जल संसाधन मंत्रालय के एक कार्यकारी दल ने किसी क्षेत्र के लिए 1991 में जलभराव के लिए मिट्टी का खारापन और अल्काईन नियम बनाए थे। ‘‘उस क्षेत्र को जलभराव माना जाएगा जहां भूतल से 2 मीटर के अन्दर ही जल का स्तर पाया जाता है। वर्तमान में दक्षिण पश्चिम पंजाब के बहुत से भागों में जलभराव और मिट्टी का क्षरण है। पिछले दशक से इस मिट्टी पर कोई भी फसल नहीं उगाई है। पंजाब में जलभराव पर 2013 के योजना आयोग के उच्च स्तर विशेषज्ञ समूह की रिपोर्ट के अनुसार यह बातें सामने आई हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि उत्तरपश्चिम क्षेत्र में भूजल के स्तर में गिरावट का मुख्य कारण बढ़ती जल की मांग को पूरा करने में सार्वजनिक जल आपूर्तिकर्त्ताओं की असफलता है। इसके अतिरिक्त भारत में भूजल के प्रयोग को लेकर केन्द्रीय व राज्य स्तरों पर खंडित उत्तरदायित्व हैं। कागजों में तो केन्द्र सरकार नीति दिशा-निर्देश को तैयार करती है और सुरक्षा को लागू करती है, दूसरी ओर संबंधित राज्य भूजल भण्डारों पर अपना-अपना क्षेत्राधिकार का दावा करते हैं। वास्तव में भारत में भूजल का प्रयोग एक निजी गतिविधि है जिस पर नियंत्रण नहीं पाया जा सका है।

यद्यपि बढ़ते संकट को देखते हुए बहुत से कदम उठाए गए हैं, परन्तु नियंत्रणकारी उपायों की कमी स्पष्टतौर पर देखी जाती है। भूजल संसाधनों का तेजी से क्षरण हो रहा है, जल उपयोग करने वालों के बीच इसका प्रतिदिन बंटवारा हो रहा है, इसलिए सरकार को अपनी नींद से जागना होगा और सामने उपस्थित आपदा से निपटने के लिए ‘‘प्रभावकारी प्रबंधन योजनाओं’’ को व्यवहार में लाना होगा। बीती शताब्दी में मानसून के सामान्य व्यवहार के बाद निरंतर कई वर्ष सूखे के भी देखे गए थे। जहां तक दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र का प्रश्न है, अनियंत्रित शहरीकरण और आवासीय निर्माण के लिए गुड़गांव-हरियाणा में भूजल का भूसम्पति दलालों द्वारा अंधाधुंध प्रयोग करने से जल का स्तर बुरी तरह से नीचे आया है।

बहुत से लोगों को सुझाव है कि भूजल की कीमत निर्धारित की जानी चाहिए, परन्तु यह कोई आसान कार्य नहीं है। भूजल की कीमत का निर्धारण एक कठिन कार्य है और यह साझा संसाधन की कीमत को आंकना है। राष्ट्रीय जल नीति 2002 का सुझाव है कि (वित्तीय व भौतिक संपोषित के संदर्भ में) ‘‘इस बात की आवश्यकता है कि विभिन्न प्रकार से प्रयोग में लाए गए जल के लिए शुल्क इस तरह से निर्धारित किया जाए कि शुरू में सेवा उपलब्ध करने के लिए उसका रख रखाव और संचालन का खर्च और बाद में पूंजी लागत का अंश निकल आए।’’

यह सुझाव कीमत निर्धारित करने का एक आधार हो सकता है। भूजल की कीमत का अत्यधिक युक्तिपूर्ण तरीका इसके नियंत्रण का है। इससे अत्यधिक दोहन से बचा जा सकता है। भूजल के संरक्षण, सुरक्षा और नियमन के लिए 2011 का ड्राफ्ट मॉडल बिल सरकार के प्रत्यक्ष नियंत्रण में भूजल प्राधिकरण की स्थापना की बात करता है। इस प्राधिकरण को यह अधिकार होगा कि वह भूजल के प्रयोग के लिए नियमन हेतु यदि आवश्यक समझे तो क्षेत्रों का नामांकन भी कर सकता है। अंतिम निर्णय संबंधित राज्य सरकारें लेंगी। इस ड्राफ्ट बिल के अनुसार सरकार प्राथमिकता के आधार पर भूजल के अन्यायपूर्ण प्रयोग और वितरण का नियमन कर सकती है जिससे कि छोटे और भूमिहीन किसानों की सिंचाई सम्बंधी और प्रत्येक व्यक्ति हेतु पेयजल और घरेलू आवश्यकताओं के लिए पानी की आपूर्ति निश्चित की जा सके।

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