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समुद्री पर्यावरण में तेल रिसाव प्रबंधन

विश्व भर में तेल की भारी मात्रा का परिवहन समुद्री मार्ग से होता है। भारत में कच्चे तेल की मांग का 70 प्रतिशत समुद्री मार्ग से आयात हो रहा है। उसी प्रकार से दक्षिण-पूर्व एशियाए पूर्वी एशिया, जापान और चीन पश्चिमी एशिया से तेल के आयात पर प्रमुख रूप से निर्भर हैं और यह आयात भारतीय अनन्य आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) से होकर गुजरता है। परिणामतः पूरे जहाज मार्ग तेल सप्लाई सुविधा क्षेत्रों और पत्तनों के समीप तेल रिसाव होने का जोखिम निरंतर बना रहता है।  तेल रिसाव का मौजूदा खतरा भारतीय समुद्री क्षेत्र के आर्थिकध्पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील सभी अधिवासों और राष्ट्रीय समुद्री पार्कों जैसे कच्छ की खाड़ीए मुम्बईए मालवनए गोवातटए मंगलौरए केरलतटए मन्नार की खाड़ीए काकीनाडाए हल्दिया और सुन्दरवन आदि की रक्षा करने हेतु तैयारी की मांग करता है। जबकि कच्छ की खाड़ी ;जीओकेद्ध का स्थान इस सूची में सबसे ऊपर है क्योंकि सामरिक दृष्टि से यह फारस की खाड़ी के समीप है तथा पारिस्थितिकीय दृष्टि से यह एक समृद्ध अधिवास है जिसे राष्ट्रीय समुद्री पार्क और राष्ट्रीय समुद्री अभ्यारण्य घोषित किया जा चुका है। कच्छ की खाड़ी में तेल टैंकरों के बीच टक्कर हो जाने की किसी सी संभावित घटना मछलीए प्रवालोंए मैंग्रोवों और अन्य समुद्री जीव-जंतुओं और वनस्पतियों तथा इस क्षेत्र में समुद्री पारिस्थितिकीय प्रणाली का व्यापक विनाश होना तय है।

तेल रिसाव की घटना खुले समुद्र में टैंकर के मार्ग पर या तेल अधिष्ठापनों के निकट कहीं भी किसी भी समय हो सकती हैए लेकिन किसी भी स्थान पर समुद्री तटरेखा के प्रभावित होने का खतरा मौजूद रहता हैए यह धाराए हवा और ज्वार-भाटा की दशा पर निर्भर करता है। समुद्री पर्यावरण में तेल रिसाव का प्रबंधन तेल रिसाव का समन्वय करने वाली एजेंसियों के लिए चुनौतीपूर्ण कार्य है और इसके पर्यावरणीय प्रभावों को कम करने के लिए तत्काल पर्याप्त तत्परता के साथ कार्य करने की जरूरत पड़ती है। कच्चे तेल के भौतिक और रसायनिक गुणों के बारे में समुचित जानकारी और इस बात की समझ होना कि ये विभिन्न मौसमों में समुद्री सतह पर किस प्रकार का प्रभाव डालते हैं, सर्वाधिक उपयोगी ढंग से तेल रिसाव का प्रबंधन करने के मामले में समुचित तरीके से तेल रिसाव नियंत्रण और समुद्र को स्वच्छ बनाने की प्रक्रियाओं को प्रयोग में लाने की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

 

तेल रिसाव के कारण

तेल रिसाव आमतौर पर खराब मौसम ;हरिकेनए तूफान और भूकंपद्धए हिंसापूर्ण कृत्यों ;जैसे युद्धए विध्वंस या जहाज को डुबोनेद्ध और मानवीय भूल के कारण होता है। तेल रिसाव का मुख्य कारण आमतौर पर उनके इन कृत्यों और परिस्थितियों का मिलना होता हैए और इनमें से सभी का विभिन्न रूपों में प्रभाव पड़ता रहता है।

