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हम्बोल्ड्ट और उसकी खोज यात्रा

मेरा बचपन

मैं शुरूआत अपने बचपन से करता हूँ। मेरी जानकारी और विश्वास के अनुसार मेरा जन्म शुक्रवार, दोपहर बारह बजे, 1769 ई. में बर्लिन शहर के एक प्रशियन कुलीन परिवार में हुआ था। ऐसा बताया गया है कि घड़ी में बारह बजे का घंटा बजते ही, मेरा जन्म हो चुका था। मेरा नाम बैरन फ्रेडरिक विलहेम कार्ल हेनरीक अलेक्जेन्डर वॉन हम्बोल्ड्ट रखा गया, लेकिन आज आप में से अधिकतर लोग मुझे सिर्फ हम्बोल्ड्ट के नाम से जानते हैं। भला, मुझे इसमें क्या शिकायत हो सकती है। बल्कि मुझे तो आश्चर्य होता है कि आप लोग कम से कम मुझे याद तो कर लेते हैं।

मैं बहुत छोटा था जब मेरे पिता चल बसे और मेरी मां ने दूसरी शादी कर ली। और संभवतः यही कारण है कि मेरा बचपन सुखद नहीं रहा। मैं अन्तर्मुखी स्वभाव का था और अपने आप में खोया रहता था। अपने साथियों को शोर-गुल मचाते और खेलते हुए देखकर मैं हमेशा अचरज करता रहता था कि जो सुन्दर वस्तुएं मुझे आकर्षित करती है, वही वस्तुएं हमारे उन साथियों का ध्यान अपनी ओर क्यों नहीं खींच पाती। सभी लोग मेरा उपहास उड़ाते रहते। पढ़ाई-लिखाई मुझे रास नहीं आती थी, इस तरह मैं अपने भाई विलहेम जो वास्तव में कुशाग्र बुद्धि का था की तरह एक अच्छा छात्र नहीं बन सका।

यह एक धुंधला और निराशापूर्ण दिन था जब मेरी मां मेरे बारे में सभी आशाएँ त्याग कर अपने दोनों हाथों से अपना सिर पकड़कर बुरी तरह रोयी थी। लेकिन मैं कर क्या सकता था? सांसारिक वस्तुएं मुझे भाती नहीं थीं। मैं तो अपने स्कूल और घर की चारदीवारी के बाहर की विस्तृत दुनिया के बारे में अधिक से अधिक जानना चाहता था। मैंने अपना अधिकतर खाली समय  खोज यात्रा संबंधी पुस्तकें पढ़कर गुजारने का निर्णय लिया। मैं एक स्वप्नदृष्टा बन गया था और हमेशा यथार्थ की दुनिया से निकलकर साहस और रोमांच की एक अलग दुनिया की यात्रा करता था। इसके अलावा, मैं साहसिक अभियान और खोज के युग में पला-बढ़ा जिससे मेरी कल्पना शक्ति और प्रखर हो गई। मुझे अपने दसवें जन्मदिन के दो दिन के बाद की बरसात भरी दोपहरी याद है जब मुझे साहसी यात्रा प्रेमी कैप्टन जेम्स कुक की महान खोज की जानकारी मिली थी।

यह ठीक है कि तब टेलीविजन नहीं था। रेडियो की भी खोज नहीं हुई थी। घर में बैठे इन छोटी-छोटी खिड़कियों से बाहर की दुनिया में हो रही घटनाओं को देखने या उनके बारे में सुनने का कोई साधन मौजूद नहीं था। हां, बिल्कुल ठीक, यह जानना अविश्वसनीय, अकल्पनीय, अकथनीय और विस्मयकारी था कि किसी ने वस्तुतः सम्पूर्ण प्रशान्त महासागर का पता लगा लिया था। प्रत्येक दिन मैं गुप्त रूप से इच्छा प्रकट किया करता कि काश मैं भी ऐसे साहसिक अभियानों की खोज यात्रा का एक सदस्य होता!

