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जलवायु परिवर्तन का समुद्री मत्स्ययन पर प्रभाव

मत्स्ययन पर जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के बारे में पता लगाने हेतु अनुसंधान चल रहे हैं। हालांकि, मछली स्टॉकों और उनके अभिगमनों पर वैश्विक तापवृद्धि के प्रभावों के बारे में भविष्यवाणी कर पाना काफी कठिन कार्य है।

जलवायु परिवर्तन का मत्स्ययन पर भारी प्रभाव पड़ सकता है जिसके भारत में जनसंख्या के बड़े वर्ग के खाद्य और आजीविका सुरक्षा के लिए दूरगामी परिणाम होंगे।

अभी कई वर्षों से वैश्विक तापवृद्धि हमारे लिए चिंता का विषय रही है। इस शताब्दी के दौरान जो वैश्विक तापवृद्धि होने का अनुमान है, वह वातावरण तक ही सीमित नहीं रहेगी, महासागर भी अधिक गर्म होंगे। अगले 50 वर्षों में भारतीय समुद्र के तापमानों में 1 से 30 की वृद्धि हो सकती है। सागर अम्लीकृत हो सकते हैं, उनका खारापन बढ़ सकता है, सागर तल में वृद्धि हो सकती है और उनकी धाराएं बदल सकती हैं। अब इस बात को व्यापक मान्यता मिल चुकी है कि इसके मत्स्ययन पर प्रभाव तो पड़ेंगे ही, इसके लाभ और हानि दोनों ही होंगे। मत्स्ययन जो मूलतः शिकार का ही एक विकसित रूप है जो पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है, वह क्या देगा और क्या नहीं देगा यह अधिक महत्वपूर्ण है। इसलिए मत्स्ययन पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव कठोर हो सकते हैं। इस प्रकार के परिवर्तनों से मछली के अभिगमन और अधिवास के प्रभावित होने की संभावना है, कुछ स्थानों पर उनके स्टॉक बढ़ सकते हैं, तो कहीं पर कम हो सकते हैं, संभवतः स्टॉक का नए अधिवासों में स्थायी विस्थापन हो सकता है। मत्स्ययन पर जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के बारे में पता लगाने हेतु अनुसंधान चल रहे हैं। हालांकि, मछली स्टॉकों और उनके अभिगमनों पर वैश्विक तापवृद्धि के प्रभावों के बारे में भविष्यवाणी कर पाना काफी कठिन कार्य है।

मत्सययन पर जलवायु परिवर्तन का प्रभाव

मछली की संख्या पारिस्थितिकी प्रणालियों के साथ जुड़ी है, जहां वे उपभोक्ताओं के साथ-साथ बड़ी मछली सहित अन्य जीवों के शिकार की भूमिका निभाती हैं। वैश्विक तापवृद्धि से मत्स्ययन के कारणात्मक श्रृंखला में दो मुख्य अनिश्चितताएं हैं। पहला, महासागर तापमान और धाराओं पर प्रभाव न सिर्फ परिणाम, बल्कि संभवतः दिशा पर भी निर्भर है। दूसरे, यदि हमें तापमान और समुद्री धाराओं के बारे में पता भी चल जाए, तो भी यह जरूरी नहीं है कि हम मछली के स्टॉकों की प्रचुरता एवं अभिगमनों पर प्रभाव के बारे में जान ही पाएं। तो भी, ऐसा लगता है कि मत्स्ययन पर जलवायु परिवर्तन के संभावित परिणामों के बारे में कम अनुसंधान किया गया है।

अधिकतर मछली प्रजातियों के उनके मूल उपापचय और भोज्य जीवों की उपलब्धता से संबंधित अधिकतम तापमानों की श्रेणी काफी सीमित होती है। प्रजातियों पर निर्भर करते हुए समुद्री दशाओं में परिवर्तनों के साथ ही उनके अधिवास के क्षेत्रफल में वृद्धि हो सकती है, कमी आ सकती है या फिर अधिवास बदल सकता है।