तेलों का प्रकार और गुण

कच्चे तेल के सैकड़ों प्रकार हैं जो कि उनकी उत्पत्ति तथा उनके भौतिक और रसायनिक गुणों पर निर्भर करता हैए जबकि बहुत सारे शोधित उत्पाद जो कच्चे तेलों जिनसे वे प्राप्त किए जाते हैंए से बिल्कुल भिन्न अपने सुपरिभाषित गुण होते हैं। अन्तरमाध्यमिक और भारी ईंधन तेलों जैसे अवशेष उत्पादों जिनमें अशोधित संघटकों की अलग अलग मात्रा होती हैए को हल्के शोधित संघटकों के साथ मिलाने परए उनके गुणों में भारी अन्तर आ जाता है। समुद्र में लगातार रिस रहे तेल के प्रमुख भौतिक गुण जो उनके व्यवहार को प्रभावित करते हैंए में विशिष्ट गुरूत्व, आसवन विशेषताए चिप-चिपाहट और प्रवाह बिन्दु शामिल हैं। ये सभी रसायनिक संरचना (अर्थात, तेल में असफालटेन्स, रेजिन और मोम की कितनी-कितनी मात्रा है) दर निर्भर करता है।

समुद्री पर्यावरण पर तेल रिसाव का प्रभाव

समुद्री पर्यावरण पर तेल के परिवहन और तेल रिसाव का प्रभाव भौतिक, रसायनिक और जैविक प्रक्रियाओं द्वारा शासित होते हैं, जो तेल के गुणों द्रव-गतिविज्ञान, मौसम विज्ञान और पर्यावरणीय दशाओं पर निर्भर करते हैं। इन प्रक्रियाओं में अभिवहन, प्रचंड विसरण, सतह पर फैलाव, वाष्पीकरण, विलियन, वसाकरण, जल अपघटन, प्रकाश-ऑक्सीकरण, जैवीय विघटन आदि शामिल हैं। जब तेल रिसाव समुद्र dh सतह पर होता है, तो यह फैलकर एक पतली परत का निर्माण कर लेता है, जिसे ‘ऑयल स्लिक’ कहा जाता है। ऑयल स्लिक का संचलन वायु प्रवाह के कारण प्रभावित होने वाली धारा तथा प्रचंड विसरण के कारण होने वाले अभिवहन से संचालित होता है।

तेल उत्पादों की संरचना में रिसाव के बाद समय.समय पर परिवर्तन होता रहता है। हल्के ;कम अणुभारद्ध अंशों का वाष्पीकरण हो जाता हैए जल में घुलनशील संघटक जल में घुल जाते हैं और अमिश्रणीय संघटक पायस बन जाता है जो जल में छोटे.छोटे कणों के रूप में फैल जाते हैं। जल में तेल के पायस का निर्माण जल की लहरों पर निर्भर करता हैए लेकिन आमतौर पर रिसाव के एक सप्ताह के अन्दर यह निर्मित हो जाता है। यह जल की सतह पर मोटी परत का निर्माण कर देता है और समुद्री किनारे पर विखण्डनीय चिपचिपे पदार्थ के रूप में यह सामने आते हैं। काफी लम्बे समय के बाद इसमें टूटन प्रारंभ हो सकती है और यह तारकोल का लट्ठा जैसा बन जाता है। कुछ परिस्थितियों मेंए तेल के छोटे.छोटे कण जल में मौजूद तलछटी कणों से चिपक कर समुद्र तल की ओर बह जाते हैं जहां तेल नीचे पहुंच जाता है जिससे जीवाणु विघटन प्रारंभ हो सकता हैए जो कहीं अधिक धीमी प्रक्रिया है। यद्यपि अलग.अलग प्रक्रिया से ये परिवर्तन एक साथ होते हैंए फिर भी उसका सापेक्ष महत्व समय के साथ बदलता रहता है।

तेल रिसाव को प्रभावित करने वाले कारक और उनके प्रभाव

पर्यावरणीय प्रभाव : तेल रिसाव मॉडलिंग एक जटिल प्रक्रिया है, जो बहुत सारे कारकों जिनमें मानवीय और गैर-मानवीय दोनों ही कारक शामिल हैं, से प्रभावित होती है। तेल रिसाव को प्रभावित करने वाले कारक हैं : (d) तेल के गुण-पृष्ट तनाव, विशिष्ट गुरूत्व, तापमान; ([k) फैलाव;  (x) अभिवहन-लहरें, वायु और धारा; और (?k) मौसम। तेल रिसाव को प्रभावित करने वाले सबसे अधिक सामान्य कारकों में मौसम है जिससे जल और वायु का तापमान, समुद्र की दशा और वायु की गति प्रभावित होती है। विमुक्ति का प्रकार, सौर्य विकिरण, वायु तापमान, जल की विशेषताएं, तलछट भार भी कुछ हद तक प्रभावित होते हैं। उच्च तापमान और वायु की गति से वाष्पीकरण अधिक होता है, जिससे शेष बचे तेल का विषैलापन कम होता है। तापमान सूक्ष्मजैविक विघटन की दर को भी प्रभावित करता है जोकि पर्यावरण में तेल का अन्तिम है।

