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औद्योगिक उन्नति हेतु विशेष आर्थिक क्षेत्र का निर्माण

विशेष आर्थिक क्षेत्र देश की भौगोलिक सीमा के अन्दर स्थित ऐसा ‘शुल्क मुक्त’  क्षेत्र है, जिसे व्यापार संचालन, शुल्क तथा प्रशुल्कों की दृष्टि से विदेशी क्षेत्रों के समान माना जाता है। यह एक ऐसा औद्योगिक क्षेत्र है जो सामान्य रूप से निवेशकों को आकर्षित करने के लिए उदार आर्थिक नीतियों एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की आधारभूत सुविधाओं एवं आवश्यकताओं से सम्पन्न होता है।

उद्देश्य  इन क्षेत्रों का प्रमुख उद्देश्य देश के निर्यात मे वृद्धि कर विदेशी मुद्रा अर्जित करना होता है, जिससे भुगतान संतुलन धनात्मक बना रहे। विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना का प्रमुख उद्देश्य केन्द्रीय ब्रिक्री कर तथा सेवा कर आदि में छूट देकर इनके द्वारा उत्पादित माल को सस्ता कर अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के लिए प्रोत्साहित करना है।

विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना ऐसे स्थानों पर की जाती है जहां बंदरगाह, हवाई अड्डा आदि अवस्थित हो जिससे आयात-निर्यात आसानी से संभव हो सके। इसमें औद्योगिक जगत के लिए भूमि के साथ-साथ आवास, शैक्षणिक संस्थाओं, विभिन्न कार्यालयों, दूर-संचार एवं मनोरंजन की सुविधाओं का भी प्रावधान होता है।

विशेष आर्थिक क्षेत्र का भारतीय परिदृश्य

➤ भारत में निर्यात वृद्धि के लक्ष्य को लेकर 1 अप्रैल 2000 को विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना की योजना तत्कालीन वाणिज्य मंत्री श्री मुरासोलीमारन ने प्रस्तुत की थी। सरकार के द्वारा 1 अप्रैल 2000 के इस नीति के प्रावधानों को जून 2005 में संसद में विशेष आर्थिक क्षेत्र विधेयक पास करके वैधानिकता दी गई, साथ ही साथ पफरवरी 2006 में वाणिज्य मंत्रालय द्वारा भी इसके नियमों एवं प्रावधानों से सम्बन्ध्ति अधिसचना जारी की गई। भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना चीन में विशेष आर्थिक क्षेत्र की अपार सफलता को देखते हुए की गई है।

➤ चीन ने 1978 में प्रथम विशेष आर्थिक क्षेत्र का विकास किया था जिसको भू-स्वामित्व तथा श्रामिकों से जुड़ी समस्याओं से निपटने के लिए बनाया गया था। वर्तमान में चीन का उद्देश्य अब सेज के माध्यम से विदेशी निवेश को आकर्षित करना हो गया है

➤ चीन की सफलता का मुख्य कारण निम्न हैः-

  • चीन में सभी विशेष आर्थिक क्षेत्र पूर्णतया सरकार के नियंत्रण में है
  • कुल निर्यात का 40 प्रतिशत विशेष आर्थिक क्षेत्रों के माध्यम से ही होता है।
  • भारत की तुलना में चीन में गैर कृषि योग्य भूमि काफी मात्रा में उपलब्ध है जहाँ आसानी से सेज से सम्बन्धित आधार भूत संरचनाओं का विकास संभव है।
  • चीन में अध्ग्रिहण सम्बन्धी कानून हमारे देश की तुलना में सरल है।

भारत में विशेष आर्थिक क्षेत्र का विस्तार

स्थापना की शर्तें

➤ विशेष आर्थिक क्षेत्र का न्यूनतम क्षेत्र 1000 हेक्टेयर होना चाहिए जबकि एकल वस्तु विशेष आर्थिक क्षेत्र का क्षेत्रफल 100 हेक्टेयर होना चाहिए।

➤ पहाड़ी राज्यों में बड़े भू-खण्डों की अनुपलब्धता के कारण विशेष आर्थिक क्षेत्र को बहु-उत्पादक बनाने के लिए 200 हेक्टेयर तथा क्षेत्र विर्निदिष्ट के लिए 50 हेक्टेयर क्षेत्र की अनिवार्यता रखी गई है।

