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विश्व टीकाकरण सप्ताह व मिशन इंद्रधनुष

विश्व स्वास्थ्य संगठन 24-30 अप्रैल, 2018 के बीच विश्व टीकाकरण सप्ताह मना रहा है। संगठन विश्व के देशों से अपेक्षा रख रहा है कि वह 90 प्रतिशत टीकाकरण के लक्ष्य को पूरा करे। अभी वैश्विक टीकाकरण कवरेज 86 प्रतिशत पर स्थिर है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अभी भी विश्व में 19.5 मिलियन शिशु मूल टीकाओं से वंचित रह जाते हैं। इनमें से 60 प्रतिशत शिशु 10 देशों में रह रहे थे जिनमें भारत भी शामिल है।

सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम

भारत में सार्वभौमिक टीकाकरण कार्यक्रम 1985 में आरंभ किया गया था। कहने के लिए तो भारत में विश्व का सबसे बड़ा टीकाकरण कार्यक्रम चलाया जा रहा है परंतु इसके बाद भी पूर्ण टीकाकरण लक्ष्य अभी काफी दूर प्रतीत होता है। भारत में केवल 62 प्रतिशत बच्चे अपने प्रथम वर्ष में पूर्ण टीकाकरण प्राप्त करते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के अनुसार भारत में टीकाकरण कवरेज की स्थिति संतोषजनक नहीं है। यह महज 65 प्रतिशत थी। इसी प्रकार पूर्ण टीकाकरण कवरेज की वार्षिक वृद्धि  महज पांच वषों से (वर्ष 2014 तक) एक प्रतिशत थी। इसी आलोक में मिशन इंद्रधनुष आरंभ किया गया।

मिशन इंद्रधनुष कार्यक्रम

उपर्युक्त सीमाओं के मद्देनजर और भारत में पूर्ण टीकाकरण के लक्ष्य की प्राप्ति हेतु 25 दिसंबर, 2014 को मिशन इंद्रधनुष कार्यक्रम आरंभ किया गया। मिशन इंद्रधनुष का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि दो वर्ष तक के सभी बच्चे एवं गर्भवती महिलाओं का उपलब्ध सभी टीकाओं के तहत पूर्ण टीकाकरण हो जाये। जिस समय मिशन इंद्रधनुष कार्यक्रम आरंभ किया गया था उस समय इसमें सात जानलेवा बीमारियों की टीकों के समावेशन के कारण इसका नाम इंद्रधनुष रखा गया था। जिन सात बीमारियों को शामिल किया गया वे थीं; डिप्थीरिया, काली खांसी, टिटनस, पोलियो, टीबी, खसरा और हेपेटाइटिस। बाद में मिशन इंद्रधनुष के तहत टीकों की संख्या 7 से बढ़ाकर 12 कर दी गई है। जिन नई टीकाओं को शामिल किया गया है वे हैंः खसरा रूबेला, रोटावायरस, हिमोफिलस इनफ्लुएंजा-बी, न्यूमोकोकस एवं पोलियो। देश के कुछ राज्यों एवं जिलो में इस कार्यक्रम के तहत जापानी इन्सेफलाइटिस की भी टीका भी लगायी जा रही हैं। मिशन इंद्रधनुष चार चरणों का कार्यक्रम था। प्रथम चरण में देश के उन 201 जिलों को शामिल किया गया था जहां  आंशिक टीकाकरण कराने वाले या बिना टीकाकरण वाले 50 फीसद बच्चे रहते थे। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार चौथे चरण तक देश के 528 जिलों को कवर कर लिया गया था। मिशन इंद्रधनुष के चौथे चरण तक देश के 2.53 करोड़ बच्चों व 68 लाख गर्भवती महिलाओं को जीवन रक्षक टीकाएं दी जा चुकी थीं। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री का यह भी कहना था कि पहले जहां पूर्ण टीकाकरण कवरेज एक प्रतिशत वार्षिक थी जो मिशन इंद्रधनुष के प्रथम दो चरणों में बढ़कर 6.7 प्रतिशत वार्षिक हो गयी।

सघन मिशन इंद्रधनुष

बाद में प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी ने 8 अक्टूबर 2017 को गुजरात के वडनगर में सघन मिशन इंद्रधनुष (Intensive Mission Indradhanush-IMI) कार्यक्रम आरंभ किया। यह सघन कार्यक्रम देश के कुछ चुने हुये जिलों में दिसंबर 2018 तक न्यूनतम 90 प्रतिशत की पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य निर्धारित किया। जब वर्ष 2014 में मिशन इंद्रधनुष आरंभ किया गया था तब पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य 2020 तक तय किया गया था। सघन मिशन इंद्रधनुष के तहत देश के 173 जिलों एवं 17 शहरों का चुनाव किया गया था।

सघन मिशन इंद्रधनुष (आईएमआई) के तहत दो वर्ष के बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं पर फोकस किया गया है। वैसे इसके तहत पांच वर्षों का टीकाकरण भी मांग के आधार पर किया जाना भी तय किया गया।

आईएमआई के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए कार्यान्वयन के निम्नलिखित तरीकों को अपनाने पर बल दिया गया;

  1. अंतर-मंत्रालयी एवं अंतर-विभागीय समन्वयन
  2. कार्रवाई आधारित समीक्षा तंत्र
  3. गहन निगरानी एवं जवाबदेही फ्रेमवर्क।

जहां मिशन इंद्रधनुष के तहत पूर्ण टीकाकरण लक्ष्य 2020 तक प्राप्त किया जाता था वहीं सघन मिशन इंद्रधनुष के तहत पूर्ण टीकाकरण का लक्ष्य 2018 तक प्राप्त किया जाना है। सरकार इस लक्ष्य प्राप्ति में कितनी सफल रही है, यह आंकड़ों के जारी होने के पश्चात ही पता चल पाएगा। सघन मिशन इंद्रधनुष के तहत बेहतर समन्वयन के साथ-साथ गहन निगरानी की बात कही गयी है। परंतु इस मिशन के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी भी आशा जैसी जमीनी कार्यकर्त्ताओं पर ही है। उन्हीं के प्रयासों पर मिशन की सफलता व असफलता निर्भर है।

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