जब मैं बड़ा हुआ

ज्यों-ज्यों मैं बड़ा होता जा रहा था, जीवन यात्रा भी उसी रफ्तार से आगे बढ़ी चली जा रही थी और मैं स्कूली शिक्षा समाप्त करके वर्ष 1779 में गेटिनजेन विश्वविद्यालय जो जर्मनी के प्रमुख विश्व विद्यालयों में से एक था, में दाखिला ले चुका था। गेटे मेरे बचपन के दोस्तों में से एक था जिसका मुझपर विभिन्न प्रकार से प्रभाव पड़ा था और मैं उसका बहुत ही कृतज्ञ हूँ। विश्वविद्यालय स्तर पर बहुत बाद में मुझे यह एहसास हुआ कि मैं कितना भाग्यशाली था कि मुझे अपने समय के उत्कृष्ट विद्वान का संरक्षण मिला हुआ था। उच्च दर्शन और पुरातत्वविज्ञान के संस्थापकों में से एक प्रो. जी.सी. हेयने, वस्तुतः मेरे प्रिय शिक्षकों में से एक थे। मैं उनके व्याख्यान को बहुत पसंद करता था। मुझे सोमवार का वह दिन अभी भी याद है जब सुबह निखरी हुई धूप में हम सब राईन के बेसाल्ट का अध्ययन करने हेतु पहली फील्डयात्रा पर निकले थे। यह एक बहुत ही आश्चर्यजनक अनुभव था। इस खोज यात्रा ने मुझे अपना पहला प्रकाशन ‘ए डिटेल्ड स्टडी ऑन दि बसाल्ट डिपोजिट्स नियर अंकेल औन दि राइन’ – निकालने के लिए प्रेरित किया था। मैंने इस प्रकाशन को अपने गुरू और मार्गदर्शक, जॉर्ज फॉस्टर के नाम समर्पित करने का निर्णय लिया। उस यात्रा के पश्चात, मैं एक बात निश्चित तौर पर जान गया था कि कड़ी मेहनत और प्रकृति के इतिहास की जानकारी प्राप्त करने में निरंतर लगे रहने से जहां मुझे प्रसन्नता मिलेगी वहीं मैं जीवन के लोभ-लालचों से भी बचा रहूँगा। जब प्रशिया में वर्ष 1792 में मुझे खानों का निदेशक नियुक्त किया गया तो सभी लोग उल्लास से भर उठे थे। मुझे भी ऐसा लगा था कि मुझे अपना पेशा मिल गया किन्तु अनखोजी चीजों को खोज निकालने की मेरी चाह ने सभी की आशाओं पर पानी फेर दिया और मैं इस नीरस नौकरी से उब गया। नवम्बर, 1796 में मेरी मां की मृत्यु हो जाने के बाद मैंने नौकरी छोड़ देने का अन्तिम निर्णय ले लिया। जल्दी ही विल्हेम जो उन दिनों अवसाद से घिरा हुआ था के पास मैं जेना चला गया। यद्यपि जुलाई, 1797 में मैंने नौकरी से औपचारिक तौर पर त्यागपत्र दिया था, खुले नीले आकाश का आमंत्रण मेरे लिए असहनीय सा था और मैं अन्ततः स्वतंत्र होकर उन्मादित ढंग से विदेशों में खोज यात्रा पर जाने की योजना बनाने लगा।

अमेरिका की उन्मुक्त यात्रा!