मछली के लिए जलवायु परिवर्तन का अन्य पोषक स्तरों पर परिवर्तनों के अनुरूप वृद्धि, उत्तरजीविता, प्रजनन या अनुक्रिया में परिवर्तनों के माध्यम से विवरण एवं प्रचुरता पर अत्यधिक प्रभाव पड़ सकता है। सागर के तापमान और वर्तमान प्रवाहों में परिवर्तन से समुद्री मछली के स्टॉकों के वितरण में वृद्धि होने, कमी होने और परिवर्तन होने की संभावना होती है। कुछ क्षेत्रों को लाभ हो सकता है, तो कुछ क्षेत्रों को नुकसान हो सकता है। इन परिवर्तनों का प्रकृति और वाणिज्यिक मत्स्ययन पर प्रभाव पड़ सकता है। मछली की संख्यात्मक टर्न ओवर की दरों के अनुसार प्रजातियों की विशिष्ट अनुक्रिया में अन्तर आने की संभावना होती है। अधिक तेजी के साथ बढ़ने वाली मछली प्रजातियों की पीढ़ियां तापमान में परिवर्तन के प्रति सबसे अधिक गति से जननोकीय अनुक्रिया दर्शा सकती हैं, जिसके परिणामस्वरूप तापवृद्धि के प्रति अधिक सशक्त वितरण अनुक्रिया दिख सकती है।

मछली पकड़ना

पकड़ी जाने वाली मछली की मात्रा को मछली की प्रचुरता का मोटा पैमाना माना जाता है। मुख्य वाणिज्यिक प्रजातियों की पकड़ी जाने वाली मात्रा में परिवर्तन इतने अधिक प्रभावी हो सकते हैं , यह संभव हो सकता है कि वे उनके आकार में परिर्वतन को वास्तव में परिलक्षित करते हों। अगले 50 वर्षों में 1-30 सेंटीग्रेड तापमान में होने वाले अनुमानित परिवर्तन से जुड़े कुछ संकेत को मछली के अभिगमनों और प्रचुरता के मामले में होने वाले परिवर्तनों के साथ जोड़ा जाएगा या नहीं, इसका अनुमान समय श्रृंखलाओं द्वारा निर्धारित अवधि के दौरान पकड़ी जाने वाली मछली की मात्रा में परिवर्तनों के अध्ययन से आंका जा सकता है। ऑयल सारडाइन के वार्षिक उत्पादन में 1961-2006 के दौरान 3,187 टन (1994) से 342,789 टन का अन्तर देखा गया।

हालांकि, प्रारंभ में दो संभावित कारणों के विरूद्ध सावधान कर देना आवश्यक है कि यह दृष्टिकोण क्यों विशुद्ध नहीं हो सकता है। पहला, विगत के कुछेक वर्षों में मत्स्ययन प्रौद्योगिकी तथा मछली की मांग में भारी परिवर्तन हुए हैं। इस तथ्य कि कतिपय प्रकार की मछलियों का उत्पादन 50 वर्ष पहले कम था, के बारे में कहा जा सकता है कि आवश्यकता का जलवायु परिवर्तन से कुछ भी लेना-देना नहीं होता, लेकिन उन्नत प्रौद्योगिकी या बढ़ती मांग से उसका सम्बन्ध अवश्य होता है। व्हाइट फिश (लैकटेरिय लैक्टेरियस) के उत्पादन में प्रपाती गिरावट का सर्वाधिक संभावित कारण ट्राउलर की संख्या में वृद्धि के कारण अधिक मात्रा में मछलियों का पकड़ा जाना रहा है। सक्विडों, कतला, थ्रेडफिन, ब्रीम्सों के उत्पादन में अत्यधिक वृद्धि का कारण ट्राउलरों की संख्या का बढ़ना तथा गत कुछेक वर्षों में रीबनफिन का उत्पादन विदेशी बाजार में इसकी मांग बढ़ने के कारण हुआ है। संभवतः समय श्रृंखलाओं के दौरान उत्पादन प्रवृति को मछली पकड़ने के प्रयास/प्रौद्योगिकियों का प्रभाव तथा प्रवृत्ति से अलग हटने को जलवायु परिवर्तनीयता का प्रभाव माना जा सकता है।

