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कार्ल रिट्टर, क्षैत्रीय भूगोल के विचार के संस्थापक

जी हां, मैंने अपनी बारी आने का धैर्यपूर्वक इन्तजार किया है। मुझे हमेशा ही इस पर आश्चर्य होता है कि आप सभी लोग सदैव महान अलेक्जेंडर वॉन हम्बोल्ड्ट के बाद ही मेरे नाम का उल्लेख क्यों करते हैं। हमेशा ही यह लिखा पाया जाता है हम्बोल्ड्ट और कार्ल रिट्टर। इसे विपरीत रूप में क्यों नहीं लिखा जा सकता? कार्ल रिट्टर और हम्बोल्ड्ट – देखिए यह सुनने में कहीं बेहतर नहीं लगता? क्या मेरा योगदान हम्बोल्ड्ट से कम है या आप सब लोग महज इसलिए पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाते हैं क्योंकि मैं उनसे दस वर्ष छोटा हूँ। खैर जो भी, हम इसे भुलाकर आगे बढ़ें।

मेरा जन्म अगस्त 1779 में जर्मनी, जिसे पहले  प्रशिया के नाम से जाना जाता था, के क्वेडलिनबर्ग शहर में हुआ था। ‘अपने समकालीन हम्बोल्ड्ट की’ तरह मेरा परिवार कुलीन नहीं था। मेरे प्रिय माता-पिता ने गोटा के समीप श्नेफेन्थल नामक स्थान पर स्थित एक प्रायोगिक विद्यालय में मुझे यानि कार्ल रिट्टर को पांच वर्ष की आयु में भेज दिया जहां आगे मुझे उस समय के महान चिंतकों के सानिध्य में रहने का अवसर मिला। यहां के शिक्षण पर रूसो और पेस्टालोजी के सिद्धान्तों का प्रभाव था, जिनका सानिध्य पाने का सौभाग्य मुझे बाद में मिला था। संभवतः उन्हीं  कारणों से अपने आस-पास से बाहर की चीजों के बारे में सोचने का मुझे सामर्थ्य मिल पाया था।

उस समय के प्रसिद्ध भूगोलविद् जी.सी.टी. गट्स मथ्स मुझे प्रेमपूर्वक पढ़ाया करते थे। मैं उन व्याख्यानों को कभी नहीं भूल पाऊँगा जब पहली बार उन्होंने व्यक्ति और पर्यावरण के बीच विद्यमान संबंधों के बारे बताया था। हमलोगों ने कई स्थानों की यात्रा की और मैंने बहुत सारी स्थलाकृतियों को देखा और वास्तव में प्रकृति में व्याप्त एकात्मकता से प्रभावित हुआ। हाँ, यह सही है कि मैं विस्मय में पड़ा था! मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी पर्यावरण मानव पर इतना गंभीर प्रभाव डाल सकता है।

भूगोल में मेरी यानि कार्ल रिट्टर की अभिरूचि बढ़ती चली गई। मैंने अपने आस-पास की दुनिया का अध्ययन किया और अपने स्केच के माध्यम से उन सबका विस्तृत विवरण उतारने में महारत हासिल कर ली। उन दिनों मैं देर तक अपने कमरे के सामने बैठा रहकर पूरे मनोयोग से पेंटिंग करता रहता। आप इन पेंटिंगों को कभी और देख लेना।

भाषाओं को जानने के बारे में मेरी जन्मजात प्रवृति ईश्वर का वास्तव में मेरे लिए उपहार था जिसके कारण मैं ग्रीक और लैटिन भाषा का अध्ययन कर पाया। अब मैं उत्कृष्ट चिंतकों के विचारों को अधिक से अधिक विस्तारपूर्वक पढ़ सकता था।

16 वर्ष की आयु में एक धनवान बैंकर के पुत्रों को ट्यूशन पढ़ाने से प्राप्त पैसे से कार्ल रिट्टर विश्वविद्यालय में पढ़ना शुरू कर दिया। वर्ष 1804 में बीस वर्ष की अवस्था पार कर लेने के बाद कार्ल रिट्टर ने  प्रसिद्ध गेटिनजेन विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। इसी विश्वविद्यालय में भूगोलविद प्रसिद्ध हम्बोल्ड्ट ने भी अध्ययन किया था।कार्ल रिट्टर ने  भी उन्हीं की तरह इतिहास, भूगोल, वनस्पति विज्ञान, भौतिकी, रसायन और खनिजशास्त्र सहित विभिन्न विषयों का अध्ययन किया।

