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समुद्र निश्चित करता है जलवायु का स्वरूप व प्रभाव

सूचना-प्रौद्योगिकी के वर्तमान युग में आधुनिक भौगोलिक प्रविधियों यथा-‘दूर संवेदन’, भौगोलिक सूचना प्रणाली (GIS) अंतः जलीय फोटोग्राफी आदि से लैस समुद्र विज्ञान एवं मौसम विज्ञान ने समुद्र एवं जलवायु के गूढ़ रहस्यों एवं संबंधों को सुलझाने का सफल प्रयास किया है। समुद्र द्वारा विभिन्न आयामों-वैश्विक, महाद्वीपीय, क्षेत्रीय और स्थानीय स्तर पर जलवायु को कई प्रकार से बड़े पैमाने पर प्रभावित किया जाता है।

पृथ्वी की 70 प्रतिशत सतह समुद्र से घिरी है, इस प्रकार समुद्र विश्व का सबसे बड़ा सौर्य ऊर्जा संग्राहक और भंडारण प्रणाली है। ग्रीष्म ऋतु एवं दिन के वक्त समुद्र सौर्य उष्मा का अवशोषण करते हैं तथा शीत ऋतु एवं रात्रि में वे सूर्य से प्राप्त उष्मा का पुनर्विकिरण करते हैं जिससे हमारा वायुमंडल गर्म होता है और पृथ्वी को जीवनदायिनी शक्ति प्राप्त होती है। समुद्र द्वारा बड़े पैमाने पर उष्मा अवशोषण एवं पुनर्विकिरण के कारण ही समुद्र तटीय क्षेत्र की जलवायु वर्षभर समशीतोष्ण बनी रहती है और इस प्रकार हमें दो परस्पर विपरीत प्रवृत्ति वाली जलवायु-‘समुद्रतटीय’ एवं ‘महाद्वीपीय’ – की प्राप्ति होती है।

समुद्री जलधाराओं द्वारा तटीय क्षेत्रों के तापमान में परिवर्तन किया जाता है। उष्ण धारायें तटीय क्षेत्रों के तापमान को बढ़ा देती है। उदाहरण के लिए गल्फधारा के कारण उच्च अक्षांशों (65ºN) में अवस्थित नार्विक एवं मर्मोंस्क जैसे बंदरगाहों पर शीत ऋतु में भी बर्फ नहीं जमती और वर्षभर ये खुले रहते हैं। ठीक इसके विपरीत ठंडी लैब्रोडोर जलधारा के प्रभाव के कारण अपेक्षाकृत निम्न अक्षांश (45º-50º N) में अवस्थित सेंटलॉरेंस समुद्री मार्ग बर्फ जमने के कारण शीत ऋतु में अवरूद्ध हो जाता है।

उष्ण जलधारायें विषुवतीय प्रदेश की अतिरिक्त उष्णता को उच्च अक्षांशों तक तथा ठंढी जलधारायें ध्रुवीय शीतलता को निम्न अक्षांशों तक ले जाती है और इस प्रकार समुद्र अक्षांशीय उष्मा संतुलन में अहम भूमिका निभाता है। गर्म एवं ठंडी जलधाराओं के मिलन क्षेत्र में अभिवहन कुहरा (Advection fogs) की उत्पत्ति होती है तथा यह क्षेत्र मत्स्ययन के लिए आदर्श क्षेत्र होते हैं। जापान एवं न्यूफाऊंडलैंड के समुद्री तट इस संदर्भ में उल्लेखनीय हैं।

महाद्वीपों के पश्चिमी भाग में अवस्थित विषुवतीय-मरूस्थलों यथा – नामिब, आटाकामा, कैलिफोर्निया और सहारा की उत्पत्ति में इन क्षेत्रों की ठंडी जलधाराओं की भूमिका सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। समुद्र वायुमंडल में उपलब्ध आर्द्रता के सबसे बड़े स्रोत हैं तथा महाद्वीपों पर होने वाली वर्षा का अधिकांश भाग समुद्र से ही प्राप्त किया जाता है। पृथ्वी की सतह पर ‘जल चक्र’ के संचलन में समुद्र सबसे प्रमुख अवयव है।

महाद्वीपीय एवं महासागरीय भागों के असमान सौर्य तापन के कारण स्थानीय आवर्ती पवनों यथा-स्थल समीर, सागर समीर एवं क्षेत्रीय स्तर पर मानसून पवनों आदि की उत्पत्ति होती है। विभिन्न समुद्री घटनायें यथा- एलनीनो, दक्षिणी दोलन (Southern oscillation), सोमाली जलधारा आदि मानसून के प्रदर्शन पर आश्चर्यजनक प्रभाव डालती है। यह पाया जाता है कि एलनीनो के कारण चिली मरूस्थल में अत्यधिक वर्षा, सहारा मरूस्थल में अति शुष्कता एवं भारतीय मानसून का खराब प्रदर्शन जैसी भौगालिक घटनायें घटती हैं।

समुद्र विभिन्न प्रकार की वायु राशियों के उत्पत्ति स्थल हैं। मध्य अक्षांशों में चक्रवात, प्रतिचक्रवात जैसी मौसमी घटनाओं की उत्पत्ति, विकास एवं उनके मार्गों का निर्धारण इन्हीं वायुराशियों द्वारा किया जाता है। विषुवतीय चक्रवातों को भी ऊर्जा की प्राप्ति परोक्ष रूप से समुद्र से ही होती है। समुद्र के ऊपर आर्द्रता से पूर्ण हवा जब ऊपर उठकर संघनित होती है तो वायुमंडल में बड़े पैमाने पर उष्मा ऊर्जा मुक्त होती है। यह ऊर्जा जहां एक ओर विषुवतीय चक्रवातों की शक्ति का स्रोत है वहीं दूसरी ओर यही ऊर्जा निम्न ऊँचाई वाली विषुवतीय जेट हवा की उत्पत्ति भी करती है।

ये समुद्र ही हैं जो वसुंधरा को शस्यश्यामला तथा आकाश को नीला बनाते हैं। पृथ्वी नीला-उपग्रह की संज्ञा समुद्रों के कारण धारण करती है और इन्हीं के कारण पृथ्वी पर जीवन का उद्भव हुआ है। पृथ्वी का प्रथम जीवन सागर की अतल गहराइयों में ही विकसित हुआ। ये पृथ्वी के ऊपर विभिन्न जलवायवीय एवं मौसमी घटनाओं के जनक ही नहीं अपितु नियंत्रक भी हैं।

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