अधिक तापमानों के सकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकते हैं। निचले देशान्तरों में वाणिज्यिक दृष्टि से मूल्यवान कुछ प्रजातियों की उच्च वृद्धि दर है और वार्षिक उत्पादन अधिक होता है। उदाहरण के लिए ऑयल सारडाइन (एस लांमीसेप्स) और भारतीय मैकरेल (रैस्ट्रीलिगर कनागुर्टा) का उत्पादन सामान्यतः भारत के दक्षिण पश्चिम तटवर्ती क्षेत्रों में अधिकतम होता है और उत्तर की ओर जाने पर इसके उत्पादन में कमी आने लगती है। तापमानों में वृद्धि से विगत के दो दशकों में भारत के पश्चिमोत्तर तटवर्ती क्षेत्र तथा पूर्वी तटवर्ती क्षेत्र में ऑयल सारडाइन और भारतीय मैकरेल का वार्षिक उत्पादन बढ़ा है।

टूना के अभिगमन पैटर्न समुदी प्रक्रियाओं द्वारा शासित होते हैं, जो उपयुक्त भौतिक अधिवास (तापमानों एवं पर्याप्त ऑक्सीजन के संदर्भ) तथा पर्याप्त खाद्य संसाधनों के बीच संयोजन कायम करता है। टूना मछली भोजन की तलाश में निरन्तर तैरती रहती हैं-कुछ परिस्थितियों में तो प्रतिदिन उनके वजन के 15 प्रतिशत तक खपत करने की जरूरत पड़ सकती है। इसके परिणामस्वरूप, टूना संकेन्द्रण के क्षेत्र किसी भी रूप में आकस्मिक नहीं होते और जलीय मार्गों के अनुसार उनका अभिगमन होता है, जिसमें प्रत्येक प्रजाति को अपने अस्तित्व के प्रत्येक चरण में उत्तरजीविता के लिए पर्यावरण का अधिकतम लाभ प्राप्त होता है। चूंकि वे काफी ऊर्जा की खपत करने वाले होते हैं, इसलिए वे समुद्री संक्रियाओं और विशेषताओं पर निर्भर होते हैं, जो उनके औसत शिकार संसाधनों को बढ़ावा देने वाली होती हैं और निश्चित समय-सीमा के भीतर ये सब उन्हें मिलना चाहिए अन्यथा वे मर जाते हैं। टूना के लिए अधिकतम अनुकूल इन अधिवास क्षेत्रों के स्थान एवं उत्पादकता में अल्पकालिक मौसमी और बहुवर्षीय परिवर्तनीयता पैटर्नों के निर्धारण में जलवायु की एक बड़ी भूमिका होती है।

उष्णकटिबंधीय टूना जिनमें स्काइपजैक (कटसुवर्म्स पेलामिस), येलोफिन (थुन्नस अल्बोकेयर्स) और बाइजिए (थुन्नस ओबेसस) शामिल हैं, में तेजी से बढ़ने की प्रवृति होती है और अपेक्षाकृत उनका जीवन काल कम होता है। उष्णकटिबंधी टूना के स्टॉक की प्रचुरता, संकेन्द्रण, स्थान और उत्पादन पर जलवायु परिवर्तनीयता के प्रदर्शनीय प्रभाव पड़ते हैं। सर्वाधिक उत्पादात्मक मत्स्ययन आधारों वाले स्थानों में जलवायु परिवर्तनीयता से मौसमी परिवर्तन आते हैं। इस बात के प्रमाण हैं कि टूना के कारोबार में लगे पोतों के प्रचालकों द्वारा अपने उत्पादन प्रचालनों का मार्गदर्शन करने के लिए टूना स्टॉकों पर जलवायु/समुद्री संक्रियाओं के प्रभावों के बारे में उपलब्ध जानकारी का सक्रिय उपयोग किया जा रहा है। जलवायु परिवर्तनीयता एवं जलवायु परिवर्तन के कारण मछली के अभिगमनों एवं वितरण की स्थिति में हुए प्रभावों के परिणामस्वरूप टूना जैसी अति अभिगामी प्रजातियों के मामले में निपटना सर्वाधिक कठिन है।