यदि आपको आश्चर्य लग रहा है तो यह जान लीजिए कि हम्बोल्ड्ट से मेरी मुलाकात उसी वर्ष हुई थी। मुझे अभी भी वर्षा से भरपूर भीगे  शुक्रवार की दोपहर याद है जब मेरे एक बहुत अच्छे दोस्त ने मेरा महान वॉन हम्बोलड्ट से परिचय कराया था। बिल्कुल सही बात है, मैं इससे इनकार नहीं कर सकता कि मैं इस व्यक्ति की बहुमुखी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुआ था। लेकिन फिर भी, मुझे हम्बोलड्ट जैसी विस्तृत यात्रा करने की इच्छा या यों कहिए कि धुन नहीं थी। मैंने उनके साथ बहुत सारी विस्तृत चर्चा की और उनके द्वारा यात्रा किये गये स्थानों और वहां के समाजों के बारे में मौलिक जानकारी प्राप्त की। वस्तुतः उनके द्वारा कहे गये एक-एक शब्द मेरे मनमस्तिष्क में समा गये थे और बाद के वर्षों में मैं उन शब्दों को समय-समय पर दोहराया करता था।

हाँ, वर्ष 1807 मेरे लिए कई मायने में अतिमहत्वपूर्ण वर्ष था। मेरी पहली पुस्तक जिस पर मैं वर्ष 1804 से लगातार चार वर्षों तक कार्य करता रहा था, अन्ततः प्रकाशित हो ही गई। उस पुस्तक में था क्या ? वह यूरोप के भूगोल के बारे में लिखी गई पुस्तक थी। मैं प्रिंट रूप में पुस्तक को देखकर तो रोमांचित था ही बल्कि शैक्षणिक दुनिया में भी उस पुस्तक को काफी प्रशंसा मिली थी।

कार्ल रिट्टर अब तक एक जाना-पहचाना नाम बन चुका था। मैं अति गौरवान्वित महसूस करने लगा कि मेरे प्रयासों को धीरे-धीरे पुरस्कृत किया जाने लगा था। जी हाँ, मैं भावी पीढ़ी को सभी प्रकार की वैज्ञानिक विषमताओं से भरे देशों और शहरों के बारे में दिए तथ्यों के पारंपरिक नीरस सारांश के स्थान पर एक नये वैज्ञानिक भूगोल की शिक्षा देना चाहता था। मैं अपने शैक्षणिक सर्किल से संतुष्ट था जहां मैं अपने कई मित्रों के साथ उनके अनुभवों के बारे चर्चा, वाद-विवाद और विचार -विमर्श कर सकता था। उनमें खगोल विज्ञानी समरिंग, भूगर्भविज्ञानी ईबेल और मेरे प्रिय शिक्षा सुधारक, प्रो. पेस्टालॉजी के नाम प्रमुख थे। हालांकि, मैंने एक व्यवसाय के रूप में बहुत बाद में वर्ष 1818 के आस-पास पढ़ाना शुरू किया था और प्रबुद्धयुवा चेहरों से भरे मेरे व्याख्यान हॉलों को देखकर मुझे बहुत खुशी मिलती थी और अपना जीवन मुझे अतिमूल्यवान और विस्मयकारी लगता था।

खैर, मेरे पहले प्रकाशन के चार वर्षों के बाद मेरा दो खंडो वाला दूसरा प्रकाशन भी आया जोकि एक बार फिर यूरोप के भूगोल के बारे में था। हां, 1811 मेरे लिए एक दूसरा अच्छा वर्ष रहा। लेकिन फिर, आगे मुझे लिखने की सबसे बड़ी प्रेरणा मिली। जो भी अवधारणा मैंने विकसित की थी उसके आधार मुझे बहुत कुछ लिखने की इच्छा होने लगी थी जिसके कारण मुझे अपने द्वारा पहले लिखी गई पुस्तक तुच्छ नजर आने लगी थी। पहली बार मैं पूरी तरह समझ पाया था कि धुन क्या होती है।

हम्बोल्ड्ट से मुलाकात होने के बाद उनके द्वारा गढ़ा गया ‘एर्डकुण्डे’ शब्द मेरे दिमाग में नाचता रहा। मैं वर्षों तक उसके बारे में विचारमग्न रहा और अन्ततः छः वर्षों की कड़ी मेहनत के बाद मेरी महानतम पुस्तक प्रकाशित हुई। वर्ष 1817 में मेरी प्रमुख पुस्तक ‘डाई एर्डकुण्डे’ या अर्थ साइंस जो विश्वभर में प्रचलित ‘ज्योग्राफी’ का शाब्दिक जर्मन अनुवाद था, का पहला खंड प्रकाशित हुआ था।

मैं इसे विलक्षण अध्ययन की वस्तु बनाना चाहता था। मैं अपनी पुस्तकों के पृष्ठों में सम्पूर्ण विश्व को कैद कर लेना चाहता था। यह विश्व की एक बेजोड़ भूगोल की पुस्तक होगी। मैं, लिखता चला गया और मेरी पुस्तक के 19 खंड तैयार हो गये जिनमें 20,000 पृष्ठ थे। और एक चीज। मुझे यह कहने में कोई शर्म नहीं है कि मैंने अपनी पुस्तक में हम्बोल्ड्ट के अनुभवों का भरपूर उपयोग किया। लेकिन उन्होंने कभी भी इतिहास और भूगोल के बीच के सम्पर्क को महसूस नहीं किया। मुझे उसके बारे में अच्छी अनुभूति थी। आज आपलोगों को इन दोनों विषयों के बीच के अंतर्सबंध की कहीं अच्छी जानकारी होगी परन्तु कार्ल रिट्टर और हम्बोल्ड्ट के  समय में यह इतना स्पष्ट नहीं था।