कम्प्यूटर मॉडलों की सहायता से निश्चित अवधि के अन्दर निश्चित क्षेत्र में इन पैरामीटरों में होने वाले अस्थायी और भौगोलिक परिवर्तनों पर विचार करना संभव है। तथापि सूचना के अभाव मेंए वायु वेग के लगभग 3ण्5 प्रतिशत और सतह की धारा के वेग का प्रयोग करते हुए गणना की जा सकती है।

भौगोलिक कारकरू समुद्री क्षेत्र की भौगोलिक विशेषताएं तेल रिसाव के प्रभाव और इससे होने वाली क्षति को कम करने की प्रक्रियाओं पर प्रभाव डालती हैं। यद्यपिए तेल की चिकनाई खुले समुद्र में फैल सकती हैए जबकि सबसे अधिक क्षति संरक्षित खाड़ियों और इनलेट्स के समीप तट के नजदीक होती है जहां तेल सान्द्रित हो जाता है। लहरों से प्राप्त ऊर्जा और तटीय क्षेत्र की अलग स्थिति के कारण तेल की स्थिति और उसके प्रभाव में फर्क आ जाता है। चट्टानयुक्त किनारों पर उसका प्रभाव कम हो जाता है तथा उससे होने वाली क्षति की तेजी से भरपाई होने लगती है। अति संरक्षित समुद्री तटवर्ती क्षेत्रों में जैविक उत्पादकता काफी होती है और उसमें तेल बुरी तरह से फंस जाता है। यदि तेल उपपरत में घुस जाए तो वहां पर अधिक समय तक बने रहने की संभावना हो जाती है। रेतए बालू-कण या पथरीले समुद्री क्षेत्र संरंध्र होते हैं और तेल अपेक्षाकृत आसानी से घुस जाता है।  इसके विपरीतए पानी से भरे महीन बालू कण या कीचड़युक्त स्थानों पर तेल आसानी से अन्दर नहीं घुस पाता है।  संरक्षित रेतीले उच्च जैविक उत्पादकता वाले और कीचड़युक्त समुद्री क्षेत्र में जंतुओं के शरीर तथा वनस्पति के तने और जड़ तेल के घुसने का मार्ग बन जाते हैं। तेल के घुसने से वही जीव मर सकते हैं जो आमतौर पर इसके घुसने का मार्ग बनाते हैं।

तेल रिसाव की मात्रा का आकलनरू तेल की मात्रा और प्रकार के बारे में सही.सही पता लगाना बड़ा कठिन है। इसलिएए प्रारंभ में मॉडल तैयार करने के लिए तेल की जमी परत की मोटाई और जल की सतह पर उसकी उपस्थिति को देखकर और तेल रिसाव के पृष्ठ क्षेत्र का आकलन करके तेल रिसाव की मात्रा की गणना की जा सकती है। उसके बादए तेल का प्रपथ बनाने के लिए तेल की मात्रा के बारे में सही सूचना का प्रयोग करते हुए मॉडल को अद्यतन बनाया जा सकता है।

तेल रिसाव प्रबंधन में मॉडलिंग और जीआईएस का अनुप्रयोग

() तेल रिसाव मॉडलिंग :  तेल रिसाव मॉडलिंग एक जटिल प्रक्रिया हैए जो बहुत सारे कारकों जिनमें मानवीय और गैर.मानवीय दोनों ही कारक शामिल हैंए से प्रभावित होती है।