जलवायु परिवर्तनः अन्य कारक

1992-2005 के दौरान मध्यमान समुद्र तल अरब सागर, बंगाल की खाड़ी और अंडमान सागर में क्रमशः 0.705 मि.मी., 1.086 मि.मी. और 3.772 मि.मी. प्रति वर्ष की दर से बढ़ा है। समुद्र तल में वृद्धि से भूजल अधिक खारा हो सकता है। मीठे पानी में मत्स्ययन जल कृषि और कृषि को नुकसान पहुंचा सकता है तथा औद्योगिक और घरेलू जल उपयोगों को सीमित कर सकता है। हाल के दशकों में बांग्लादेश में अन्तर्देशीय भूजल में खारापन बढ़ा पाया गया है। समुद्र तल वृद्धि अपनी निचली गहराई की सीमा के पास पहुंच चुकी भित्तियों को डुबो सकती है जिससे उन तक प्रकाश नहीं पहुंच पायेगा।

अवक्षेपण में वृद्धि से खारापन कम हो सकता है और नदी के मुहाने के समीप विसर्जन गाद बढ़ सकता है तथा जमा हो सकता है। उष्णकटिबंधी चक्रवातों से भित्ति का विकास सीमित हो सकता है लेकिन स्वस्थ प्रवाल भित्तियों में चक्रवात के कारण होने वाली क्षति से उबरने की क्षमता होती है।

ये प्रारम्भिक परिणाम बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने पर जोर देते हैं। बॉम्बे डॉक जिसकी उत्तरी सीमा चारों तरफ से भूभाग से घिरी है, पर समुद्री जल के तापमान बढ़ने का क्या असर होगा? समुद्री टूना मछली जो थर्मोक्लाइन से प्रभावित होती है, के वितरण और अभिगमन पर भारी प्रभाव पड़ सकता है। समुद्री कछुओं के लिंग का निर्धारण मृदा के तापमान, जिस पर भ्रूण विकसित होता है, द्वारा होता है।  280 सेंटीग्रेड से अधिक तापमान पर केवल मादा कछुआ पैदा होती है। कछुए इस संकट का सामना किस प्रकार कर पाएंगे। क्या तापमान को सहन करने वाली प्रजातियों की प्रमुखता से पादपप्लवक प्रजातियां आगे आएंगी? क्या हाल के वर्षों में भारतीय तटवर्ती जल क्षेत्रों में फुफकारने वाली मछलियों और मेडूसा का व्यापक घुसपैठ/हमला जलवायु परिवर्तन का परिणाम है।

जलवायु परिवर्तन का अनकूलनः मत्स्ययन के विकल्प

अनुकूलन के विकल्प सीमित हैं, लेकिन मौजूद हैं। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव परिवर्तन की मात्रा और प्रजाति विशेष या पारिप्रणालियों की संवेदनशीलता पर निर्भर करता है ।

जलवायु परिवर्तन और समुद्री मत्स्ययन के लिए जानकारी के आधार का विकास

चूंकि मत्स्ययन को संपोषित करने की क्षमता वैश्विक परिवर्तनों और स्थानीय उपद्रवों के बीच अंतर्संबंधों की क्रियाविधिक समझ पर निर्भर करेगा, इसलिए जलवायु परिवर्तन के बारे में क्षेत्रीय प्रतिक्रिया की पहचान करना महत्वपूर्ण है। अतः जलवायु परिवर्तन संबंधी अनुसंधान के लिए उपयुक्त इन प्रमुख पैरामीटरों पर निगरानी रखने के अलावा ऐतिहासिक जलवायु एवं समुद्री डाटा एकत्रित करने के लिए प्रयास किए जाने चाहिए। मछली सहित समुद्री समुदायों में परिवर्तन के कारणों के तौर पर इन पैरामीटरों में परिवर्तनों के महत्व को जानना भी महत्वपूर्ण है। दीर्घावधि के पर्यावरणीय और पारिस्थितिकीय निगरानी कार्यक्रम के बारे में प्रतिबद्धता कायम करने की पहल महत्वपूर्ण है क्योंकि इस प्रकार के डाटा भूतलक्षी प्रभाव से एकत्रित नहीं किए जा सकते। भारत में भौगोलिक समुद्री मछली उत्पादन और इस दिशा में किए जा रहे प्रयास संबंधी डाटा विगत चार दशकों से उपलब्ध हैं। तथापि, जलवायु और समुद्री डाटा तथा मत्स्ययन डाटा के बीच सहक्रिया विद्यमान है। मछलियों की संख्या पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव का अब तक कोई आकलन नहीं किया गया है। भावी विश्लेषणात्मक और प्रयोगसिद्ध मॉडलों और प्रबंधन अनुकूलनों की बेहतर आयोजना के पहले कदम के रूप में ऐसे आकलन किए जाने की जरूरत है।