मैंने अपने प्रिय फ्रांसीसी मित्र ए. बोप्ला जो एक वनस्पति विज्ञानी था, को अमेरिकी महाद्वीप की अपनी पहली खोज यात्रा पर साथ जाने के लिए मनाया और सबसे बड़ी बात कि वह तैयार हो गया। जून 1799 के साफ मौसम में जब हम लोग मैड्रिड से एक जहाज पर सवार हुए तो वह एक बड़ा ही खुशी का मौका था।

जहाज पर हम प्रत्येक रात्रि को दक्षिणी आसमान के सौंदर्य की प्रशंसा किया करते। भूमध्य रेखा पर पहुँचने और एक गोलार्द्ध की ओर जाते हुए मुझे अति उल्लेखनीय चीज़ का अनुभव हुआ। उन सुपरिचित तारों को धीरे-धीरे डूबते हुए अन्ततः एवं लुप्त होते हुए देखना वास्तव में एक बहुत ही विलक्षण अनुभूति थी। नये आकाश के दृश्य को देखकर ही यात्री को अपने घर से अविश्वसनीय लगने वाली इतनी दूरी पर होने का एहसास होता है।

हमारा पहला पड़ाव काराकस के आस-पास के क्षेत्र वेनेजुएला में था। यह कितना सुन्दर स्थान था। वहां से हमने जरूरी सामान खरीदे और ओरिनिको नदी बेसिन की ओर खोज यात्रा पर जाने के लिए कुछ स्थानीय लोगों की सहायता ली। वस्तुतः उस नदी बेसिन से घिरे उस क्षेत्र में वर्ष 1800 का बर्फविहीन नववर्ष भी मनाया था। हमने नदी की विस्तृत तौर पर खोज की तथा कई जीव जंतुओं और पेड़ पौधों की अन्यस्थानिक प्रजातियों का पता लगाने के साथ-साथ एक विस्मयकारी सम्पर्क नदमार्ग की भी खोज की। ओरिनिको अमेजन से जुड़ा हुआ है। ओहो, तो पूरे विश्व को बताने के लिए यह एक नई खोज ही थी।

लेकिन हमलोग वहां रूके नहीं और रास्ते भर अमेजन के वर्षा-प्रचुर घने वन से जुड़े इसके नदी शीर्ष की खोज करते रहे। दूसरी खोज यात्रा पर हम और प्रफुल्लित हो उठे। अब हमलोग यह सिद्ध करने में समर्थ थे कि अमेजन की एक सहायक नदी, रियो निगरो ओरिनिको के नदीशीर्ष को अधिग्रहण करने की प्रक्रिया में थी।

अमेजन के उष्ण और घने वनों से गुजरते हुए हमने क्यूबा की ओर जाकर वहां की अर्थव्यवस्था और समाज का अध्ययन करने का निर्णय लिया। मुझे इस गर्म, उष्ण प्रदेश के लोगों द्वारा इतनी गर्मजोशी से स्वागत किये जाने की बिल्कुल उम्मीद नहीं थी। मैं उनकी मेहमान नवाजी से बहुत प्रभावित हुआ और उन्हें हमेशा याद रखूंगा। लेकिन शीघ्र ही अप्रत्याशित रूप से हमने स्वयं को अमेरिका के कोलम्बिया में कार्टिजेना नामक स्थान पर वापस पाया।

यह 1801 के फरवरी महीने का हल्की सी गर्मी का मौसम था और मैं अपने युवावस्था के चरम पर था जब उत्तरी एंडीज के विस्तृत उबड़-खाबड़ क्षेत्र में देशांतर-गमन  हेतु खोज यात्रा करने का निर्णय लिया। दक्षिणी अमेरिका में अपने प्रवास का मैं इसे सबसे अधिक महत्वपूर्ण भाग समझता हूँ। वह बहुत ही सुन्दर स्थान था जहां सर्द और लहरदार पर्वतीय हवा बहती रहती थी और रातभर तारे चम-चमाते रहते थे और ऐसा लगता था मानो समय ठहर सा गया हो। हम  खोज यात्रा में अपने साथ षटकोण, दूरबीन, साइनोमीटर, बैरोमीटर आदि जैसे वैज्ञानिक उपकरणों का स्टॉक लिये चलते थे ताकि हम क्रमबद्ध रूप से रेखांश और अक्षांश, उन्नतांश और तापमान को माप सकें तथा रिकार्ड करे सकें।

