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कम्प्यूटर आधारित भौगोलिक सूचना प्रणाली अर्थात् जीआईएस

भौगोलिक सूचना-प्रणाली या जीआईएस (ज्यॉग्राफिक-इन्फार्मेशन-सिस्टम) कंप्यूटर-आधारित सूचना-प्रणाली है। इसका प्रयोग भूमंडल के विभिन्न मानक अन्तः खंडों को आंकिक (Digitally) रूप में प्रस्तुत और विश्लेषित करने में होता है। आपको याद होगा कि भूतल के स्थानिक गुण (Spatial Attributes) तो होते ही हैं, साथ में अस्थानिक-गुण के रूप में संख्यावाची (Digitally) भी होते हैं जो रेखाचित्रीय नहीं होते। इस बात को सरल शब्दों में इस तरह कह सकते हैं कि मानचित्र के भूरूपों (Features) को आंकड़ों, मसलन समोच्च रेखा (Quantified) बनाया जा सकता है। यह हुआ स्थानिक आंकड़ा। लेकिन जब सूचनाएँ अपने तथ्यनिरूपण के साथ-साथ मानचित्र की मूलभूत विशिष्टाओं को उनके गुणात्मक रूप में प्रकट करें तो इसे ‘अस्थानिक’ की ही संज्ञा दी जाती है। संभव है आप भूमंडल के मानक अंतःखंडों की बात समझते हों लेकिन इनके ‘आंकिक’ होने का क्या अर्थ है? सूक्ष्म रेखाओं, सीमाओं और ऐसे ही अन्यान्य घटकों को जब अंकों में तब्दील कर दिया जाता है तो इस क्रिया को डिजिटाइजेशन (Digitization) कहते हैं। इस क्रिया के बाद कंप्यूटर इन्हें पढ़ सकता है। हम अपनी इस यात्रा पर बाद में निकलेंगे। पहले हमें भौगोलिक-सूचना-प्रणाली या जीआईएस के दो आधारभूत पदों, भू-संदर्भ जियो-रेफरेंस (Geo-refrence) और डेटाबेस (Data-base) को समझना होगा।

अंतरिक्ष में किसी परत या आवरण की अवस्थिति को जियो-रेफरेंस नाम दिया जाता है। इसे समायोजी-संदर्भ प्रणाली या Co-ordinate Referencing System से दिखाते हैं। को-ऑर्डिनेट रेफरेंसिंग सिस्टम का अर्थ आप इसके शब्दों से निकाल सकते हैं। आपको x और y अथवा अक्षांश और देशांतर के बीच ग्रहमैत्री बैठानी पड़ती है, और इस तरह आप किसी वस्तु की देशपरक स्थिति या अवस्थापन जान सकते हैं। को-ऑर्डिनेट रेफरेंसिंग सिस्टम इसी अर्थ में वस्तुओं की देशपरक स्थिति बताने का तरीका है। आपको यह बात जानकर बड़ा आनंद आएगा कि हमारी इस धरती की सतह पर स्थित हर वस्तु और जीव को भू-संदर्भी खाके में फिट किया जा सकता है।

जियो-रेफरेंसिंग को जान लेने के बाद अब हम इससे डेटाबेस को जोड़ सकते हैं। डेटाबेस को हम ‘स्थानिक’ (देशपरक स्थिति) और अस्थानिक सूचनाओं का भंडार कह सकते हैं। इसमें अर्थात् डेटाबेस में, इन सूचनाओं का आपसी संबंध भी सुव्यवस्थित होता है। जो कि स्थानिक एवं अस्थानिक सूचनाओं का संकलन तथा उनका परस्पर संबंध है।

पचास वर्ष पुराना विज्ञान

अपेक्षतः इस क्षेत्र में नये अनुसंधानों की शुरुआत 1950 के दशक के अंतिम वर्षों में हुई। हालांकि इसका लोकप्रिय प्रयोग 1970 के दशक के उत्तरार्ध में ही हो पाया जिसकी पहल इन्वायरमेंटल सिस्टम रिसर्च इंस्टिट्यूट इनकॉरपोरेशन (इएसआरआई) ने की, जो कनाडा की संस्था है। इस तरह कनाडा जीआईएस के विकास में पथप्रदर्शक माना जाता है। जीआईएस के आरंभिक विकास का अधिकांश श्रेय कनाडा के जीआईएस विशेषज्ञ रोजर टॉमिलसन को जाता है।

आप पूछ सकते हैं कि ऐसी प्रणाली की जरूरत क्या है? दरअसल वैज्ञानिकों, अभियंताओं, योजनाकारों, नीति-निर्माताओं, प्रबंधकों, उद्यमियों, सरकारी निकायों और अन्य लोगों द्वारा डेटाबेस के इस्तेमाल को जीआईएस ने क्रान्तिकारी ढंग से बदल दिया है। अब विश्लेषण बड़ी आसानी और तेजी से करना संभव है।

जीआईएस है क्या?

