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छत्तीसगढ़ राज्य में जनजातियों की स्थिति

छत्तीसगढ़ राज्य का  लगभग एक तिहाई जनसंख्या जनजातियों की है। 16 प्रतिशत जनसंख्या अनुसूचित जातियों की है जबकि 42 प्रतिशत जनसंख्या अन्य पिछड़ी जातियों की है। इसकी 80 प्रतिशत जनसंख्या ग्रामीण क्षेत्रों  में निवास करती है और आजीविका के साधन के रूप में मुख्यतः कृषि पर निर्भर करती है। यद्यपि बीते कुछ वर्षों के दौरान छत्तीसगढ राज्य के कुल घरेलू उत्पाद में प्राथमिक क्षेत्र की हिस्सेदारी बढ़ी है, जबकि द्वितीयक क्षेत्र में हिस्सेदारी उत्तरोतर बढ़ती जा रही है, जो कि इस बात का द्योतक है कि राज्य में औद्योगिक विकास हो रहा है, हालांकि कृषि अभी भी हजारों जनजातियों की मुख्य आजीविका है।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण द्वारा प्रस्तुत किए गए वर्ष 2004-05 के आंकड़े के अनुसार, शादी करने जैसी सामाजिक विशेषताओं के मामले में जनजाति और गैर-जनजाति लोगों के बीच बहुत अधिक अन्तर नहीं है, लेकिन साक्षरता तथा शिक्षा प्राप्त करने के मामले में जनजाति और गैर-जनजाति के बीच यह अन्तर झलकता है। जनजातिय महिलाओं की स्थिति पुरूषों की तुलना में गैर-जनजातिय महिलाओं के समान है जो कि यह दर्शाता है कि महिलाएं चाहे जनजातिय हों अथवा गैर-जनजातिय हों, शैक्षणिक दर्जे के मामले में वे पिछड़ी हुई हैं।

कुल मिलाकर स्थिति यह है कि गैर-जनजातिय  पुरूषों में 28 प्रतिशत निरक्षर हैं और इसकी तुलना में 41 प्रतिशत जनजातिय पुरूष निरक्षर हैं जबकि गैर-जनजातिय महिलाओं तथा जनजातिय महिलाओं में निरक्षर महिलाओं का प्रतिशत क्रमशः 50 और 60 है।

2001 की जनगणना के अनुसार स्थानिक तौर पर अनुसूचित जनजाति की साक्षरता दर में कुल वृद्धि 1991 की जनगणना की तुलना में लगभग दोगुनी थी। यह प्रतिशतता राष्ट्रीय स्तर पर सभी जनजातियों की प्रतिशतता से भी अधिक है। छत्तीसगढ़ की जनजातियों में पुरूषों तथा महिलाओं की साक्षरता अधिक है, जो यह दर्शाता है कि उनके यहां लम्बे समय से जनजातियों में साक्षरता प्राप्त करने के अवसर मौजूद रहे हैं और इसका श्रेय वहां मौजूद मिशनरी संस्थाओं को दिया जा सकता है। इसके जनजातिय चरित्र के साथ इसकी कहीं अधिक लैंगिक समानता वाली संरचना से आशय है कि पारम्परिक विकास के पैमाने पर पीछे रहने के बावजूद, छत्तीसगढ़ राज्य ने महिलाओं के कल्याण से संबंधित क्षेत्रों जैसे कि कुल प्रजनन दर, मातृ मृत्यु के जीवन पर्यन्त जोखिम, सुरक्षित ढंग से बच्चा जनने, 0-6 का लिंग अनुपात और उत्पादात्मक कार्य में भाग लेने की महिलाओं की स्वतंत्रता के मामले में समुचित तौर पर अच्छा कार्य किया है। वस्तुतः इंडिया रिपोर्ट के अनुसार, ए.आर.चौरसिया और एस. सी. गुलाटी द्वारा 2007 में जनसंख्या की स्थिति के सम्बन्ध में किया गया आंकलन यह दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ राज्य प्रजनन दर के मामले में दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात और हरियाणा जैसे कहीं अधिक विकसित राज्यों की श्रेणी में स्थान प्राप्त करने वाला है।

यद्यपि अन्य पैरामीटरों से सम्बंधित आंकड़ों का ग्राफ नीचा है क्योंकि छत्तीसगढ़ राज्य में जनजातिय महिलाओं और गैर-जनजातिय महिलाओं की स्थिति अलग-अलग है, किन्तु कई मामलों में महिलाओं की स्थिति समान दिखती है जिससे जनजाति और गैर-जनजाति का भेद नहीं दिखता। आमतौर पर साक्षरता, शिक्षा और कार्यशक्ति जैसी विशेषताओं के मामले में जनजातिय पुरूष अपनी महिलाओं की तुलना में आगे हैं और सबसे अधिक सुविधा सम्पन्न वर्ग के रूप में गैर-जनजातिय पुरूष उभर कर सामने आ रहे हैं।

छत्तीसगढ़ राज्य में व्याप्त गरीबी के उच्च स्तर के बावजूद, शहरी क्षेत्रों में इन बीते वर्षों के दौरान गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई है। दुर्भाग्यवश ग्रामीण आंकडे़ पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं लेकिन राज्य में कुल गरीबी का स्तर वर्ष 2004-05 में 41 प्रतिशत था जो वर्ष 2005-06 में 38 प्रतिशत हो गया, इस प्रकार से वहां गरीबी के स्तर में केवल 2 प्रतिशत की कमी आई । ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी के स्तर में कोई खास कमी नहीं आई है। योजना आयोग ने  वित्तीय वर्ष 2005-06 में छत्तीसगढ राज्य  के लिए 42.75 करोड़ रूपये का योजना परिव्यय अनुमोदित किया था, जो कि वर्ष 2004-05 में आवंटित 3322 करोड़ रूपये की तुलना में 29 प्रतिशत अधिक है, इसके पीछे तर्क यह दिया गया था कि केन्द्रीय संसाधनों के बिना राज्य गरीबी मिटाने तथा संरचना सुधारने की दिशा में अपनी प्रतिबद्धता को पूरा नहीं कर सकता।

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