मैंने और बोप्ला ने फसलों के उत्पादन पर पड़ने वाले जलवायु विज्ञान और जीव-जन्तु के प्रभाव पर भी गौर किया। मैंने एण्डीज का एक वनस्पति वितरण मानचित्र तैयार किया जिसे बाद में सभी ने उत्कृष्ट कहते हुए सराहा। वस्तुतः इस अध्ययन ने ‘उच्चता संबंधी वर्गीभवन (एल्टीट्यूडीनलजोनेशन)’ की अवधारणा का आधार तैयार किया था। जी हां, इस परिघटना की खोज मैंने ही की थी। आज यह आप सबको अपने स्कूल के पाठ्यक्रमों में बड़ी आसानी से मिल जायेगी।

ज्वालामुखी के बारे में मैंने केवल सुन और पढ़ रखा था। मुझे विस्तृत रूप से उसका अध्ययन करने की उत्कट इच्छा थी। अतः मैंने और बोप्ला ने एण्डीज विशेषकर इक्वाडोर में अवस्थित बहुत सारी ज्वालामुखियों को खोजने हेतु यात्राएं प्रारंभ कर दिया। उन ज्वालामुखियों की अलौकिक विशेषताएं इतनी सम्मोहक और उत्तेजनापूर्ण थीं जिनके बारे में मैं शब्दों में नहीं बता सकता। आपको अपने फेफड़ों में गन्धक भरने और अपनी त्वचा को गर्मी से झुलसने का अनुभव प्राप्त करने के लिए उन स्थानों पर जाना भर होगा। लेकिन हमलोग वहां रूके नहीं। अपनी  खोज यात्रा जारी रखते हुए हमलोग लीमा, पेरू से होते हुए दक्षिणी अमेरिका के तटवर्ती क्षेत्र मैक्सिको तक गये। हम वर्ष 1803 में मैक्सिको पहुँचे और मैक्सिको के विभिन्न भागों में सांस्कृतिक भूपटलों पर पड़ने वाले भूआकृतियों के प्रभाव का अध्ययन  करने की कोशिश की। मैंने मैक्सिको के लोगों के बारे में भी लिखा था।

लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका की यात्रा पूरी किये बगैर क्या कोई भी खोज यात्रा पूरी हो सकती है? हम मई, 1804 में फिलाडेल्फिया बन्दरगाह पहुँचे। मैंने डेलावेयर नदी में यात्रा करते हुए जहाज पर लातिन अमेरिका के बारे में अपने गहन अनुभवों के बारे में भी लिखा था, निःसंदेह वह लेखन फ्रेंच में था। इस प्रकार से आगे बढ़ते रहे और हमें करिश्माई अमेरिकी राष्ट्रपति थॉम्स जेफरसन से मुलाकात करने का अवसर मिला। वह वास्तव में एक अति प्रेरणादायी मुलाकात थी। हमलोगों ने वाशिंगटन में और मॉण्टिसेलो स्थित राष्ट्रपति के काउंटी इस्टेट में जेफरसन के मेहमान के रूप में तीन सप्ताह बिताए थे। लोगों का यह भी कहना है कि मैंने उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका देशों के बीच भूमि वितरण के प्रश्न पर जेफरसन को प्रभावित किया था। मैंने अमेरिकियों को पनामा नहर के निर्माण से होने वाले फायदे के बारे में भी सुझाये थे। और मैंने यह भी भविष्यवाणी की थी कि हीरे और प्लैटिनम विशेष प्रकार की भूसंरचनाओं के अन्दर पाये जाते हैं और वैसी संरचनाएं जॉर्जिया, उत्तरी कैरोलीना, वर्जिनिया और कैलिफोर्निया में मौजूद हैं, जो कि बिलकुल सच साबित हुई। लेकिन अब मुझे अपने घर की याद सताने लगी थी और मैं अपने लोगों से मिलना चाहता था। बोप्ला और मैंने यह निर्णय लिया कि चूंकि हमारी पांच वर्षों की लम्बी अमेरिकी खोज यात्रा परिपूर्ण और गहन अनुभवों से भरी रही है, इसलिए हमें इस महाद्वीप को छोड़कर यूरोप की ओर रवाना होना चाहिए और हम वर्ष 1804 में यूरोप के लिए चल पड़े।