जैसा कि पहले बताया जा चुका है, जीआईएस एक संगणक (Computer) आधारित प्रणाली है। इसके अंतर्गत स्थानिक आंकड़ों (Spatial Data) को व्यवस्थित तरीके से संग्रहित, पुनःप्राप्ति, विश्लेषित और प्रदर्शित किया जाता है। इसे इस तरह से भी परिभाषित किया जा सकता है कि यह एक कंप्यूटर-आधारित प्रणाली है जो भू-संदर्भी आंकड़ों को इस्तेमाल की निम्नलिखित क्षमता प्रदान करती हैः

डेटा इनपुट अर्थात् आंकड़ों की आगत

  • डेटा मैनेजमेंट अर्थात् आंकड़ों का संचयन और उनको दोबारा प्राप्त करना।
  • मैनिपुलेशन और एनालिसिस अर्थात् मनोवांछित तरीके से आंकड़ों को बरतना और विश्लेषित करना।
  • डेटा आऊटपुट अर्थात् आंकड़ों का निष्पादन।

डेटाबेस के होने वाले सामान्य प्रयोग, मसलन पूछताछ और सांख्यिकी-विश्लेषण (Statistical analysis) को जीआईएस प्रौद्योगिकी के सहारे चित्रलेखीय प्रदर्शों तथा मानचित्र में भौगोलिक विश्लेषणों के साथ जोड़ा जा सकता है। रेखाचित्रिय (Graphic display) पूछताछ (Query) का सीधा मतलब होता है खास उद्देश्य के लिए किसी विशिष्ट सूचना को प्राप्त करना। उदाहरण के लिए आप एक इलाके का विकास सड़क बनाकर करना चाहते हैं। डेटाबेस में आपको इसके लिए सुविचारणीय सूचनाएँ मिलेंगी। आप कुछ मानकों को चुन सकते हैं, जैसे भूमि का वर्णन-चित्र अथवा बसाव का तरीका। इसमें आपको साधारण साफ्टवेयर तकनीक की सहायता लेनी होगी। इसे कहते हैं पूछताछ (Query)। इसका अगला चरण है सांख्यिकी विश्लेषण और अन्त में परिणाम के तौर पर आपको प्राप्त होगा एक मानचित्र जो आपकी परिकल्पना को साकार कर रहा होगा। इन्हीं विशेषताओं के कारण जीआईएस, अन्य सूचना-प्रणालियों से अलग है। यह परिघटनाओं के विश्लेषण में मददगार है और परिणामों का पहले से अनुमान कर सकता है, साथ ही रणनीतियों को सुनियोजित करने में सहायक हो सकता है।

जीआईएस को इतनी वरीयता कैसे मिली? सूचना-प्रौद्योगिकी में आयी सुविदित क्रान्ति के परिणामस्वरूप ही जीआईएस प्रणाली को इतनी बढ़त हासिल हुई है। कंप्यूटर-प्रौद्योगिकी, सुदूर संवेदन (रिमोट सेंसिंग) और विश्व अवस्थापन प्रणाली (ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम) सूचना-प्रौद्योगिकी की देन है, और इन्हीं कारणों ने जीआईएस के क्षेत्र में विकास को गति दी है।

लेकिन सारा किस्सा यहीं खत्म नहीं होता। संचार-प्रौद्योगिकी के तीव्रतर विकास, कंप्यूटर हार्डवेयर की कीमतों में तेज गिरावट तथा साथ में कंप्यूटर संचालन की गति में तीव्रगामी वृद्धि ने भी जीआईएस के विकास को बढ़ावा दिया है।

इससे भी महत्वपूर्ण बात है जीआईएस, सॉफ्टवेयर के प्रयोगकर्ता के लिए काम करने में अत्यन्त आसान होना। यह सॉफ्टवेयर आपको समस्त पूर्णताओं में दृश्य का विहंगावलोकन कराता है। इसके ऊपर यह चीनी कहावत सटीक बैठती है कि ‘एक तस्वीर हज़ार शब्दों से कहीं ज्यादा प्रभावी होती है’।

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