जिम्मेदार मत्स्ययन के लिए आचार संहिता

मछली की संख्या के मामले में भी अत्यधिक मात्रा में मछली पकड़ने, प्रदूषण और अधिवास विनाश की जानी-पहचानी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। भारत में मत्स्ययन अभी काफी हद तक एक खुली पहुंच वाला कार्य है। यांत्रिक ढंग से मछली पकड़ने पर 45 से 60 दिनों के लिए मौसमी रोक ही संभवतः एकमात्र नियामक उपाय है, जिसका वर्तमान में अनुपालन किया जा रहा है। यद्यपि पकड़ी जाने वाली मछली के परिणाम में स्पष्ट रूप से कोई कमी नहीं आई है। गत एक दशक से यह स्थिर है और कई मछली के स्टॉकों में कमी आने के संकेत हैं। मत्स्ययन और जलवायु परिवर्तनों का मछली उत्पादन पर मजबूत अंतर्संबंध का दबाव है और उनका संयुक्त समाधान किया जाना चाहिए। मत्स्ययन के अधिकतर मामले जिनके अन्तर्गत वर्तमान में पूरा दोहन या अधिक दोहन किया जाता है, में मर जाने वाली मछलियों की संख्या में कमी लाने का उपाय किया जाना जलवायु परिवर्तन के प्रभावों में कमी लाने का प्रमुख साधन है । मछली पकड़ने के प्रयास में कमी लाने से (प) अधिकतम संपोषित उत्पादन होता है ( पप) मछलियों के स्टॉकों और समुद्री पारिप्रणालियों के अनुकूलन में सहायता मिलती है और (पपप) मत्स्ययन नौकाओं द्वारा  ग्रीनहाऊस गैस उत्सर्जन में कमी लाती है। वैश्विक तेल उत्पादन का लगभग 1.2 प्रतिशत मत्स्ययन में उपयोग किया जाता है और यह देखा गया है कि मछली पकड़ने के कार्य से मछली उत्पादन श्रृंखला में वैश्विक तापमान मुख्य रूप से बढ़ता है। इसलिए जलवायु प्रभावों से निपटने के लिए जो हम सर्वाधिक प्रभावी कार्यवाही कर सकते हैं, उनमें अत्यधिक मात्रा में मछली पकड़े जाने जैसी कुछ जानी-पहचानी समस्याओं से निपटना और जिम्मेदारीपूर्ण मत्स्ययन और समेकित पारिप्रणाली आधारित मत्स्ययन प्रबंधन के लिए आचार संहिता को अपनाना शामिल है। (खाद्य और कृषि संगठन, 2007) इस तथ्य के मद्देनजर यह चुनौती और अधिक कठिन हो जाती है कि पारम्परिक ढंग से मछली पकड़ने के कार्य में लगे तटवर्ती समुदायों में भीषण स्तर की गरीबी व्याप्त है और उनके लिए आय पैदा करने के समुचित विकल्पों की भी कमी है। ये कारक इन समुदायों को भावी परिवर्तनों के प्रति काफी कमजोर बना देते हैं क्योंकि परिवर्तनों के अनुरूप ढलने की इनकी क्षमता बहुत सीमित है। इन कमजोर समुदायों की मत्स्ययन पर निर्भरता कम करने का प्रयास किया जाना अनिवार्य है।

जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के बारे में जागरूकता बढ़ाना

