भूगोल और आप | भूगोल और आप फ्री आर्टिकल |

कागज उद्योग को स्वच्छ बनाना

एओएक्स अवशिष्टों  को सीमित करना

अध्ययनों से यह पता चला है कि एण्डजोरेबल आँरगेनिक हेलाइडस (एओएक्स) को जैविकरूप से सक्रिय और छोटे-छोटे यौगिकों में तोड़ा जा सकता है, और उन यौगिकों को ग्रहण करने वालों पर दीर्घकालिक विषैला प्रभाव पड़ सकता है। अतः लुगदी और कागज उद्योगों से निकलने वाले अवषिश्टों को नियंत्रित करने तथा उन अविशिष्टो  को बहाने पर रोक लगाने हेतु कानून की जरूरत है।

पर्यावरणीय दबाव बढ़ते रहने के कारण इस बात की तत्काल जरूरत है कि कागज के मिलों में क्लोरीन से लुगदी का विरेचन करने के दौरान बनने वाले क्लोरीनयुक्त फेनोलिक यौगिक निर्मित होने के प्रतिकूल प्रभावों की पहचान की जाये। यह बात भलीभांति स्थापित हो चुकी है कि अवशिष्ट तथा अन्तिम रूप से तैयार उत्पाद में भी मौजूद क्लोरीनयुक्त कार्बनिक यौगिकों का जीव-जन्तु और पेड़-पौधों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। स्कैन्डिनेवियाई देशों, कनाडा और अमेरिका स्थित मिलों ने विरेचन के दौरान पैदा होने वाले विषैले रसायनों के परिणामों की पहचान की है तथा विगत के दो दशकों के दौरान आण्विक क्लोरीन के प्रयोग को धीरे-धीरे समाप्त कर दिया है। आज वे लोग धीरे-धीरे पूरी या तात्विक रूप से क्लोरीनमुक्त (टीसीएफ/ईसीएफ) विरेचन तकनीकों को अपनाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

पृष्ठभूमि

1970 के दशक के प्रारंभ में जब परिमापन तकनीक उपलब्ध हो गयी और मछलियों के भंडार जो संयंत्र के अवशिष्टों को ग्रहण करते हैं, के अन्तर्गत क्लोरीनयुक्त फेनोलिक्स की उच्च सांद्रता पाई जाती है। परिणामतः पर्यावरणीय नियामक प्राधिकरण सक्रिय हो गयी और मिल अवशिष्टों को बाहर निकालने से पूर्व उसमें मौजूद क्लोरा-अवयवों में कमी लाने हेतु मानदण्ड और दिशा-निर्देश तैयार कराए। लुगदी को धोने की प्रक्रिया में सुधार लाने हेतु प्रौद्योगिकियां विकसित करने के भी प्रयास किए गए ताकि विरंजन संयंत्र में लुगदी भेजने के दौरान बह जाने वाले कार्बनिक पदार्थ की मात्रा में कमी लाई जा सके।

विकसित देशों में अधिकतर मिलों ने अपने अवशिष्टों में क्लोरीनयुक्त फेनोलिक्स की मात्रा कम करने हेतु नई लुगदी और विरंजन तकनीक अपना ली है।

बांध-पट्टी का विस्तार, तात्विक रूप से क्लोरीन मुक्त विरंजन उपचयात्मक क्षार धातु निष्कर्षण विरंजन, लुगदी धोने की प्रक्रिया में सुधार आदि कुछ नई प्रक्रियागत प्रौद्योगिकियां हैं। साथ ही तात्विक क्लोरीन के प्रयोग को धीरे-धीरे बन्द कर दिया गया तथा पूरी तरह से क्लोरीन मुक्त विरंजन प्रक्रिया को अपना लिया गया। जबकि अधिकतर भारतीय कागज मिलों में तात्विक क्लोरिन का उपयोग जारी है।

