भूगोल और आप

वैश्विक मरुस्थलीकरण व सूखा के विरूद्ध एक प्रयास

विश्व दिवस, 17 जून 2017

समस्त विश्व के कुल क्षेत्रफल का पाँचवां भाग, 20 प्रतिशत मरुस्थली भूमि के रूप में पृथ्वी पर मौजूद है। जबकि सूखाग्रस्त भूमि कुल वैश्विक क्षेत्रफल का एक तिहाई है। संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) द्वारा प्रस्तुत किये गये एक विशेष प्रतिवेदन में बताया गया है कि 130 लाख वर्ग किलोमीटर भूमि क्षेत्र मानव की अविवेकपूर्ण क्रियाओं के कारण रेगिस्तान में बदल गया है। थार के मरुस्थल में प्रतिवर्ष 13000 एकड़ से अधिक भूमि की वृद्धि दर्ज की जा रही है। और, कुछ वर्षों बाद सहारा रेगिस्तान के क्षेत्रफल में भी एक बड़ी बढ़ोतरी हो जायेगी।

संयुक्त राष्ट्र संघ की आम सभा में 1994 में इस सम्बंध में प्रस्ताव रखा गया था कि धरती पर बढ़ती जा रही मरुस्थलीकरण व सूखा से मुकाबला करने के लिए वैश्विक स्तर पर जागरूकता का प्रसार करने की आवश्यकता है, अतः इसके लिए एक विशेष दिन निश्चित किया जाना चाहिए। इसके बाद 17 जून 1995 को पहला ‘मरुस्थलीकरण व सूखा से मुकाबला हेतु विश्व दिवस’ मनाया गया। तब से यह हर वर्ष एक विशेष थीम के साथ मनाया जा रहा है। इस वर्ष विश्व दिवस, 17 जून की थीम है – ‘भूमि अवक्रमण और प्रवास’ (Land Degradation and Migration)। इस बार का सम्मेलन बुर्किना फासो (Burkina Faso) में हो रहा है। इसे वहाँ के पर्यावरण, हरित आर्थिकी और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा आयोजित किया जा रहा है। इस दिवस को मनाने का निहितार्थ है – मरुस्थलीकरण व सूखा से मुकाबला के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग हेतु सार्वजनिक जन-जागरूकता का प्रचार। अफ्रीका व विश्व के अन्य देशों में जहाँ भी मरुभूमि क्षेत्र है और वहाँ की भूमि सूखे का शिकार है, वहाँ इनकी रोकथाम व उन्मूलन निश्चित करना इसका उद्देश्य बन गया है। यह दिवस उन लाखों लोगों की समस्याओं की ओर ध्यान खींचता है जो मरुभूमि अथवा सूखा प्रभावित क्षेत्रों में रहते हैं। वृक्षों का अधिकाधिक काटा जाना और चरागाह क्षेत्रों का अत्यधिक दोहन सूखा की समस्या को जन्म देते हैं और कृषि सशक्तिकरण तथा चरागाहों का संरक्षण व इसमें वृद्धि से सूखा व मरुभूमि में वृद्धि की समस्या को रोका जा सकता है। वैश्विक तापमान में वृद्धि भी इस समस्या में वृद्धि का एक प्रमुख कारण है। 110 से अधिक देशों के एक अरब से अधिक लोग सूखा प्रभावित अथवा मरुभूमि क्षेत्रों में रहते हुए बड़ी कठिन परिस्थितियों में गुज़र-बसर करते हैं। इन क्षेत्रों में रहने वाले 6 करोड़ से अधिक लोग वर्ष 2020 तक उत्तरी अफ्रीका, यूरोप तथा अन्य देशों में विस्थापित हो जायेंगे, ऐसी उम्मीद की जा रही है। अंतर्राष्ट्रीय समस्याएं बढेंगी और पर्यावरण प्रभावित होगा। इस बार विश्व दिवस 17 जून, 2017 के लिए जो थीम रखी गयी है, वह भूमि अवक्रमण तथा प्रवास में सम्बंघ के कारणों का पर्यवेक्षण करेगी। खाद्य असुरक्षा, गरीबी और पर्यावरणीय अवक्रमण प्रवास के लिए जिम्मेदार कारणों में मुख्य हैं।