मुझे यह महसूस ही नहीं हो सका कि वर्ष दर वर्ष किस प्रकार बीतते चले गये। मैं अपने विचारों को कागजों में उतारने में इतना लीन हो गया कि मुझ पता ही नहीं चल पाया कि वर्ष 1817 कैसे वर्ष 1859 में तब्दील हो गया। एक दिन अपने कार्यों पर नजर डालते हुए मेरी नजर दरवाजे पर लगे शीशे से टकरायी तो मैं एक बूढ़े व्यक्ति को अपनी ओर घूरते देखकर आश्चर्य चकित हो उठा। अस्सी वर्षों का लम्बा समय मुझे बिल्कुल बीते कल के समान प्रतीत हो रहा था।

यदि आप कभी मेरी पुस्तकों को पढ़ेगें तो आप पायेंगे कि मेरी सभी पुस्तकों में ईश्वर के प्रति विश्वास झलकता है। मेरा यानि कार्ल रिट्टर का दृढ़ विश्वास है कि इस पृथ्वी पर सभी कुछ ईश्वर की योजना के अनुसार ही होता है।

‘विविधता में एकता’ मेरा मौलिक दृष्टिकोण था। इस विश्व के प्रत्येक सजीव और निर्जीव संघटकों के बीच निश्चित तौर पर सामंजस्य विद्यमान रहता है भले ही वह उतना स्पष्ट नहीं दिखे। अब किसी भी प्रकृति से घिरे क्षेत्र को देखें। क्या आपको इस घिरे हुए क्षेत्र में प्रकृति और संस्कृति का संगतपूर्ण समावेश नजर नहीं आता? आपको अवश्य नजर आयेगा! हां, इस क्षेत्र में निवास करने वाली प्रजातियों की भी कुछ खास विशेषताएं होती हैं, विचित्रता का आभाव केवल उन्हीं को होता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि आप मुझे एक क्षेत्रीय भूगोलविद् के रूप में जाने।

लेकिन आप यह नहीं सोचें कि मैं सारा जीवन लिखता ही रहा। मैंने अन्य कार्य भी किये। किस प्रकार के कार्य? देखिये, वर्ष 1819 में मुझे यूनिवर्सिटी ऑफ फ्रैंकफर्ट में इतिहास के प्रोफेसर का पद दिया गया था और अगले वर्ष जर्मनी के बर्लिन विश्वविद्यालय में भूगोल का विभागाध्यक्ष नियुक्त किया गया था। युवा व्यक्तियों को पढ़ाने का मेरा स्वप्नः अन्ततः सच साबित हुआ। मेरे व्याख्यान हॉल हमेशा भरे रहते थे। एक शिक्षक को और क्या चाहिए? आप अनुमान लगाइये कि 1840 के आस-पास मेरा व्याख्यान नियमित रूप से कौन सुनने आता था। हां, बिल्कुल ठीक, वह महान हम्बोल्ड्ट ही थे। उन्हीं दिनों उनके द्वारा कॉस्मोस पर दिये जाने वाले कुछ व्याख्यान को सुनने मैं भी जाता था। जिस दिन व्याख्यान से हम्बोल्ड्ट अनुपस्थित रहते थे, छात्रों की टिप्पणी होती थी, “ओह उनकी मुलाकात राजा के साथ हो रही होगी।”  मैं बहुत से संस्थानों में विशिष्ट पद धारण किये हुए था। एक ऐसा संस्थान बर्लिन ज्योग्राफिकल सोसायटी भी था जिसकी स्थापना मैंने ही की थी।

और ऐसा भी नहीं है कि मैंने यात्रा बिल्कुल ही नहीं की थी। यद्यपि, मैं इस बात से सहमत हूँ कि मैंने हम्बोल्ड्ट और अन्य व्यक्तियों द्वारा दिए गए विवरणों पर अत्यधिक विश्वास किया था। लेकिन मेरा विश्वास कीजिए, मैंने स्विटजरलैंड की संकीर्ण घाटी और इटली के गर्म प्रदेश की यात्रा की थी।

अब आज मैं यहीं समाप्त करता हूँ क्योंकि चमकीले देवदूत मुझे आवाज दे रहे हैं। स्वर्ग वास्तव में एक महान स्थान है। यदि आप कार्ल रिट्टर के  बारे में और अधिक जानना चाहते हैं तो कृप्या पुस्तकालयों में जाइये। इससे मुझे वास्तव में बहुत प्रसन्नता मिलेगी।

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