घर वापस आने के बाद, वर्ष 1806 के आस-पास इटली में उत्पन्न हुए वेस्युवियस ज्वालामुखी को देखने जाने को छोड़कर मैं हमेशा ही अध्ययन कुर्सी से चिपका रहा। मैंने लम्बे समय तक केवल अपने अनुभवों का दस्तावेज तैयार करने में जुटा रहा। मैंने जो कुछ देखा था, उसे दक्षतापूर्वक संकलित करता गया। मैं ने फ्रेंच में अपने अनुभवों को 30 खंडों में लिखा जिन्हें बाद में विभिन्न भाषाओं में अनुवाद किया गया। अब तक मैं यूरोप में एक जाना-पहचाना नाम बन चुका था। मैं उस समय के बहुत सारे विद्वानों से मिला और उनके साथ सार्थक वाद-विवाद किया जिससे मुझे उत्तम अन्तर्दृष्टि प्राप्त करने में मदद मिली। एक दिन, साठ वर्ष की पक्की आयु में मुझे रूस के जार से निमंत्रण मिला। मेरे हृदय का स्पंदन बढ़ गया था और मेरी यात्रा का दूसरा चरण शुरू होने वाला था क्योंकि मेरे अन्दर का साहस मुझे नई जगह पर जाने के लिए प्रेरित कर चुका था।

रूस की यात्रा

वर्ष 1829 में मैं रूस के लिए खोज यात्रा रवाना हो गया और सेंट पीट्सबर्ग का ऐतिहासिक शहर, लेनिनग्राड पहुँच गया। क्या शहर था। इसकी भव्यता वास्तव में गौरवपूर्ण थी! लेकिन मैं हमेशा की तरह वहीं रूका नहीं रहा। मैंने साइबेरिया के ठंड से भरे गहरे प्रदेश की भी यात्रा की । हां, उसका नाम सुनते ही कई कारणों से आपकी रीढ़ ठंड से सिहर गई होगी। मैंने इसके बारे में उन निःसहाय लोगों से बहुत कुछ सुन रखा था जिन्हें इस निर्जन प्रदेश में देश निकाला दे दिया गया था।

बर्फ से नीचे के तापमान में मेरा बूढ़ा शरीर सुन्न सा हो गया था। लेकिन फिर भी, मैं एक बात से खुश रहता था और मुझे खोज यात्रा जारी रखने हेतु प्रेरणा मिलती रहती थी और वह थी नये स्थान की खोज करने का रोमांच। मैं फिर धीरे-धीरे ऊरल पर्वत और मध्य एशिया के पहाड़ों की ओर बढ़ता गया और वहां से शिथिल होकर कैस्पियन सागर तक नीचे उतर आया। और सबसे बड़ी बात, मुझे मंगोलिया के रहस्यमयी प्रदेश की खोज यात्रा करने का भी अवसर मिल गया। कजान, तोबोलस्क, ओमस्क, बाराबिंसक और टारा की अपनी पूरी खोज यात्रा के दौरान, मंगोलिया को तो छोड़ ही दें, मैंने तापमानों में होने वाले अन्तर को पूरी मेहनत से नोट किया। अनुमान लगायें कि मैंने क्या नोट किया। एक ही अक्षांश की ओर बढ़ते हुए सागर से दूरी के अनुरूप तापमान बदलता रहता है। अतः मैंने रूस के विभिन्न स्थानों से एकत्र किये तापमान संबंधी आंकड़े को जल्दी से संकलित किया और तापमान संबंधी विश्व का पहला मानचित्र तैयार किया। फिर, मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि समपात रेखा किसी रेखांश के अनुरूप नहीं होती। यह मेरे महाद्वीपीय सिद्धान्त, महाद्वीपीय अंतः प्रदेशों में अत्यधिक मौसमी ठंड या गर्मी पड़ने के सिद्धान्त और तटवर्ती क्षेत्रों में पूरे वर्ष भर शीतोष्ण तापमान रहने के सिद्धान्त का आधार था। यह निष्कर्ष इतना अधिक कल्पनापूर्ण था कि मैं विश्व के शिखर पर जा पहुँचा। क्या आपको इस बात की जानकारी है कि इस निष्कर्ष के पश्चात ही मौसम विज्ञान शब्द को भूगोल की पुस्तकों में शामिल किया गया था? जार ने भी मेरे प्रयासों की सराहना की और मेरी ही पहल पर अपने देश के विभिन्न भागों में मौसम संबंधी विभिन्न केन्द्रों की स्थापना करके हमारे विषय क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