विश्व का मरुस्थलीय क्षेत्र बिखरा हुआ ना होकर दो अलग-अलग पट्टियों में विभाजित है। इसमें से एक पट्टी उत्तरी गोलार्द्ध में है और दूसरी दक्षिणी गोलार्द्ध में है। इनका विस्तार कर्क रेखा और मकर रेखा के निकट तथा अधिकांशतः 200 से 300 उत्तरी अक्षांशों के मध्य पाया जाता है।

भूमि के मरुस्थल में परिवर्तित करने वाले प्रमुख प्राकृतिक कारण वर्षा ना होने से सूखा पड़ना और तेज गर्म हवाओं का चलना है। आर्थिक विकास हेतु वन सम्पदा को अंधाधुंध काटे जाने से वातावरण में आर्द्रता की कमी हो रही है। पर्यावरणीय दृष्टिकोण से मरुभूमि वाले क्षेत्र कुछ समस्याओं का सामना करते हैं, जो प्रमुख रूप से इस प्रकार हैं – भूजल का अनियमित तथा अत्यधिक दोहन, मृदा की गुणवत्ता में कमी, लवणता में वृद्धि, रेतीले मैदानों का क्षेत्रफल बढ़ना, पौधों की वृद्धि दर कम होना, धूल भरी गर्म आँधियों का चलना, जलवायु में अनिश्चित बदलाव, अत्यधिक ताप व गर्मी तथा न्यूनतम आर्द्रता का होना।

मरुभूमि का निरन्तर विकास होते रहने के कुछ भोगोलिक कारण भी हैं। कम वर्षा तथा जल का वाष्पीकरण अधिक हो जाने से भूमि की लवणता बढ़ती जा रही है। दिन तथा रात के तापमान में अधिक अंतर होने से चट्टानें टूटती हैं और हवाएं रेत को बिखरा देती हैं। वनस्पति प्रायः नहीं पायी जाती, अतः मिट्टी में उवर्रता नहीं होती। धूल के कणों की मात्रा तथा उनके आकार में वृद्धि हो जाने से वर्षा नहीं हो पाती। भूमि की उत्पादक में कमी का कारण गरीबी, वन सम्पदा का क्षरण और खराब कृषि सिंचाई प्रणाली भी है।

मरुस्थलीकरण व सूखा की समस्या को रोकने के लिए हमें कुछ उपायों को अपनाने पर ध्यान देना होगा। सबसे पहले तो हमें धरती की वन सम्पदा का संरक्षण करना होगा और वृक्षों को काटे जाने से रोकना होगा। रिक्त भूमि पर, पार्कों में सड़कों के किनारे, खेतों की मेड़ों पर वृक्षारोपण करना होगा। मरुभूमि में जलवायु अनुकूल पौधों-वृक्षों को उगाना होगा। जल संसाधनों का संरक्षण तथा समुचित मात्रा में विवेकपूर्ण उपयोग करना होगा। कृषि में शुष्क कृषि प्रणालियों का विवेकता से प्रयोग करना होगा। मरुभूमि की लवणता व क्षारीयता को कम करने के लिए वैज्ञानिक उपाय करने होंगे। पशु-चरागाहों पर उचित मानवीय नियंत्रण स्थापित करना होगा। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वतः उत्पन्न होने वाली अनियोजित वनस्पति की कटाई को नियंत्रित करने के उपाय करने होंगे।

मरुस्थलीकरण व सूखा से मुकाबला के लिए विश्व दिवस, वैश्विक स्तर पर जन-जागरूकता फैलाने का ऐसा प्रयास है जिसमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सहयोग की अपेक्षा की जाती है। विश्व बंधुत्व की भावना के साथ इसमें भागीदारी सुनिश्चित करना धरती तथा पर्यावरण को बचाने में एक सार्थक प्रयास हो सकता है।

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