मत्स्ययन के लिए जलवायु परिवर्तन के निहितार्थों से संबंधित विशिष्ट नीतिगत दस्तावेज विकसित किए जाने की जरूरत है। इस दस्तावेज में जलवायु परिवर्तन से संबंधित शिक्षा, प्रशिक्षण और जन जागरूकता सहित सभी तर्कसंगत सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय नीतियों ओर कार्यवाहियों पर विचार किया जाना चाहिए। मत्स्ययन क्षेत्र के निर्णयकर्ताओं, प्रबंधकों, मछुआरों और अन्य हितार्थियों में जलवायु परिवर्तन से संबंधित प्रभाव, सुभेद्यता, अनुकूलन और उपशमन के बारे में जागरूकता बढ़ाने की भी जरूरत है।

निष्कर्ष : अनुकूलन तंत्र हेतु कार्य नीतियां

जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में, मत्स्ययन और जल कृषि क्षेत्र के लिए प्राथमिक चुनौती खाद्य आपूर्ति सुनिश्चित करने, पोषण सुरक्षा बढ़ाने, आजीविका और आर्थिक साधन सुधारने तथा पारिस्थितिकी संरक्षा सुनिश्चित करने की होगी। इन उद्दशयों को पूरा करने के लिए जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न होने वाली चिंताओं की पहचान करने और उनका समाधान करने; राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तरों पर अनुकूलन तंत्र विकसित करने और सभी हितार्थियों के साथ मिलकर कार्यवाही को आगे बढ़ाने की जरूरत पड़ेगी। मछलियों की संख्या और प्रजातियों के स्थान परिवर्तन के संदर्भ में, उद्योग को ऑन बोर्ड प्रसंस्करण उपकरणों आदि के लिए सही प्रकार के नौका और गियर संयोजन पर ध्यान देना चाहिए। सरकारों को क्षेत्रीय आधार पर मौसम संबंधी निगरानी समूहों और निर्णय समर्थन प्रणालियां स्थापित किए जाने पर विचार करना चाहिए। प्रभावों का विश्लेषण करने और इस क्षेत्र को सामर्थ्यकारी बनाने हेतु संस्थागत तंत्रों की स्थापना करने के लिए अनुसंधान निधियों का आवंटन करना भी महत्वपूर्ण है। सूचना और विचारों का आदान-प्रदान करने हेतु क्षेत्रीय और अन्तरराष्ट्रीय सहभागिता सहयोग की सार्थकता आज जितनी महसूस की जा रही है, पहले कभी नहीं की गई। इसके लिए (क) क्षेत्रीय संगठनों को सृदृढ़ करने और जलवायु परिवर्तन की कार्य सूची को प्राथमिकता आधार पर रखकर; (ख) संसाधनों का अन्तरराष्ट्रीय उपयोग किए जाने की व्यवस्था करने; और साझा मंच विकसित करके तथा सर्वोत्तम व्यवहारों को अपनाकर क्षेत्रीय स्तर पर कार्य योजनाएं लागू किए जाने की जरूरत है : (प) उपशमन गतिविधियों के साथ जोड़कर; (पप) सहयोग और भगीदारी बढ़ाकर; और (पपप) अन्तरराष्ट्रीय मत्स्ययन समझौते लागू करके अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर भी कार्य योजना लागू किए जाने की जरूरत है।

मत्स्ययन और जल कृषि क्षेत्र के लिए जलवायु परिवर्तन के अलावा कई अन्य मुद्दे हैं, जिनका समाधान किया जाना चाहिए। जलवायु परिवर्तन का संकट गंभीर शक्ल अख्तियार कर ले, उससे पहले ही संपोषणीयता को बढ़ावा देने तथा आपूर्ति की स्थिति में सुधार करने की कार्यनीतियां बनाई जानी चाहिए। जहां मत्स्ययन क्षेत्र को विशेषकर मछली पकड़ने की नौकाओं द्वारा कार्बन डाइऑक्साइड गैस के उत्सर्जन की मात्रा में कमी लाकर जलवायु परिवर्तन को रोकने का प्रयास करना होगा, वहीं इस क्षेत्र के कार्बन फुटप्रिंट कम करने हेतु वित्तीय प्रोत्साहन प्रदान करके तथा अन्य उपशमन एवं अनुकूलन विकल्पों का पालन करके प्रभावी उपायों को अपनाकर इसके प्रभाव को कम करने में योगदान दिया जा सकता है।

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