तेल रिसाव को प्रभावित करने वाले मुख्य कारक हैं –

(क) तेल के गुण पृष्ट तनाव, विशिष्ट गुरूत्व, तापमानय (ख) फैलावय (ग) अभिवहन लहरेंए वायु और धाराय और (घ) मौसम। तेल वायु के वेग और समुद्र की सतह पर स्थित धारा के वेग के लगभग 3.5 प्रतिशत की गति से फैलता है। कम्प्यूटर मॉडलों की सहायता से आवश्यक डाटा का प्रयोग करकेए रिसे हुए तेल के प्रपथ और स्थिति के बारे में अनुमान लगाना और उसके कारण खतरे में पड़ने वाले संवेदनशील संसाधनों की समदर्शी स्थिति दर्शाना और इसमें लगने वाले समय के बारे में बताना संभव है। मॉडलिंग का उपयोग करने से तेल संचलन के बारे में स्पष्ट धारणा प्राप्त होती है और इससे रणनीति विकास और इसके प्रति आवश्यक प्रतिक्रिया क्षमता की पहचान के बारे में निर्णय लेने की क्षमता बढ़ती है। मॉडलिंग महज अनुमान लगाने के लिए प्रयुक्त किया जाने वाला साधन है और यह वास्तविक दुर्घटना के संदर्भ में तेल रिसाव की भौतिक तौर पर निगरानी रखे जाने की जरूरत का स्थान नहीं ले सकता। इसकी प्रभावी तरीके से जांच विमान या दूर संवेदी उपकरण या जल पर तेल के प्रभाव के दृश्य प्रेक्षणों की व्याख्या से की जा सकती है।

(ब) भौगोलिक सूचना प्रणालीरू भौगोलिक संदर्भ में तैयार किए गए डाटा जिसमें किसी वास्तविक पैमाने के आधार पर सूचना मौजूद हो, का प्रयोग करने में भौगोलिक सूचना प्रणाली उपयोगी हैए बशर्ते डाटा को सही तरीके से फॉरमेट किया गया हो और उपग्रह इमेजोंए हवा की तस्वीरों और मानक मानचित्र बनाने के उत्पादों सहित सभी स्रोतों से प्राप्त डाटा को संग्रहित किया जा सकता है। डाटा का सावधानीपूर्वक उपयोग करते हुए सामान्य डाटा पैमाने तथा डाटा की गुणवता का सम्मान करते हुए इन लाभों का दोहन करना चाहिए। मानचित्रों में निम्नलिखित सूचना को शामिल किया जाना चाहिएः

  1. 1. तेल रिसाव प्रपथ मॉडल परिणाम
  • बाथhमिट्री, परिचालन पैटर्न, तेल संचलन, तेल सान्द्रण और मोटाई, फैले हुए तेल की मात्रा आदि को दर्शाने वाले विभिन्न परिदृश्य के संदर्भ में मॉडल के परिणाम
  1. 2. पर्यावरणीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र
  • प्रवालभित्तियां, समुद्रीघास तल, मैaग्रोव, लवणबेसिन और समुद्रीतट, संरक्षित वन्य जीव क्षेत्रों और मछली पकड़ने की गतिविधि का स्वरूप।
  • पालन-पोषण और प्रजनन क्षेत्रों, स्थानों जो संकटग्रस्त या विलुप्तप्रायः प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण हैं, उसके समीप उथले जल क्षेत्र जिसमें मछली पकड़ी जाती है, समुद्री खर-पतवार के जमाव वाले क्षेत्रों, मछली पकड़ने की गतिविधियों को अंजाम देने वाले समुद्री तटों जैसे अति संवेदनशील क्षेत्र।
  1. 3. सामाजिकआर्थिक विशेषताएं
  • पत्तन, बन्दरगाह, जेटा, एसपीएम और बोट रैम्पस
  • औद्योगिक सुविधाएंए उदाहरण के लिए बिजली घरों और अलवणीकरण संयंत्रों के लिए जल आपूर्ति की प्रणालीए तटवर्ती क्षेत्रों में खनन और लवण वाष्पीकरण समुद्री क्षेत्रए सुविधा सम्पन्न तटीय भूभागए स्नान के लिए बने बाड़ेए जल क्रीड़ा और शौकिया तौर पर मछली पकड़ने की व्यवस्था जैसे मनोरंजन संसाधन, तट पर या उसके समीप मौजूद सांस्कृतिकए ऐतिहासिक या दर्शनीय महत्व के स्थल।