स्थापना की प्रक्रिया

विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना हेतु आवेदन पत्र के साथ पूरा प्रोजेक्ट संबंधित राज्य सरकार के पास प्रस्तुत किया जाता है। राज्य सरकार विचार करने के बाद इसके अनुमोदन के लिए इसे केन्द्रीय वाणिज्य मंत्रालय को भेजती है। इस आवेदन पत्र पर वाणिज्य मंत्रालय की एक मंत्रालय समिति विचार कर अन्तिम स्वीकृति प्रदान करती है। जबकि आवश्यक आधारभूत ढांचा, उत्पादों तथा उससे सम्बंद्ध इकाइयों को राज्य सरकार की विकास आयुक्त की अध्यक्षता वाली गठित समिति सहमति प्रदान करती है।

सरकारी प्रयत्न – विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना के लिए आवश्यक जमीन को उपलब्ध कराना राज्य सरकार की जिम्मेदारी है।

  • सभी कर एवं अधिभरों ; जैसे बिक्रीकर, स्टैंप चुंगी, मंडी आदि तथा राज्य सरकारों द्वारा लगाए गए सभी अधिभारों से सेज को मुक्त रखा गया है।
  • सभी विशेष आर्थिक क्षेत्रों को आपस में वस्तुओं अथवा सेवाओं को खरीदने व बेचने की छूट प्रदान की गई है। सभी भुगतान विदेशी मुद्रा में किए जा सकते है।
  • स्थापना के 15 वर्षो के भीतर प्रारम्भिक 5 वर्षो तक 100%, फिर अगले 5 वर्षो के लिए 50% की आयकर की छूट, अगले 5 वर्षो तक निर्यात से प्राप्त लाभ में 50% की छूट प्राप्त होगी।
  • विदेशों में बैंकिंग इकाइयों को पहले 5 वर्ष तक 100%,  तथा अगले 5 वर्षो  के लिए 50%  तक आयकर से मुक्त रखा गया।
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र में अन्तर्राष्ट्रीय वित्तीय सेवा केन्द्र स्थापित करने का भी प्रावधान रखा गया है।
  • यदि विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना हरियाली क्षेत्र में होती है तो उससे निश्चित रूप से पर्यावरण-प्रदूषण बढ़ेगा। जिसका परिणाम दूर भविष्य में और भयंकर होगा।
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र की आड़ में भू-माफिया जमीनों को आवास शिक्षा, संस्थान, वाणिज्य नीति के नाम पर हड़पने में सक्रिय हो जाएंगे।
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना यदि ग्रामीण क्षेत्रों में होती है तो वहां से शहरों की ओर पलायन होगा जिससे प्राप्ति स्थल पर प्रवासन की समस्याएं उभरेंगी।
  • क्षेत्रीय असमानता में वृद्धि होगी। अभी तक की स्थिति से यह स्पष्ट है कि अधिकांश विशेष आर्थिक क्षेत्र की स्थापना ऐसे स्थानों पर हुई है जो पहले से ही विकसित हैं अतः पिछड़े क्षेत्र का विकास मात्रा सपना ही रह जाएगा।
  • ‘विशेष आर्थिक क्षेत्र द्वारा बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होगा’ – यह एक शोध का विषय है क्योंकि उत्पादकता एवं गुणवत्ता के नाम पर आधुनिक तकनीकी का प्रयोग होने से केवल कुछ ही लोगों को रोजगार मिल पायेगा।

धनात्मक पहलू

लोगों में फैली आशंका है कि विशेष आर्थिक क्षेत्र से किसानों को नुकसान होगा, उनकी भूमि जबरन अधिग्रहित हो जाएगी, सरकार को राजस्व हानि होगी, बेरोजगारी जस की तस रहेगी – लेकिन इसके पफायदे भी लोगों की समझ में आने चाहिएं- यथा:

  • रोजगार के संदर्भ में यह आशा की जाती है कि अप्रत्यक्ष रूप से जुड़े लोगों को भी लाखो की संख्या में  रोजगार मिल सकेगा।
  • सरकार द्वारा कुल कृषि भूमि का एक बहुत छोटा भाग ही विशेष आर्थिक क्षेत्र को आवंटित हुआ है। यह भी प्रयास हो रहा है कि इसका उचित मुआवजा भू-स्वामियों को मिले।
  • विशेष आर्थिक क्षेत्र के अन्दर हुए अपराधों पर त्वरित कार्यवाही हेतु विर्निदिष्ट न्यायालय एवं एकल प्रवर्तन एजेन्सी की स्थापना की भी बात है।
  • वर्ष 2006 में एकल खिड़की निपटान जैसे प्रावधानों को जोड़कर सरकार ने इस क्षेत्र के लिए नियमों को काफी सरल बना दिया है।