भारतीय परिप्रेक्ष्य

सत्तर के दशक के प्रारंभ में, कागज की मांग बढ़ने तथा वन आधारित कच्चे माल की भीषण कमी के कारण भारत सरकार ने गैर-पारम्परिक कृषि अवशिष्टों और रेशेयुक्त कच्चे माल पर आधारित छोटे-छोटे कागज मिलों की स्थापना को प्रोत्साहन दिया। इसके परिणामस्वरूप, कागज तथा कागज के गत्तों की बढ़ी मांग को पूरा करने के लिए बहुत सारे 5-30 टन/दिन की क्षमता वाले बहुत सारे छोटे-छोटे कागज के मिल स्थापित किए गए। पुराने उपकरण तथा कागज की मशीनों का आयात किया गया जिनका मूलडिजाइन वन आधारित कच्चे मालों को संसाधित करने वाला था। जाहिर है कि इसका प्रौद्योगिकीय स्तर कृषि अवशिष्टों को कुशलतापूर्वक संसाधित करने हेतु समुचित नहीं था। इस प्रकार से इन मिलों ने रसायन रिकवरी प्रणाली के बिना ही प्रचालन शुरू कर दिया तथा उनमें ऐसी लुगदी का उत्पादन होने लगा जिनमें लिगनिन की अधिकता हुआ करती थी जिसे बाद में विरंजन के चरण में हटाया जाता था। लुगदी धोने की विद्यमान प्रणाली में दक्षता का अभाव है। इन अन्तर्निहित कारणों से, कृषि अवशिष्टों से तैयार लुगदी को विद्यमान ब्राउन स्टाँक धोवन मशीनों से धोना कठिन है।

1980 के दशक में, इन छोटे-छोटे मिलों से काले-काले तरल पदार्थों के विसर्जित होते रहने के परिणामों के बारे में महसूस किया जाने लगा और उद्योगों को विसर्जन मानदंडों के अनुरूप अपने अपशिष्ट जल का उपचार करने के लिए बाध्य किया जाने लगा। इस श्रेणी के मिलों में जल की खपत 125 से 175 मीटर3/टन तक थीं जिसके कारण अवशिष्टों के भारी मात्रा को सम्हालने तथा उपचार करने से संबंधित समस्यायें उत्पन्न होने लगी। आज अधिकतर लुगदी और कागज मिलों ने अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ा ली है और उनमें प्रतिदिन 50-100 टन कागजों का उत्पादन हो रहा है। पर्यावरणीय जागरूकता बढ़ने के कारण ये मिलें अपने ब्लैक लीकर का ट्रीटमेंट करने के लिए आर्थिक रूप से लाभप्रद रसायन रिकवरी प्रणाली या लागत प्रभावी तरीकों को अपनाना चाह रहे हैं।

भारतीय कागज उद्योग जिनमें मुख्यतौर पर 25 प्रतिशत लकड़ी, 45 प्रतिशत अन्य सामग्रियों तथा लगभग 30 प्रतिशत रद्दी कागजों का उपयोग किया जाता है, द्वारा लुगदी का विरंजन आण्विक क्लोरीन और कैल्सियम हाइड्रोक्लोराइड जैसे रसायनों की सहायता से किया जाता है, जिसके कारण क्लोरोयौगिक पैदा होते हैं। 50-200 किग्रा तक क्लोरीन का उपयोग किया जाता है क्योंकि सामान्य तौर पर यह देखने में आया है कि लकड़ी के रेशे की तुलना में गैरलकड़ी के रेशे को विरंजित करना अधिक कठिन है। भारत में लगभग 2.5 मिलियन टन रासायनिक लुगदी का उत्पादन होता है, इनमें से 60 प्रतिशत लुगदी काफी चमकदार तथा विरंजित की होती हैं और उनके विरंजन में अधिकतर क्लोरीन और क्लोरीन आधारित रसायनों का प्रयोग किया जाता है। विभिन्न कच्चे मालों के लिए कुल क्लोरीन आवश्यकता के बारे में नीचे दिया गया है।