मेरी सपनीली परियोजना, कॉस्मोस

विभिन्न स्थानों की खोज यात्रा करने के अपने जीवन का सपना पूरा कर लेने के बाद, अपने जीवन के संध्याकाल में, मैंने एक यात्री के जीवन से निवृत होकर एक लेखक का जीवन अपनाने का फैसला कर लिया। मेरे द्वारा एकत्र किये गये सभी आंकड़ों को संकलित करने का कार्य बड़ा ही विशाल था और उसके लिए काफी समय और एकाग्रता की आवश्यकता थी। ‘कॉस्मोस’ नामक मेरी पुस्तक वर्ष 1845 में प्रकाशित हुई थी। ब्रह्माण्ड पर लिखी गई इस टीका जैसाकि 1800 के मध्य तक इसे एक टीका के रूप में ही जाना जाता था, में मैंने उस समय ज्ञात भौतिक भूगोल के प्रत्येक पहलू को शामिल करने का हरसंभव प्रयास किया था।

मेरे विचार में, प्राकृतिक और भौतिक घटना संबंधी ज्ञान की तीन श्रेणियां हैं – वर्गीकरणात्मक घटना, ऐतिहासिक और भौगोलिक घटना। मैंने एक बहुत सुन्दर शब्द ‘ कॉस्मोग्राफी ’ गढ़ लिया। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है विश्व का भौतिक वर्णन। और अब अनुमान लगाइये कि मैंने इस शब्द को और दो भागों ”यूरानोग्राफी“ और ‘ज्योग्राफी’ में बांट दिया है। ‘ज्योग्राफी’ को मैंने एर्डकुण्डे के रूप में परिभाषित किया है, जो कि जर्मन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है पृथ्वी का विज्ञान या सामान्य तौर पर कहें तो भौतिक भूगोल। मेरे अनुसार भूगोल एक सजीव वस्तु के रूप में विश्व की सामंजस्यपूर्ण एकता को समझने का एक साधन है और इस एकता को‘बहुलता में एकता’ के रूप में परिभाषित किया गया है। इसके अलावा, मेरा यह मानना है कि इस प्रकार की एकता का स्वरूप मानविकी या सरल रूप में कहें तो मानव के आसपास केन्द्रित है।

यूरानोग्राफी क्या है? यह वर्णनात्मक खगोलविज्ञान है जिसके अन्तर्गत ब्रह्माण्ड के दैविक पिण्डों के बारे में अध्ययन किया जाता है। वहीं दूसरी ओर ‘ज्योग्राफी’ का संबंध पृथ्वी के स्थलीय भाग से है। कॉस्मोस यानी विश्व भ्रमण पूरा हो चुका है और अब मुझे प्रशिया के राजा की चैंबरलेन के रूप में सेवा करने का गौरव प्राप्त हुआ है , जैसे  मेरे पिता को भी उनके अन्तिम दिनों में प्राप्त हुआ था। मैं जीवन से अतिसंतुष्ट हूँ क्योंकि मैं वह सब कर चुका हूँ जो मैं करना चाहता था। अपनी खोज यात्रा काल में अनखोजी स्थानों को खोज चुका हूँ और मौलिक अनुभव से प्रत्येक वस्तु के बारे में जाना है।

