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विविध प्रकार से लाभदायक है कपास की खेती

कपास विश्व की सबसे प्रमुख, प्राचीन तथा व्यावसायिक रेशेदार फसल है। भारत में कपास का उपयोग 1800 बी. सी. से किया जा रहा है। कपास की खेती सूती वस्त्र उद्योग का आधार है। वनस्पति, पशु-चर्म तथा कृत्रिम रेशे से तैयार कुल वस्त्रों का आधा से अधिक भाग कपास के रेशे से तैयार किया जाता है।

कपास ‘‘मालवेसी’’ कुल के अंतर्गत आता है, जो प्राकृतिक रूप में एक बहुवर्षीय झाड़ी है। जबकि व्यावसायिक फसल के रूप में यह वार्षिक झाड़ी है। कपास की खेती खरीफ फसल के अंतर्गत होती है जो जुलाई में बो कर अक्टूबर में काटी जाती है। इसकी शाखाएँ 4 से 8 फीट तक लम्बी होती हैं। इसके बिनौले (फल) पाँच से छः महीने में पककर तैयार हो जाते हैं। इसके बीज के ऊपर लगे रेशे ही व्यावसायिक दृष्टिकोण से उपयोगी होते हैं। कपास में मुख्यतः पर-परागण होता है। इसके फल संपुट प्रकार के होते हैं जो पकने के बाद पीठ के मध्यभाग से फटते हैं। इसके बीज स्तंभी बीजाण्डन्यास पर लगे होते हैं। जब इसके फल फटते हैं तो इनमें रोएं के समान कुछ रचनाएँ बीज के ऊपर लगी रहती हैं। इन्हें ‘‘कोमा’’ कहते हैं। ये बीज को उड़ाने में पैराशूट की भांति कार्य करते हैं। बीजों का प्रकीर्णन हवा द्वारा होता है। लम्बे रेशेवाली कपास का कपड़ा टिकाऊ तथा उत्तम कोटि का होता है। वैसे तो कपास की सैंकड़ों किस्मों की खोज की जा चुकी है, किन्तु व्यावसायिक दृष्टिकोण से कपास की खेती में चार किस्में बहुत उपयोगी हैं। ये निम्नलिखित हैं :

गोशिपीयम बारबेडॅन्स

यह मूलतः दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र की कपास है। इसके फूल चमकीले पीले रंग के होते हैं जिसकी पंखुड़ियों पर बैंगनी रंग की छीटें होती हैं। इसको समुद्र-द्वीपीय कपास भी कहा जाता है। एक दूसरे प्रकार की समुद्र-द्वीपीय कपास के रेशे की लम्बाई 2 इंच या इससे अधिक होती है। इस प्रकार की कपास सर्वप्रथम संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सन 1785 ई0 में वेस्ट इंडीज़ से लायी गयी। इसका रेशा महीन, मजबूत तथा हल्के रंग का होता है। इससे महीन वस्त्र, सूत, लेस आदि तैयार किये जाते हैं। इस प्रजाति के अंतर्गत दूसरी कोटि की कपास भी आती है जिसको मिस्री कपास कहा जाता है। इस प्रकार की कपास संकरण के द्वारा उत्पन्न की गयी। इसका रेशा भूरे रंग का होता है जिसका उपयोग धागा, अन्डरवियर, मोज़ा, टायर, इत्यादि बनाने में होता है। इसकी व्यवसायिक खेती कैलिफोर्निया, मेक्सिको तथा अरिजोना में की जा रही है। चूँकि कपास की खेती सर्वप्रथम अरिजोना के पीमा जिले में की गयी थी इसलिए इसको ‘‘पीमा कपास’’ भी कहा जाता है। पिछले कुछ वर्षों से समुद्र-द्वीपीय कपास के फल में घुन लगने के कारण पीमा कपास की खेती लगभग बंद हो गयी है।