एक अध्ययन

चूंकि तेल रिसाव से मछलियोंए प्रवालो और अन्य अन्तर्ज्वारीय.जीव जंतुओंए मैंग्रोव को काफी क्षति पहुंचती है इसलिए समुद्री पारिस्थितिकी पर तेल रिसाव के खतरे और उसके परिणाम स्वरूप होने वाले आर्थिक नुकसानों की समस्या को वैज्ञानिक तकनिकों के माध्यम से सुलझाये जाने की जरूरत है ताकि दुर्घटना के कारण होने वाले तेल रिसाव से इन संवेदनशील अधिवासों को बचाने हेतु इनके प्रबंधन में सहायता की जा सके।

कार्य आवंटन नियम 1961 के अनुसारए महासागर की क्षति की रोकथामए संरक्षण और संरक्षा हेतु समन्वय करने और नियामक उपाय करने की जिम्मेदारी पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की है। तदनुसारए मंत्रालय ने समुद्री पर्यावरण में तेल संचलन को समझने तथा जटिलता के विभिन्न स्तर के दो गणितीय मॉडलों का उपयोग करते हुए संसाधनों पर जोखिम की पहचान करने के लिए अनुसंधान और विकास कार्यक्रम शुरू किया है। पहला तो सामान्य मॉडल हैए जो हिंद महासागर में तेल के संचलन और उसकी स्थिति के बारे में अनुमान लगाने के लिए विकसित किया जाता है। दूसरा समुद्री संसाधनों के संबंध में व्यापक प्रपथ और प्रभावी विश्लेषण करने हेतु अधिवास विशेष मॉडल है। सामान्य मॉडल में समुद्र से भारत के तटवर्ती क्षेत्रों की ओर तेल रिसाव के लिए जीएनओएमई ;जनरलाइज्ड एनओएए ऑयलस्पिल मॉडलिंग एनवायरमेंटद्ध कम्प्युटर का प्रयोग किया जाता है। मॉडल 60 से 18 किमी की दूरी तक वायु की गतिए वायु के वेगए समुद्री धारा के आधार पर कार्य करता है। मॉडल विसरणए वायु संबंधी भविष्यवाणी और समुद्र में क्षेत्रीय धारा के संबंध में की गई भविष्यवाणियों का प्रयोग करते हुए विगत की स्थिति तथा भविष्य की स्थिति के बारे में अनुमान लगाने में सक्षम है। मॉडल में अनिश्चितता पैरामीटर पर भी विचार किया जाता हैए जिसके बारे में मॉडल के लिए प्रयुक्त की जा रही डाटा गुणवत्ता के आधार पर निर्णय लिया जा सकता है।

किसी समय रिसा हुआ तेल कच्छ की खाड़ी के समीप के क्षेत्र में पहुंच जाता है  तो व्यापक अधिवास विशिष्ट मॉडल 450 मीटर भौगोलिक विघटन के आधार पर गहराई मापी यंत्र और स्थानीय परिचालन का प्रयोग करते हुए तेल की दशा और प्रपथ के विस्तृत विश्लेषण का उद्दीपन करता है। तेल रिसाव प्रपथ, मॉडलों के जीआईएस सूचना प्रणाली से जोड़ दिया जाता है ताकि उन संसाधनों की मात्रा और प्रकार के बारे में महत्वपूर्ण सूचना प्राप्त हो सके।

द्रवगति विज्ञान और तेल रिसाव मॉडलिंग

खाड़ी जल में तेल प्रपथ बनाने तथा ओखा से नवलखी तक के सम्पूर्ण खाड़ी क्षेत्र में व्याप्त द्रवगति विज्ञान और मौसम विज्ञानी संबंधी दशा के अधीन रिसे तेल के प्रपथ और स्थिति पर नजर रखने के लिए समेकित मॉडल का उपयोग किया गया था। ज्वार और परिचालन पैटर्न तैयार किए गए तथा तेल रिसाव मॉडलिंग के लिए उनकी आपूर्ति की गई। खाड़ी में परिचालन मुख्य रूप से ज्वार.भाटे और वायु से शासित होता है। द्रवगति विज्ञान और तेल रिसाव मॉडल के परिणामों की वैज्ञानिक वैधता का भारत में विभिन्न मंचों पर प्रदर्शन किया गया।