अब मैं और क्या कहूँ? वैसे तो बहुत सारी बातें हैं लेकिन आज मैं थक चुका हूँ। हो सकता है कि किसी और समय कहीं और हमलोग पुराने समय को फिर से याद करेंगें लेकिन अब मुझे विदा दें ताकि मैं यह जानते हुए शांति से आराम कर सकूँ कि आपलोग अभी भी मुझे ज्ञान से भरी आत्मा के रूप में मानते हैं और इस जेट के युग में भी मुझे याद करने के काबिल समझते हैं |

90 वर्ष की लम्बी आयु में हमबोल्ड्ट की जीवन यात्रा वर्ष 1859 में समाप्त हो गयी , किन्तु वह कभी नहीं मरेंगे क्योंकि अपने कामों के कारण वह हमेशा ही जीवित रहेंगे।

हम्बोल्ड्ट नाम की लोकप्रियता

यह अतिरोचक है, क्या आपने कभी इस पर गौर किया है कि हम्बोल्ड्ट का नाम विश्व के मानचित्र पर किसी भी अन्य व्यक्ति की अपेक्षा कहीं अधिक बार उभर कर सामने आता है। हाँ ,इन सभी विभिन्न स्थानों का नाम इस महान व्यक्ति के नाम पर रखा गया है। अंटार्कटिका में हम्बोल्ड्ट पर्वत श्रेणी, हम्बोल्ड्ट ग्लेशियर (ग्रीनलैंड में सबसे बड़ा), अमेजन क्षेत्र में न्युक्लियो पायनियरो डी हम्बोल्ड्ट अनुसंधान केन्द्र, वेनेजुएला में हम्बोल्ड्ट पर्वत श्रेणी बस थोड़े से उदाहरण हैं। इस सूची में कई नाम जोड़े जा सकते हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका के इलिनोय, आयोवा, केनसास, मिनेसोटा, नेबरास्का, साउथ डकोटा और टेनेसी राज्यों में नौ अलग-अलग शहर हैं जिन सभी को हम्बोल्ड्ट सिटी के नाम से जाना जाता है और कनाडा में दो शहरों के नाम भी वही है। कोलराडो राज्य में हम्बोल्ड्ट शिखर हैं। नेवादा राज्य में एक देहाती जिला, एक पर्वत श्रेणी, एक झील खारा दलदल, नदी और सात राष्ट्रीय वन अभ्यारण के नाम भी उन्हीं के ऊपर रखे गये हैं। ‘कैलिफोर्निया में हम्बोल्ड्ट रेडवुड स्टेटपार्क और एक खाड़ी, न्यूजीलैंड में एक पर्वतश्रेणी, न्यूकैलिडोनिया में हम्बोल्ड्ट शिखर और न्यूगिनी में हम्बोल्ड्ट खाड़ी के नाम भी भूगोल की दुनिया के इस बेजोड़ विशेषज्ञ के नाम पर रखे गये हैं। चीन में भी एक पर्वतश्रेणी का नाम हम्बोल्ड्ट पर रखा गया है। पेरू और चिली के तटवर्ती क्षेत्रों से निकलने वाली धारा और मेयर क्रेटर मेयर हम्बोल्ड्टीएनम के नाम भी इस महान आदमी के नाम से उधार लिए गए हैं। संभवतः किसी और नाम का इतना अधिक उपयोग या दुरूपयोग  नहीं किया गया है। हां, उनके नाम पर हजार से अधिक सांसारिक वस्तुओं के नाम रखे गये हैं।

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