गोशिपीयम हिरस्यूटॅम

कपास की खेती में उपयोग की जाने वाली यह प्रजाति मूलतः अमेरिका से संबंध रखती है तथा इसको प्रायः उच्च-भूमिय कपास कहा जाता है। गोशिपीयम हिरस्यूटॅम संकरण का फल है जो गोशिपीयम हरबैशिकम तथा गोशिपीयम राइमोन्डी के बीच क्रास करने से उत्पन्न हुआ। इसमें कुल 26 जोड़ा क्रोमोजोम होता है, 13 जोड़ा छोटे क्रोमोजोम गोशिपीयम हरबैशिकम तथा 13 जोड़ा बड़े क्रोमोजोम गोशिपीयम राइमोन्डी। अतः असमान क्रोमोजोम के कारण यह एलोपोलीप्लोइडी का उदाहरण है। आसानी से उगने वाला तथा कम खर्चीला होने के कारण विश्व में इसकी उपज सर्वाधिक है। आज इस प्रजाति की 200 से ज्यादा उपजातियाँ हैं जो नित्य नये प्रयोगों के परिणाम हैं। इसके फूल सफेद या हल्के पीले रंग के होते हैं। इसके रेशे सफेद तथा अधिक लम्बे 1.5 से 3.5 सेन्टीमीटर तक होते हैं। भारत में इसकी खेती, कपास की खेती के कुल क्षेत्रफल में से 50 प्रतिशत क्षेत्र में की जाती है।

गोशिपीयम एरबॉरियम

इस बहुवर्षीय कपास की प्रजाति का व्यावसायिक उत्पादन भारत, अरब देशों तथा अफ्रीका में किया जाता है। भारत में कपास के कुल क्षेत्र में से 29 प्रतिशत में इसकी खेती की जाती है। इसका रेशा मोटा, छोटा तथा अधिक मजबूत होता है। इसके रेशे की लम्बाई 1.0 से 1.9 सेन्टीमीटर होती है। इससे दरी तथा मोटे वस्त्र तैयार किए जाते हैं। हथकरघा उद्योग में भी इसी कपास का उपयोग किया जाता है।

गोशिपीयम हरबैशियम

यह एशियाई देशों की प्रमुख कपास है, जो अमेरिका में नहीं पायी जाती है। भारत में यह प्राचीन काल से उगायी जा रही है। ईरान, चीन, जापान इत्यादि देशों में इसकी खेती घरेलू आवश्यकता की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर की जाती है। भारत में कुल क्षेत्र में से 21 प्रतिशत क्षेत्र में इस प्रजाति की कपास की खेती की जाती है। इसका रेशा ऊन के समान मजबूत तथा खुरदुरा होता है। ऊन के साथ मिलाकर कपड़ा तैयार करने में यह बहुत उपयोगी होता है। इससे निम्न गुणवत्ता वाले कपड़े, कम्बल तथा कारपेट तैयार किए जाते हैं।

कपास विश्व की सबसे प्रमुख, प्राचीन तथा व्यावसायिक रेशेदार फसल है। भारत में कपास का उपयोग 1800 बी. सी. से किया जा रहा है। कपास की खेती सूती वस्त्र उद्योग का आधार है। वनस्पति, पशु-चर्म तथा कृत्रिम रेशे से तैयार कुल वस्त्रों का आधा से अधिक भाग कपास के रेशे से तैयार किया जाता है।

कपास ‘‘मालवेसी’’ कुल के अंतर्गत आता है, जो प्राकृतिक रूप में एक बहुवर्षीय झाड़ी है। जबकि व्यावसायिक फसल के रूप में यह वार्षिक झाड़ी है। कपास की खेती खरीफ फसल के अंतर्गत होती है जो जुलाई में बो कर अक्टूबर में काटी जाती है। इसकी शाखाएँ 4 से 8 फीट तक लम्बी होती हैं। इसके बिनौले (फल) पाँच से छः महीने में पककर तैयार हो जाते हैं। इसके बीज के ऊपर लगे रेशे ही व्यावसायिक दृष्टिकोण से उपयोगी होते हैं। कपास में मुख्यतः पर-परागण होता है। इसके फल संपुट प्रकार के होते हैं जो पकने के बाद पीठ के मध्यभाग से फटते हैं। इसके बीज स्तंभी बीजाण्डन्यास पर लगे होते हैं। जब इसके फल फटते हैं तो इनमें रोएं के समान कुछ रचनाएँ बीज के ऊपर लगी रहती हैं। इन्हें ‘‘कोमा’’ कहते हैं। ये बीज को उड़ाने में पैराशूट की भांति कार्य करते हैं। बीजों का प्रकीर्णन हवा द्वारा होता है। लम्बे रेशेवाली कपास का कपड़ा टिकाऊ तथा उत्तम कोटि का होता है। वैसे तो कपास की सैंकड़ों किस्मों की खोज की जा चुकी है, किन्तु व्यावसायिक दृष्टिकोण से कपास की खेती में चार किस्में बहुत उपयोगी हैं। ये निम्नलिखित हैं :

