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मनुष्य व पर्यावरण अवनयन – विकास से विनाश की ओर

मनुष्य व पर्यावरण एक दूसरे को प्रभावित करते हैं। मनुष्य व पर्यावरण को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं, किन्तु उनमें तीन उल्लेखनीय हैं। प्रथम, जैवभौतिक सीमाओं द्वारा (Biophysical limitations), द्वितीय – आचारपरक नियंत्रणों द्वारा (Behavioural controls) तथा संसाधन की सुलभता द्वारा।

जैवभौतिक सीमाओं में जलवायु का नियंत्रण सबसे महत्वपूर्ण है। जैविकीय दृष्टि से मानव शरीर सभी जलवायु दशाओं में कार्य करने में सक्षम नहीं होता बल्कि कुछ निश्चित पर्यावरणीय दशाओं में ही यह सुचारू रूप से क्रियाशील हो सकता है जैसे अत्यधिक ऊँचाई पर ऑक्सीजन की कमी के कारण मनुष्य जीवित नहीं रह सकता। इसी प्रकार अत्यधिक ऊष्मा तथा आर्द्रता मनुष्य के शारीरिक तथा मानसिक वृद्धि में बाधक होते हैं। जलवायु दशायें अप्रत्यक्ष रूप से भी मनुष्य व पर्यावरण पर प्रभाव डालती हैं। जैसे अत्यधिक या न्यूनतम तापमान तथा वर्षा के कारण खाद्यान्न् फसलें उगाना सम्भव नहीं होता, जिससे मानव जीवन प्रभावित होता है।

विभिन्न वायुमंडलीय दशाओं में विभिन्न प्रकार के रोग होते हैं जो मनुष्य को प्रतिकूल रूप से प्रभावित करते हैं जैसे स्विटजरलैंड में शरद ऋतु में लोहित ज्वर, पीलिया तथा डिपथेरिया आदि रोगों का प्रभाव देखा जाता है जबकि वसंत ऋतु में छोटी चेचक तथा इन्फलुएंजा अधिक होते हैं।

भौतिक पर्यावरण मानव जीवन के अन्य क्षेत्रों पर भी प्रभाव डालता है। अनगिनत शोधों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भौतिक पर्यावरण मानव के विचारों तथा चिंतन, विचाराधाओं तथा संस्कृति एवं व्यवहार को भी प्रभावित करते हैं। उदाहरणस्वरूप बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में मनुष्य में यह धारणा होती है कि नदियाँ सदा विनाश की स्रोत होती हैं। ठीक इसके विपरीत जल संकट क्षेत्रों में नदियाँ जीवनदायिनी समझी जाती हैं।

संसाधन की उपलब्धता या दुर्लब्ध्ता मुख्य रूप से पर्यावरण पर निर्भर करती है। विभिन्न पर्यावरणीय दशाओं में विभिन्न प्रकार के संसाधन पाये जाते हैं जो मनुष्य के कार्यकलाप को प्रभावित करते हैं। उदाहरणस्वरूप मध्यपूर्व में तेल का अपार भण्डार है तो छोटानागपुर का पठारी क्षेत्र धात्विक खनिज संसाधन के लिए प्रसिद्ध है।

मनुष्य सभी प्राणियों में शारीरिक तथा मानसिक स्तर पर सर्वाधिक विकसित प्राणी है। मनुष्य भौतिक पर्यावरण को सबसे अधिक प्रभावित करता है। इस संदर्भ में मनुष्य की भूमिका दो प्रकार की होती है। एक तरफ मनुष्य अपने हित के लिए केवल पर्यावरण का शोषण करता है तो दूसरी तरफ शोषण के साथ-साथ पर्यावरणीय संसाधनों में योगदान भी करता है।

यदि काल परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो यह स्पष्ट होता है कि मनुष्य व पर्यावरण संबंध सदैव एक जैसा नहीं रहा है। यदि मानव मूलतः भौतिक मानव था। अपने भोजन की आपूर्ति के लिए पूर्णतः भौतिक वातावरण पर आश्रित था। जंगल से फलफूल तथा कन्दमूल प्राप्त कर अपना जीवन व्यतीत करता था। मानव गतिविधियों से पर्यावरण को किसी भी प्रकार से हानि नहीं पहुंचती थी। यद्यपि मनुष्य विस्तृत पैमाने पर प्राकृतिक संसाधन का प्रयोग करने लगा था, किन्तु अभी भी पर्यावरण पूर्णतः सुरक्षित था। धीरे-धीरे मनुष्य के ज्ञान में वृद्धि होने लगी और मनुष्य स्थायी आवास में रहने लगा। स्थायी आवास की परिकल्पना ने सामूहिक जीवन पद्धति को जन्म दिया। अब मनुष्य सामूहिक रूप से प्रकृति को अपने नियंत्रण में करने के लिए उत्प्रेरित हुआ। समय के साथ-साथ कृषि क्षेत्र, उत्पादकता तथा कृषि तकनीक का विकास हुआ बल्कि जनसंख्या में भी काफी वृद्धि हुई। जनसंख्या में वृद्धि के कारण पर्यावरण शोषण में तीव्र वृद्धि हुई और पर्यावरण विदोहन का सिलसिला आरंभ हो गया। किन्तु मनुष्य व पर्यावरण को सबसे अधिक क्षति ‘औद्योगीकरण काल’ के अभ्युदय से हुई।

इस काल के प्रारंभ में ‘आर्थिक निश्चयवाद’ जैसी अतिवादी संकल्पना को काफी बल मिला। प्रौद्योगिकी उन्नत देशों (Technology development countries) के लोगों में घोर भौतिकवादी दृष्टिकोण विकसित होने के कारण प्राकृतिक संसाधनों का औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण के लिए अविवेकपूर्ण एवं धुआंधार विदोहन एवं उपभोग प्रारंभ हो गया। फलतः अनेक भयावह तथा जानलेवा पर्यावरणीय  समस्याओं का प्रादुर्भाव हुआ। आज जिस स्तर पर पर्यावरण का शोषण एवं विदोहन हो रहा है उससे मनुष्य व पर्यावरण के मध्य संबंध काफी जटिल हो गया है। जहां एक ओर पर्यावरण संरक्षण के प्रति जनचेतना का स्तर काफी कम है वहीं दूसरी ओर पर्यावरण विदोहन का प्रभाव मनुष्य पर स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगा है।

संक्षेप में यह उल्लेखित किया जा सकता है कि औद्योगिक क्रान्ति के बाद मानव व पर्यावरण संबंध में गुणात्मक परिवर्तन हुआ है। पर्यावरण विदोहन अपनी चरमसीमा पर पहुंच गया है। प्राकृतिक पर्यावरण की अंतःनिर्मित स्वयं नियामक प्रक्रिया (Inbuilt self regulatory machanism) जो कि पर्यावरण की बाहरी परिवर्तनों को आत्मसात करने की क्षमता होती है, काफी दुर्बल हो गई है। इस काल में पर्यावरण विदोहन के कारणों में तीव्र जनसंख्या वृद्धि, नगरीकरण, औद्योगीकरण, तकनीकी विकास, भौतिकवाद आदि प्रमुख हैं। पर्यावरण अवनयन के दुष्परिणामों में वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, ध्वनि प्रदूषण, मृदा प्रदूषण, भूमण्डलीय ताप में वृद्धि, चरम घटनाएं, प्राकृतिक प्रकोप तथा विनाश जैसे भूकम्प, बाढ़ तथा सूखा, चक्रवात आदि उल्लेखनीय हैं। मनुष्य अब पर्यावरण अवनयन का मूल्य चुका रहा है।

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