तेल रिसाव मॉडयुल में जलीय पर्यावरण में तेल की चिकनाई से संबंधित सभी महत्वपूर्ण घटनाओं पर विचार किया जाता है। जल क्षेत्र और वातावरण में तेल की परत की मोटाई और उसकी गतिशीलता तथा वितरण की गणना की जाती हैए जो कि आकस्मिक आयोजना और पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन के लिए जरूरी है। तेल रिसाव मॉडल के प्रपथ विश्लेषण के लिए प्रमुख रूप से जिस प्रेक्षण पर जोर दिया जाता हैए वह स्थानीय वायु की दशा और परिचालन पैटर्न पर निर्भर करता है जबकि पर्यावरणीय पैरामीटरों के साथ तेल की रसायनिक संरचना और गुण उसकी स्थिति के विश्लेषण के लिए निर्णयकारी कारक होते हैं।

वायु और जल की धाराएं जल सतह पर तेल के कणों के संचलन को दिशा.निर्देशित करती है। धाराएं जलक्षेत्र में विसर्जित तेल के परिवहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। तेल रिसाव प्रपथों में शामिल क्षेत्र खाड़ी में वायु की विभिन्न दशाओं के अनुरूप बदलाव को महसूस करता है। मॉडलिंग के परिणामों से यह स्पष्ट हो कि वायु की शून्य गति ष्की दशा मेंए तेल का संचलन ज्वार के प्रवाह की धाराओं के मार्ग के अनुरूप हुआ।

प्रभावित संसाधनों के क्षेत्रफल का आकलन करने में जीआईएस का उपयोग

तेल रिसाव पर ध्यान देने तथा संसाधनों पर तेल रिसाव में प्रभाव का आकलन करने हेतु पारस्परिक तरीके से विभिन्न रणनीतियां बनाए जाने की संभावना तलाशने की दिशा में रिसे हुए तेल के व्यापक संचलन और स्थिति के बारे में अनुमान लगाने के लिए प्रचालनात्मक जीआईएस आधारित सूचना प्रणाली का प्रयोग किया गया। समुद्री जीव.जंतुओं और संसाधनों पर तेल रिसाव के पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करने के लिए तेल की स्थिति का पता लगानेए तेल की परत की मोटाईए  तेल के फैलाव वाले क्षेत्र का क्षेत्रफल और घुल गए सामग्री के बारे में जानने के संदर्भ में इन मॉडल आउटपुटों को जीआईएस के अनुरूप फॉरमेट में बदल दिया गया। फिरए दिए हुए परिदृश्य में आर्क.व्यू का प्रयोग करते हुए प्रभावित होने वाले संसाधनों की पहचान करने हेतु प्राप्त  परिणामों का विश्लेषण किया गया। समय को दर्शाने वाले मानचित्र तैयार किए गए और समय के साथ संसाधनों पर होने वाले जोखिम का आकलन करने हेतु संसाधन सम्बंधी मानचित्रों के साथ तुलना की गई।

राष्ट्रीय तेल रिसाव प्रबंधन योजना

देश के अन्दर तटवर्ती और समुद्री क्षेत्रों को तेल रिसाव से होने वाली क्षति से रक्षा करने हेतु 1980 से तेल रिसाव प्रबंधन कार्यक्रम बना हुआ है। तेल रिसाव आपदा के मामले में संकट प्रबंधन के लिए गृह मंत्रालय नोडल मंत्रालय है तथा तेल रिसाव होने की स्थिति में भारत के समुद्री क्षेत्र में तेल रिसाव प्रदूषण से निपटने के लिए तटरक्षक बल समन्वयकारी एजेंसी है। इसके महत्वपूर्ण पहलुओं में तेल रिसाव का पता लगानेए उसके प्रबंधन करनेए उससे निपटने में अनुसंधान और विकास तथा कानूनी पहलू शामिल हैं। तेल रिसाव पर की जाने वाली कार्यवाहियों में तेल को छितराने से रोकने तथा प्राकृतिक विसर्जन को बढ़ाने हेतु विसर्जनों को प्राप्त करने हेतु रोक बल्लियों तथा स्किमरों का प्रयोग किया जाना स्थापित तरीके हैं। तेल के हवाईध्दृश्य प्रेक्षणए तैरते तेल की मात्राए संभावित खतरे का मूल्यांकनए संवेदनशील संसाधनों की संरक्षाए तटरेखा की सफाई आदि के आधार पर रिसाव के प्रभाव को दूर करने हेतु रणनीतियों के बारे में निर्णय लिए जाते हैं।

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