गोशिपीयम बारबेडॅन्स

यह मूलतः दक्षिण अमेरिका के उष्णकटिबन्धीय क्षेत्र की कपास है। इसके फूल चमकीले पीले रंग के होते हैं जिसकी पंखुड़ियों पर बैंगनी रंग की छीटें होती हैं। इसको समुद्र-द्वीपीय कपास भी कहा जाता है। एक दूसरे प्रकार की समुद्र-द्वीपीय कपास के रेशे की लम्बाई 2 इंच या इससे अधिक होती है। इस प्रकार की कपास सर्वप्रथम संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा सन 1785 ई0 में वेस्ट इंडीज़ से लायी गयी। इसका रेशा महीन, मजबूत तथा हल्के रंग का होता है। इससे महीन वस्त्र, सूत, लेस आदि तैयार किये जाते हैं। इस प्रजाति के अंतर्गत दूसरी कोटि की कपास भी आती है जिसको मिस्री कपास कहा जाता है। इस प्रकार की कपास संकरण के द्वारा उत्पन्न की गयी। इसका रेशा भूरे रंग का होता है जिसका उपयोग धागा, अन्डरवियर, मोज़ा, टायर, इत्यादि बनाने में होता है। इसकी व्यवसायिक खेती कैलिफोर्निया, मेक्सिको तथा अरिजोना में की जा रही है। चूँकि कपास की खेती सर्वप्रथम अरिजोना के पीमा जिले में की गयी थी इसलिए इसको ‘‘पीमा कपास’’ भी कहा जाता है। पिछले कुछ वर्षों से समुद्र-द्वीपीय कपास के फल में घुन लगने के कारण पीमा कपास की खेती लगभग बंद हो गयी है।

गोशिपीयम हिरस्यूटॅम

कपास की खेती में उपयोग की जाने वाली यह प्रजाति मूलतः अमेरिका से संबंध रखती है तथा इसको प्रायः उच्च-भूमिय कपास कहा जाता है। गोशिपीयम हिरस्यूटॅम संकरण का फल है जो गोशिपीयम हरबैशिकम तथा गोशिपीयम राइमोन्डी के बीच क्रास करने से उत्पन्न हुआ। इसमें कुल 26 जोड़ा क्रोमोजोम होता है, 13 जोड़ा छोटे क्रोमोजोम गोशिपीयम हरबैशिकम तथा 13 जोड़ा बड़े क्रोमोजोम गोशिपीयम राइमोन्डी। अतः असमान क्रोमोजोम के कारण यह एलोपोलीप्लोइडी का उदाहरण है। आसानी से उगने वाला तथा कम खर्चीला होने के कारण विश्व में इसकी उपज सर्वाधिक है। आज इस प्रजाति की 200 से ज्यादा उपजातियाँ हैं जो नित्य नये प्रयोगों के परिणाम हैं। इसके फूल सफेद या हल्के पीले रंग के होते हैं। इसके रेशे सफेद तथा अधिक लम्बे 1.5 से 3.5 सेन्टीमीटर तक होते हैं। भारत में इसकी खेती, कपास की खेती के कुल क्षेत्रफल में से 50 प्रतिशत क्षेत्र में की जाती है।

गोशिपीयम एरबॉरियम

इस बहुवर्षीय कपास की प्रजाति का व्यावसायिक उत्पादन भारत, अरब देशों तथा अफ्रीका में किया जाता है। भारत में कपास के कुल क्षेत्र में से 29 प्रतिशत में इसकी खेती की जाती है। इसका रेशा मोटा, छोटा तथा अधिक मजबूत होता है। इसके रेशे की लम्बाई 1.0 से 1.9 सेन्टीमीटर होती है। इससे दरी तथा मोटे वस्त्र तैयार किए जाते हैं। हथकरघा उद्योग में भी इसी कपास का उपयोग किया जाता है।

गोशिपीयम हरबैशियम

यह एशियाई देशों की प्रमुख कपास है, जो अमेरिका में नहीं पायी जाती है। भारत में यह प्राचीन काल से उगायी जा रही है। ईरान, चीन, जापान इत्यादि देशों में इसकी खेती घरेलू आवश्यकता की पूर्ति के लिए बड़े पैमाने पर की जाती है। भारत में कुल क्षेत्र में से 21 प्रतिशत क्षेत्र में इस प्रजाति की कपास की खेती की जाती है। इसका रेशा ऊन के समान मजबूत तथा खुरदुरा होता है। ऊन के साथ मिलाकर कपड़ा तैयार करने में यह बहुत उपयोगी होता है। इससे निम्न गुणवत्ता वाले कपड़े, कम्बल तथा कारपेट तैयार किए जाते हैं।

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