क्लोरीनयुक्त फिनोलिक यौगिकों के विषैले प्रभाव

विरंजन प्रक्रिया के दौरान बने क्लोरोफेनालों के स्वरूप और उनकी मात्रा का निर्धारण मुख्यतः लुगदी में बचे लिगनीन की मात्रा और प्रयोग में लाये गये विरंजक रसायनों के प्रकार के द्वारा किया जाता है। जबकि, मिल के द्वारा विसर्जित किए जाने वाले अवशिष्टों द्वारा लम्बे समय से जलीय जीवन में भीषण, गंभीर और उत्परिवर्तजनीय (म्युटेजेनिक) विषैलापन पैदा होता है। अध्ययन से यह पता चला है कि एओएक्स को जैविक रूप से सक्रिय और छोटे-छोटे यौगिकों में तोड़ा जा सकता है और उन यौगिकों को ग्रहण करने वालों पर दीर्घकालिक विषैला प्रभाव पड़ सकता है।

क्लोरोफेनालिक्स

प्रयोगशाला और फील्ड में किए अध्ययनों से यह पता चला है कि क्षार-धातु निष्कर्षण विरंजक अवशिष्ट में मौजूद क्लोरीनयुक्त यौगिक 90 प्रतिशत से अधिक विषैलेपन के लिए जिम्मेदार हैं। विशेषकर ट्राइक्लोरोफेनाल, ट्राई और टेड्रा क्लोरोग्युकोल्स मछली के अन्दर जमा हो सकते हैं और उन्हें खाने पर विषैली प्रतिक्रिया होने की संभावना हो सकती है। क्लोरीनयुक्त फेनोलिक्स के बीच पालीक्लोरीनेटेड डायोक्सीन और फ्युराॅन्स, डायोक्सीन और डाइबेनजोफ्युरान्स क्लोरो-फीनाल्स के ऐसे समूह हैं जो भीषण प्रभाव पैदा करते हैं।

तेल आधारित लुगदी मिलों में कुल मिलाकर ब्राउन डिफारमर्स को ऐसे यौगिकों के संभावित स्रोतों के रूप में पहचान की गई है। प्रयोगशाला अध्ययन ऐसे यौगिकों में भारी वृद्धि की ओर इशारा करते हैं जब तात्विक क्लोरीन खपत प्रति टन लुगदी में 10-15 किग्रा से अधिक हो  जाती है। यद्दपि एओएक्स के 100वें भाग में डायोक्सीन मात्रा 0.1 भाग से भी कम होता है, वे अवकर्षण के प्रतिरोधी होते हैं और जैविक निक्षेप के मामले में ऐसा होने की संभावना बनी रहती है जिसके कारण चूहे में कैंसर विकसित हो सकता है लेकिन मानवों पर इसका प्रभाव वाद-विवाद के केन्द्र में रहा है।

कार्सिनोजेनिक और म्युटेजेनिक यौगिक

विरंजक संयंत्र अवशिष्टों में क्लोरोफार्म और कार्बन टेट्राक्लोराइड होता हैं जिन्हें कार्सिनोजेन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। विभिन्न क्लोरीनयुक्त बेंजीनों, फेनालों, इपोजाइसटियरिक अम्ल और डाइक्लोरोमीथेन को भी संदेहास्वाद कार्सिनोजेन के रूप में वर्गीकृत किया गया है। कुछेक क्लोरीनयुक्त यौगिकों को भी मजबूत म्युटेजनों के रूप में पहचान की गई है।

विरंजक संयंत्र अवशिष्टों के जैविक प्रभाव विषैले यौगिकों की स्थिरता तथा जैविक की प्रवृत्ति पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण होते हैं।

सिफारिशें

सीपीसीबी द्वारा रासायनिक रिकवरी प्रणाली के बगैर चल रहे छोटे कागज मिलों जो कृषि अवशिष्ट पदार्थों, रद्दी कागजों और बाजार में उपलब्ध लुगदी से लिखने और मुद्रण एवं विशेष प्रकार के कागजों का उत्पादन वाले छोटे-छोटे कागज मिलों का विस्तृत अध्ययन किए गए। प्रौद्योगिकी और एओएक्स के स्तर के आधार पर निम्नलिखित सिफारिशें की थी:

विद्यमान लुगदी धोवन प्रणालियों की कार्यकुशलता असंतोषप्रद पाई गई क्योंकि उनमें लुगदी के साथ ब्लैक लिकर भारी मात्रा में आ जाता है। उन्नत लुगदी धोवन प्रणाली के माध्यम से लुगदी मिलों द्वारा ब्लैक लिकर के विसर्जन की मात्रा कम किए जाने की जरूरत है ताकि क्लोरीन की खपत कम हो सके।

मिलों द्वारा समुचित उपकरण का प्रयोग किए जाने तथा लुगदी का विरंजन के लिए अधिकतर दशाओं का पालन किए जाने की जरूरत है। विरंजन के लिए हाइपोक्लोराइड का ही प्रयोग करने वाले मिलों को पारंपरिक विरंजन प्रक्रियाओं का उपयोग करना चाहिए।

रासायनिक यांत्रिक लुगदी से विशिष्ट प्रकार के कागज बनाने वाले मिल को अधिक मात्रा में रासायनिक लुगदी का उत्पादन करना चाहिए जिसे उपापच्यात्मक विरंजन प्रणाली द्वारा हल्का बनाया जाना चाहिए ताकि एओएक्स के विसर्जन में कमी आ सके। मिलों को अपनी क्षमता का विस्तार करने की जरूरत है ताकि वे रासायनिक रिकवरी प्रणाली अधिष्ठापित करने में समर्थ हो सकें। यदि यह संभव नहीं हो तो इन मिलों को अविरंजित प्रकार के कागज का उत्पादन करना  चाहिए या विरंजन योग्य रासायनिक लुगदी के उत्पादन में कमी लाना चाहिए।

भारत सरकार के वन और पर्यावरण मंत्रालय ने विगत के वर्षों में एओएक्स के उत्सर्जन में हुई कमी को देखते हुए छोटे लुगदी और कागज उद्योगों द्वारा किए जाने वाले एओएक्स विसर्जन के मानक अधिसूचित किए हैं। अधिसूचना की तिथि से कागज के प्रति टन उत्पादन में एओएक्स के विसर्जन की मात्रा तीन किलोग्राम  तक सीमित कर दी गई है और फिर मार्च, 2006 से इसे और कम करके प्रति टन दो किलोग्राम तक सीमित कर दिया गया है।

कानूनी हस्तक्षेप

विकसित देषों में पर्यावरणीय नियामक प्राधिकरणों ने लुगदी तथा कागज उद्योग से क्लोरीनयुक्त कार्बनिक यौगिकों के विसर्जन में कमी लाने हेतु सुनियोजित रणनीतियां तथा दिशा-निर्देश बनाए। हाल ही में अमेरिका की पर्यावरण संरक्षण एजेन्सी (ईपीए) ने अविशिष्टों  में एओएक्स, डायोक्सीन और 12 अन्य क्लोरीनयुक्त कार्बनिक यौगिकों के विसर्जन के मामले में दिशा-निर्देश जारी किए हैं। भारत में वर्ष 1992 में केन्द्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने बड़े लुगदी और कागज मिलों के लिए कुल कार्बनिक क्लोरीन (टीओसीआई) के रूप में क्लोरो-कार्बनिक यौगिकों के विसर्जन की सीमा प्रति टन उत्पाद पर दो किलोग्राम तय करने का प्रस्ताव किया था। जबकि प्रमुख चूककर्ता छोटे और अति लघु संयंत्र के क्षेत्र में है जो अभी भी कानून मानने तथा जल स्रोतों में क्लोरीनयुक्त फिनोलिक यौगिकों के विर्सजन को नियंत्रित करने से बच रहे हैं।

Post a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

*

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.