विशेष आर्थिक क्षेत्र की आलोचना/ विश्लेषण

  • विशेष आर्थिक क्षेत्र प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार को बढ़ावा दे रहे हैं। वर्तमान में लोगों को विशेष आर्थिक क्षेत्र के तहत रोजगार मिल रहा है जिसमें लगभग 40% भागीदारी महिलाओं की है।
  • विशेष आर्थिक इलाके देश में आर्थिक विकास और निर्यात प्रोत्साहन के उद्देश्य से स्थापित किये जा रहे हैं पर देश में इनके निर्माण का विरोध हो रहा है जिसके मुख्य कारण को वित्तीय हानि बताया जा रहा है। एक अनुमान के तहत देश में बड़े पैमाने पर विशेष आर्थिक इलाके खुलते जा रहे हैं। जिससे आने वाले वर्षों में अरबों रूपये के राजस्व नुकसान का अंदेशा है।
  • यह बात ध्यान देने योग्य है कि विशेष आर्थिक इलाका सिर्फ रियल एस्टेट गतिविधि बन कर न रह जाए और कर रियायतों से राजस्व का बड़ा नुकसान न हो जाए।

पूंजी हानि के अतिरिक्त विशेष आर्थिक क्षेत्र की अन्य प्रमुख समस्याएं निम्न है-

विशेष आर्थिक इलाकों की स्थापना के लिए भारत में कृषि भूमि का अधिग्रहण होता है। हमारे देश में सीमांत कृषकों की संख्या अध्कितम है और उनकी जमीन का अधिग्रहण करके उनके पुर्नवास की समस्या का उचित हल नहीं निकलता है तथा किसान आत्महत्या को मजबूर हो जाते हैं। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि विशेष आर्थिक इलाके बंजर भूमि पर ही बनाए जाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो रहा है, जिसका परिणाम यह होगा कि देश में खेती योग्य भूमि घट जाएगी और जिस क्षेत्र में गहन निर्वाह कृषि होती है वहां इससे और अध्कि नुकसान होगा।

कृषि एवं खाद्य प्रसंस्करण क्षेत्र में विशेष आर्थिक इलाके के आने से कृषकों की स्थिति सुधरेगी।

जहां तक सरकार के कर हानि की बात है – चूंकि पूंजी निवेश निजी क्षेत्र में होगा, अतः सरकार की पूंजी बचेगी तथा निजी क्षेत्रों के अन्य कार्यों पर कर लगाकर सरकार कुछ हद तक नूकसान की भरपायी करेगी और कर छूट की समाप्ति के बाद सरकार को भरपूर आय प्राप्त होगी।

विशेष आर्थिक क्षेत्र की सफलता के लिए उठाए जाने वाले आवश्यक सुझाव

  • विशेष आर्थिक क्षेत्र में जो भी प्रस्ताव स्वीकार किए जाएं उनकी चयन प्रक्रिया स्वस्थ एवं पारदर्शी हो अतः सम्बन्धित नियमों को और अधिक प्रभावी बनाने की आवश्यकता है।
  • औद्योगिक एवं गैर औद्योगिक गतिविधियों के लिए स्पष्ट मानक तय किए जाएं और उनका सम्पूर्णता से क्रियान्वयन हो।
  • खाद्य पदार्थों व उत्पादित वस्तुओं के निर्यात से घरेलू बाजार में इनकी कमी ना हो या कीमतें न बढें अतः इस पर सरकार को विशेष ध्यान देना होगा।
  • विशेष आर्थिक इलाकों की स्थापना से विस्थापित लोगों के पुनर्वास, रोजगार की समुचित व्यवस्था के सरकारी प्रावधानों को और अधिक प्रभावशाली बनाया जाए।
  • विशेष आर्थिक इलाकों को राजनीति का अखाड़ा न बनने दिया जाए।
  • विशेष आर्थिक इलाकों के लिए ऐसी नीति बने जिससे कृषि एवं उद्योग साथ-साथ विकसित हो।

निष्कर्ष: विशेष आर्थिक क्षेत्र पूंजी निवेश, रोजगार संवर्धन एवं निर्यात वृद्धि का महत्वपूर्ण संसाधन है। निश्चित रूप से देश की आर्थिक उन्नति में इनकी भूमिका अह्म होगी बशर्ते इनका विकास एक सुनियोजित रणनीति के तहत हो। इस बात का ध्यान रखा जाए कि विशेष आर्थिक क्षेत्र एवं बाहरी क्षेत्र के बीच असंतुलन न होने पाए और विशेष आर्थिक इलाकों का लाभ इस व्यवस्था से जुड़े सभी लोगों को यथासंभव दीर्घकाल तक मिलता रहे। भारत में भी चीन के विशेष आर्थिक क्षेत्र के सफलता की कहानी दोहराई जा सकती है बशर्ते कि पूरी तन्मयता एवं ईमानदारीपूर्वक कार्य किए जाएं।

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