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मंगल ग्रह के धरातल के नीचे है द्रव जल से भरी झील

हाल के वैश्विक मानव अंतरिक्ष गतिविधियों का मुख्य केंद्र मंगल ग्रह  रहा है। इस पर अधिकाधिक मिशन भेजे जा रहे हैं या भविष्य में भेजन की तैयारी चल रही है। सरकारी तो सरकारी, निजी अंतरिक्ष एजेंसियों के लिए भी गतिविधि का मुख्य केंद्र मंगल ग्रह ही है। एलन मस्क की ंकंपनी स्पेश-एक्स ने हाल में ही फाल्कन हेवी का प्रक्षेपण किया और भविष्य में मंगल ग्रह पर मानव बस्ती बसाने की योजना पर काम कर रहे हैं। भारत भी अपने प्रथम प्रयास में ही इस ग्रह पर मंगलयान (मॉम) भेजने में सफल रहा।

आखिर कुछ तो है जो विश्व की अंतरिक्ष एजेंसियों को मंगल ग्रह की ओर खीचे ले जा रही है जिसके कारण वहां पहुंचने की अधिक प्रतिस्पर्धा हो रही है। दरअसल मंगल ग्रह पर पानी की मौजूदगी की संभावना अधिक दिख रही है जो जीवन को आधार प्रदान करता है। इसी क्रम में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के ‘मार्स एक्सप्रेस’ नामक उपग्रह (Mars Express)  के रडार उपकरण से संग्रहित डेटा के आधार पर इटालियन वैज्ञानिकों ने मंगल ग्रह के धरातल के नीचे पानी से भरे झील की मौजूदगी की पुष्टि की है। वैज्ञानिकों के मुताबिक यह झील मंगल के दक्षिणी ध्रुव में (प्लेनम ऑस्ट्राले) धरातल के नीचे लगभग एक मील नीचे है और यह 12 मील में फैली है। यह झील लवणीय व द्रवित जल की है। साइंस पत्रिका में प्रकाशित इस शोध रिपोर्ट के लेखकों के अनुसार मंगल ग्रह पर ऐसे समान क्षेत्र भी हैं जो इस बात का संकेते देते हैं कि द्रवित झील अकेली नहीं है।

मार्स एक्सप्रेस में ‘मार्सिस (MARSIS Mars Advanced Radar for Subsurface and Ionosphere Sounding) उपकरण लगा हुआ है  जिससे रेडियो तरंगे छोड़ गईं। कुछ तरंगे जहां परवर्तित होकर वापस आ गईं तो कुछ तरंगे मंगल के धरातल के नीचे तक पहुंचने में सफल रही। वहीं से मार्सिस की ओर परावर्तित होने से पूर्व धरातल के नीचे के चट्टानों, तलछटों एवं पानी से भी वह टकाराया। मई 2012 से दिसंबर 2015 के बीच प्लेनम ऑस्ट्राले (मंगल का दक्षिणी ध्रुव) क्षेत्र का 29 भिन्न रडार स्कैन किया गया जिससे वहां जल की मौजूदगी का पता चला। इसमें डाइलेक्ट्रिक पर्मिटिविटी (परावर्तित रेडियो तरंगों का बल) के मापन ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। जहां पर पानी की यह झील प्राप्त हुयी है उससे ऊपर का तापमान -68 डिग्री सेल्सियस है  जो कि जल के हिमांक बिंदु से काफी नीचे है। ऐसे में झील के पानी को बर्फ में होना चाहिए था। परंतु उच्च दबाव व लवण की मौजूदगी इस द्रव रूप में बनाए हुए है।

वैसे यदि मंगल ग्रह पर झील की मौजूदगी की पूर्ण पुष्टि हो जाती है तो इससे कई सवालों का जवाब मिल सकता है। मसलन् मंगल ग्रह पर पूर्व में मौजूद महासागर कहां चले गए। इसके अलावा भावी मानव बस्तियों का यह स्रोत भी उपलब्ध कर सकता है तथा पृथ्वी से परे जीवन की मौजूदगी की संभावना को और बल प्रदान कर सकता है।

हालांकि कुछ वैज्ञानिक अभी भी निर्णायक तौर पर यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि जिसे मंगल पर झील बताया जा रहा हो, वह वास्तव में झील ही है। आखिरकार, नासा का मार्स रिकॉनेसांस ऑर्बिटर  2006 से ही मंगल ग्रह का चक्कर लगा रहा है और उसके पास भी मार्स एक्सप्रेस की तरह के ही उपकरण हैं, इसके बावजूद इसे उप-धरातल में ऐसे किसी जल निकाय के छिपे होने के प्रमाण प्राप्त नहीं हुए हैं। वहीं कुछ वैज्ञानिक अनुमान लगा रहे हैं कि यदि मान ली लिया जाये कि यह द्रव जल वाली झील है तो भी वह जीवन को आधार प्रदान नहीं कर सकती। ऐसा इसलिए कि इतने कम तापमान में लवण की अत्यधिक सांद्रता ही पानी को जमने से रोके हुए है। लवण की अत्यधिक सांद्रता जीवन के अनुकूल नहीं हैं।

वैसे मंगल ग्रह पर कभी जल के सोते बहा करती थी। इसके चिह्न आज भी मंगल ग्रह के धरातल पर मौजूद हैं। परंतु मंगल ग्रह के 4.6 अरब वर्षों के इतिहास में वहां की जलवायु बहुत परिवर्तित हो चुका है जिस कारण धरातल पर पानी की मौजूदगी संभव नहीं है। इसलिए वैज्ञानिक अब धरातल के नीचे इसकी संभावना तलाश रहे हैं।

मार्स एक्सप्रेस

मार्स एक्सप्रेस यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी का मंगल मिशन है जिसे 2 जून, 2003 को प्रक्षेपित किया गया था। इसमें लगा मार्सिस उपकरण इटालियन स्पेश एजेंसी व नासा द्वारा वित्त पोषित है तथा इसका विकास यूनिवर्सिटी ऑफ रोम व नासा के जेट प्रोपल्शन प्रयोगशाला ने किया है।

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